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मंगलवार, 12 नवंबर 2013

सांवरे की प्रीत संग मैने बांध ली है डोरी

सांवरे की प्रीत संग मैने बांध ली है डोरी                                                     
अब मर्ज़ी तुम्हारी नैया पार लगाओ या मझधार मे डुबा दो मोरी
प्रीत की रीत मैं नही जानूँ
पूजा पाठ की विधि ना जानूँ
और कोई राह ना जानूँ
सांवरे इक तेरे नाम के सिवा
और ना कोई नाम ना जानूँ
अब मर्ज़ी तुम्हारी
हाथ पकडो या छोड दो मुरारी
मै तो जोगन बनी तिहारी
मुझे ना भाये दुनिया सारी

                                                                                            

 तुम बिन  ठौर ना पाये दीवानी
                                                                                                    
भई बावरी प्रीत बेचारी
                                                                                                    
 दर दर भटके मीरा बेचारी
                                                                                                     
कहीं ना मिलते कृष्णमुरारी

                                                                                                   
कैसे आये चैन जिया मे

                                                                                                     श्याम बिन अंखियाँ बरस रही हैं
                                                                                                     श्याम दरस को तरस रही हैं
                                                                                                     श्याम रंग मे डूब गयी हैं
                                                                                                     श्याम ही श्याम हो गयी हैं
                                                                                                     
    और कोई रंग नही है
                                                                                                       और कोई ढंग नही है
                                                                                                       जीवन तुम बिन व्यर्थ गया है
                                                                                                        जीने का ना कोई अर्थ रहा है
                                                                                                         श्याम सुधि ना बिसरायो
                                                                                                        इक बार दरस दिखा जाओ
                                                                                                          ह्रदयकमल मे आ जाओ

शनिवार, 2 नवंबर 2013

अब तुम्हारी याद में सुलगती नहीं लकड़ियाँ


जाने कौन सी बिजली गिरी कि जल गया आशियाँ 
अब तुम्हारी याद में सुलगती नहीं लकड़ियाँ 
किंकर्तव्य विमूढ़ हो गया है मन का हर कोना 
जाने कैसी चलायी तुमने हवा उड़ गया है हर सफहा 
खाली देग बन आंच पर जल रही हूँ 
फिर भी सुलगती नहीं कोई चिता 
ये कैसा तुमने मुझे बना दिया 
जो तुम्हारे दीदार की चाह ना जन्म लेती यहाँ 
एक प्रश्न बन कर खड़े हो जाते हो 
और उत्तर के लिए तडपाते हो 
कैसी बनायीं तुमने दास्ताँ 
मुझसे मैं भी बिछड़ गयी 
जाने किन गह्वरों में सिमट गयी 
जाने कौन सी चट्टान , कौन सी शिला बना दिया 
किसी राम के पद पखारने पर भी 
फिर से ना मिलती अपनी सूरत यहाँ 
ये कैसी खेती बुवाई है 
कौन सी खाद लगायी है 
किस ऐरावत ने जल बरसाया है 
जो अब किसी भी कोने से 
मेरा मन ना भीग पाया है 
ना फसल अब उगती है 
तुमसे भी ना शिकायत की ललक रखती है 
अजब तमाशा बना दिया 
मुझसे मुझे भी जुदा किया 
अब ना मैं हूँ ना तुम हो 
ना सम है ना विषम 
ना ही कोई मौसम 
बस लगता है जैसे 
एक पत्थर की मूरत किसी ने बना दी 
और जिसकी आँखों से मूर्तिकार ने 
अविरल धारा  अश्रुओं की बहा दी 
अब मूरत दिन रात सावन सी बरसती है 
गंभीर रुदन करती है 
मगर जिह्वया खामोश हो गयी है 
आँख भी बंद हो गयी है 
तुम्हारी याद में कहूँ या अपने हाल पर कहूँ  या निर्द्वन्दता कहूँ 
अब इस परिस्थिति को क्या नाम दूं …………मोहन  !

(कभी कभी किसी को हद से ज्यादा जान लेना भी दुष्कर कर देता है जीना )

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

कितने प्यासे हो तुम ……कहो ना....5



अरे अरे अरे 
रुको रुको रुको 
सुनो। ………
कोई ये सोचे उससे पहले ही बता दूं 
कि  ये सब कहने और सुनने वाले 
भी तुम ही हो सिर्फ तुम 
तुम पर ये कोई आक्षेप नहीं है 
और ये जीव कहाँ तुम्हारे भेदों को 
तुम्हारे जनाए बिना जान सकता है 
बेशक माध्यम तुमने 
इस जीव को बनाया हो 
मगर इसके अन्दर 
ये भाव यूं ही उत्पन्न नहीं हुआ है 
क्योंकि 
गीता में तुम्ही ने कहा है 
कि 
जीव के हर क्रियाकलाप 
यहाँ तक कि  उसकी 
बुद्धि के रूप में भी तुम हो 
उसके मन के रूप में भी तुम ही हो 
और उसके विचारों के रूप में भी तुम ही हो 
तो जब जीव के हर कार्य का कारण 
तुम ही हो तो बताओ भला 
जीव कैसे तुमसे पृथक हो सकता है 
या सोच सकता है 
या कह सकता है 
वैसे भी तुम्हारी इच्छा के बिना 
पत्ता भी नहीं हिल सकता 
तो फिर 
ऐसे विचार या भावों का आना 
कैसे संभव हो सकता है 
इसमें जीव की कोई 
बड़ाई या करामात नहीं है 
क्योंकि 
सब करने कराने वाले तुम ही हो 
जीव रूप में भी 
और ब्रह्म रूप में भी 
जब दोनों रूप से तुम जुदा नहीं 
तो कहो ज़रा 
ये कहने और सुनने वाला कौन है 
ये इस भाव में उतरने वाला कौन है 
सिर्फ और सिर्फ तुम ही हो 
और शायद 
इस माध्यम से कुछ कहना चाहते हो 
जो शायद अभी हमारी समझ से परे हो 
मगर तुमसे नहीं 
और कर रहे हो शायद तुम भी 
समय का इंतज़ार 
जब बता सको तुम 
अपनी घुटन , बेचैनी, खोज का 
कोई तात्विक रहस्य 
किसी एक को 
जो तुमसे पूछ सके 
या पूछने का साहस कर सके 
या तुम्हारी अदम्य अभिलाषा को संजो सके 
और कह सके 
कितने प्यासे हो तुम ……कहो ना और क्यों ?

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

कितने प्यासे हो तुम………… कहो ना ........4



सुना है 
सृजन करते करते जब थक जाते हो 
और अपनी माया समेट  लेते हो 
तब योगमाया की गोद में विश्राम करते हो 
अनंत काल तक 
उसके बाद योगमाया द्वारा तुम्हें जगाना 
और जागने के बाद ख्याल का उठाना लाजिमी है 
आखिर अपने आप में भी 
कोई कब तक समाहित रह सकता है 
जरूरत होती है उसे भी किसी साथ की 
और धारण कर लेते हो 
विविध रूप 
विविध सृष्टि 
विविध ब्रह्माण्ड 
और लग जाते हो फिर उसी दोहराव में 
जो तुम ना जाने कब से कर रहे हो 
और कब तक करते रहोगे 
कोई नहीं जानता
जानते हो क्यों ?
क्योंकि बेचैन हो तुम भी 
शायद नहीं जानते तुम भी 
आखिर तुम्हें चाहिए क्या 
गर जानते तो पा लिया होता 
क्योंकि 
सुना है तुम्हारे लिए 
कुछ भी अलभ्य नहीं 
ओह मोहन 
सोचना ज़रा कभी इस पर भी 
फुर्सत में बैठकर 
क्योंकि 
सुना ये भी है कि 
पूर्ण तो पूर्ण होता है 
उसमे किसी कामना का 
कोई बीज नहीं होता 
मगर तुम में 
अभी बाकी है कोई बीज 
यूँ ही नहीं सृष्टि निर्माण हुआ करते 
यूँ ही नहीं तुम विविध वेश धारण किया करते 
कोई तो एक कारण है तुममें 
तभी कार्य का होना संभव हुआ है 
और सुनो 
इसे खेल का नाम मत देना 
क्योंकि बच्चा भी बार - बार 
एक ही खिलौने से 
खेल - खेल कर बोर हो जाता है 
फिर तुम तो पूर्ण ब्रह्म कहलाते हो 
फिर तुम्हें क्या जरूरत थी 
बार - बार एक सी रचना रचने की 
एक सा सृजन करने की
अब तुम मानो या ना मानो 
मगर कहीं ना कहीं 
तुम्हारे भी अंतस में 
एक प्यास कायम है 
मानो पानी भरी घटायें हों और फिर भी प्यासी हों 
बस कुछ ऐसा ही तुम्हारा भी हाल है 
कितने प्यासे हो तुम………… कहो ना ! 

रविवार, 13 अक्टूबर 2013

कितने प्यासे हो तुम ………कहो ना ! ...3



जीव की प्यास तो चातक सी है 
जो तुममें ही समाहित है 
जो तुमसे ही उत्पन्न होती है 
और तुम ही विलीन 
तुमसे भिन्न वो कहाँ ?
आसान है ना कहना !
भटकाना !
भरमाना !
और जीव तुम्हारी चाहत में 
युगों के फंदों में फँसा 
अपनी करनी का फल मानता 
सब स्वीकारता दंडवत नतमस्तक हुआ जाता है 
और जान नहीं पाता 
आखिर उसकी घुटन 
उसकी बेचैनी 
उसकी प्यास का 
आदिम स्रोत क्या है ?
क्योंकि 
जहाँ से उत्पत्ति होती है 
वो जमीन ही उत्सर्जन में सहायक होती है 
यदि उसका बीज ही थोथा होगा 
तो क्या उगेगा 
नहीं समझे ? 
प्यारे ! देखो 
जब सब जीव ,सृष्टि , ब्रहमांड तुम्हारे ही रूप हैं 
तुम ही सबके आधार हो 
और तुम ही एक खोज में भटक रहे हो 
तुम भी अभी तृप्त नहीं हो 
तो कहो कैसे 
तुमसे उत्पन्न हम जीव तृप्त हो सकते हैं 
जब आदि ही अतृप्त है 
तो अंत कैसे पूर्णता पा सकता है 
सुनो एक बार किसी से मन की कह दो 
बता दो वो कौन सी खोज है 
वो कौन सी चाह है 
वो कौन सा माला की सुमिरनी का मोती है 
जिसकी चाहत में 
सृष्टि निर्माण और विध्वंस किया करते हो 
क्योंकि यदि सिर्फ खुद से खुद को 
चाहने की प्यास होती 
तो इतने युगों से ना भटक रहे होते तुम 
बताओ तो ज़रा 
गोपियों से बढ़कर प्रेम किया किसी ने क्या 
बेशक वो भी तुम ही थे खुद से खुद को चाहने वाले 
माता यशोदा सा निस्वार्थ प्रेम 
क्या किसी ने किसी को किया होगा 
जब प्रेम की उच्चता , पराकाष्ठा भी 
जहाँ नतमस्तक हो गयी हो 
बताओ उसे और कुछ चाहने के लिए बचा होगा 
नहीं ना !
लेकिन वहाँ  भी तुम नहीं रुके 
इसका क्या अर्थ निकालूँ ?
कोई तो ऐसी फाँस है 
जो जितनी निकालते हो 
उतनी ही तुम्हारे दिल में गडी जाती है 
और तुम अपना चक्र चलाये जाते हो 
मगर कहीं उसका जिक्र नहीं करते 
किसी को आभास नहीं कराते 
कि ……आखिर        
कितने प्यासे हो तुम ………कहो ना ! 

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

कितने प्यासे हो तुम…………. कहो ना ..2


सुना है 
तुम्हारे रोम रोम में 
कोटि कोटि ब्रह्माण्ड हैं 
और हर ब्रह्माण्ड की 
संरचना अलग है 
शायद वहाँ भी तुमने 
ऐसे ही खेल रचे होंगे 
वहाँ भी तुम किसी 
प्यास की फाँस  में फँसे होंगे 
जाने कितने रूप धरे होंगे 
जाने कैसी लीला करते होंगे 
नाना रूप नाना वेश 
फिर भी एक प्यास का बना रहना 
फिर भी कुछ और पाने की 
चाहत में भटकते रहना 
और फिर नव सृजन करना 
मानव की तरह और पाने की चाहत ही 
शायद तुम्हें इतना भरमाती है 
तभी तो देखो तुम 
सृजन करते  थकते नहीं 
अनंत युगों तक नव सृजन करते जाना 
द्योतक है तुम्हारी 
किसी अनकही 
किसी अनबुझी 
किसी अनजानी प्यास का 
और इसे नाम दिया तुमने 
अपने खेल का 
अपनी रचना का 
अपने आनंद का 
स्व के स्व में एकीकृत होने का 
मगर वास्तविकता नहीं स्वीकार पाते हो तुम भी 
नहीं कर पाते इकरार 
कि 
कितने प्यासे हो तुम…………. कहो ना 

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

कितने प्यासे हो तुम ………. कहो ना ..1


जो खुद को चाहने को तेरा मन हुआ 
तूने अनगिनत रूप बना लिया 
प्रेम का संसार रचाया 
फिर क्यों उसमे तूने 
मन बुद्धि चित्त और अहंकार बसाया 
तू खुद ही खुद को चाहता है 
तभी तो स्वयं को चाहने को 
इतने रूप बनाता है  
हर चाहत का प्यासा तू 
प्रेम के हर रस का भ्रमर सा पान करता है 
फिर क्यों जीव के ह्रदय में 
मन की बेड़ियाँ जकड़ता है 
तू खुद ही जीव खुद ही ईश्वर 
तू ही कर्ता तू ही नियंता 
तुझसे पृथक न कोई अस्तित्व 
फिर क्यों खेल खिलाता है 
किसी को अपनी जोगन बनाता है 
और गली गली नाच नचाता है 
किसी सूर की ऊंगली पकड़ 
खाइयाँ पार कराता है 
किसी तुलसी की कलम में 
बेमोल बिक जाता है 
तो किसी गोपी के ह्रदय में 
विरहाग्नि जलाता है 
ये नटवर नटखट तू 
कैसे खेल रचाता है 
तू ही तू है  सब कुछ 
तेरा ही नूर समाया है 
फिर क्यों कर्मों के लेख की कड़ियाँ सुलझवाता है 
क्यों दोज़ख की आग में झुलसवाता है 
जबकि उस रूप में भी तो 
तू ही दुःख पाता है 
क्योंकि
आंसू हों या मुस्कान
जीव कहो या ब्रह्म
सबमे तू खुद को ही तो पाता है 
फिर क्यों अजीबोगरीब खेल रचता है 
एक अच्छे स्वादिष्ट बने व्यंजन में 
क्यों कीड़े पड़वाता है 
कैसा ये तेरा खेला है 
खुद ही स्वामी खुद ही सेवक बन 
प्रेम की पींगे बढाता है 
पर पार ना कोई पाता है 
कौन सी प्यास है तेरी जो बुझकर भी नहीं बुझती 
जो इतने रूप धारण करने पर भी तू प्यासा ही रह जाता है 
और फिर और प्रेम पाने की चाहत में 
सृष्टि रचना किये जाता है 
पर तेरी प्यास का घड़ा ना भर पाता है 
श्याम ये कैसा तुम्हारा तुमसे ही नाता है 
जो तुम्हें भी नाच नचाता है 
पर ठहराव की जमीन ना दे पाता है 
कहो ना 
कितने प्यासे हो तुम ………. मोहन ?

क्रमश: 

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

तो क्या ............ यही है जीवन सत्य , जीवन दर्शन

पता नहीं 
एक अजीब सी वितृष्णा समायी है आजकल 
सब चाहते हैं 
अगले जनम हर वो कुंठा पूरी हो जाए 
जो इस जनम में न हुयी हो 
कोई कहे अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो 
कोई कहे अगले जनम मोहे बेटा ही दीजो 
सबकी अपनी अपनी चाहतें हैं 
अपने अपने पैमाने हैं 
मगर जब मैं सोचने बैठी 
तो खाली हाथ ही रही 
पता नहीं कोई सोच आकार ही न ले सकी 
किसी चाहत ने सर ही नहीं उठाया 
एक अजब सी उहापोह से गुजरती हूँ 
कभी सारे जहाँ को मुट्ठी में कैद करना चाहती हूँ 
तो कभी शून्य में समाहित हो जाती हूँ 
सोच किसी अंजाम तक पहुँच ही नहीं पाती 
अब दिल और दिमाग 
चाहत और सोच 
सब रस्साकशी से मुक्त से लगते हैं 
तो क्या 
अवसरवादी हूँ किसी अवसर की प्रतीक्षा में 
कोई अमरता का वरदान मिल जाये और लपक लूं 
या संवेदनहीन हो गयी हूँ मैं 
या निर्झर नीर सी बह रही हूँ मैं 
उत्कंठा मुक्त होकर , चाहत मुक्त होकर 
या जीते जी मुक्त हो गयी हूँ मैं .......विषय योनि से 
नहीं जान पा रही ..............
तितिक्षा , अभिलाषा , प्रतीक्षा ...........कुछ भी तो नहीं मेरी मुट्ठी में 
हाथ खाली हैं अब वैसे ही जैसे आते वक्त थे 
तो क्या ............
यही है जीवन सत्य , जीवन दर्शन 
शून्य से शून्य में समाहित होता ............
सूक्ष्म जगत का सूक्ष्म व्यवहार ..........

सोमवार, 29 जुलाई 2013

छहों ऋतुएं मोहे ना भायी सखी री




छहों ऋतुएं मोहे ना भायी सखी री 
जब तक ना हो पी से मिलन सखी री
विरही मौसम ने डाला है डेरा
कृष्ण बिना सब जग है सूना
जब हो प्रीतम का दर्शन
तब जानूं आया है सावन
ये कैसा छाया है अँधेरा
सजन बिना ना आये सवेरा
पी से मिलन को तरस रही हैं
अँखियाँ बिन सावन बरस रही हैं
किस विधि मिलना होए सांवरिया से
प्रीत की भाँवर डाली सांवरिया से
अब ना भाये कोई और जिया को 
विरहाग्नि दग्ध ह्रदय में 
कैसे आये अब चैन सखी री
सांवरिया बिन मैं बनी अधूरी 
दरस लालसा में जी रही हूँ
श्याम दरस को तरस रही हूँ
मोहे ना भाये कोई मौसम सखी री
श्याम बिन जीवन पतझड़ सखी री
ढूँढ लाओ कहीं से सांवरिया को
हाल ज़रा बतला दो पिया को
विरह वेदना सही नहीं जाती
आस की माँग भी उजड़ गयी है
बस श्याम नाम की रटना लगी है 
मीरा  तो मैं बन नहीं पाती
राधा को अब कहाँ से लाऊं 
कौन सा अब मैं जोग धराऊँ
जो श्यामा के मन को भाऊँ
ए री सखी ..........उनसे कहना
उन बिन मुझे ना भाये कोई गहना
हर मौसम बना है फीका
श्याम रंग मुझ पर भी डारें
अपनी प्रीत से मुझे भी निखारें
मैं भी उनकी बन जाऊँ
श्याम रंग में मैं रंग जाऊँ
जो उनके मन को मैं भाऊँ
तब तक ना भाये कोई मौसम सखी री 
कोई तो दो उन्हें संदेस सखी री.............

सोमवार, 22 जुलाई 2013

अखंड जोत प्यासी है






अखण्ड जोत प्यासी है 
हरि दर्शन की अभिलाषी है
तन मन भीगा राम रस मे 
फिर भी देखो प्यासी है 
तृष्णा सारी मिट गयी 
पल पल देखो जल रही है
प्रभु विरह में पल रही है
घर आँगन रौशन कर रही 
भंवर जाल में फँसी 
प्रभु स्नेह को तरस रही है
ये कैसी तुम्हारी महिमा न्यारी है
दर्शन दे दो कृपानिधान
जन्म जन्म की प्यासी है
ये तुम्हारी दिव्य ज्योति सुकुमारी 
दिव्य दर्शनों की अभिलाषी है 
अखंड जोत प्यासी है 
प्रभु अखंड जोत प्यासी है .............


गुरु पूर्णिमा पर :

ज्ञान की ज्योत जगाई 
भक्ति की अलख लगाई 
गुरु बिन ज्ञान कहाँ से पाती 
आनन्दघन से कहाँ मिल पाती 
धन्य धन्य हो गयी आज 
जो खुदाई नूर से हो गयी लाल 

श्री गुरु चरणों में शत - शत नमन

https://www.youtube.com/watch?v=1X6-cYyz134


शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

यूँ ही नहीं पहेलियाँ बुझाओ

सुना है 
प्रेम पहला द्वार है
जीवन का 
सृष्टि का
रचयिता का
रचना का
सृजन का
मोक्ष का 
मगर उसका क्या
जो इनमे से 
कुछ ना चाहता हो
ना जीवन
ना सृजन
ना मोक्ष
और फिर भी
पहुँच गया हो
दूसरे द्वार पर
या कहो 
अंतिम छोर पर
आखिरी द्वार पर
मगर ये ना पता हो
अब इसके बाद 
क्या बचा
कहाँ जाना है
क्या करना है
कौन है उस पार
जिसकी सदायें 
आवाज़ देती हैं
जिसे ढूँढने 
हर निगाह चल देती है
जिसे चाहने की 
हर दिल को शिद्दत होती है
जिसे पाना 
हर रूह की चाहत होती है
ये अंतिम द्वार के उस पार
कौन सा शून्य है
कौन सा अक्स है
कौन सा शख्स है
कौन सा तिलिस्म है
कौन सी उपमा है
कौन सी अदृश्य तरंग है
जो चेतनाशून्य कर देती है
जो ना दिखती है 
ना मिलती है
फिर भी अपनी 
अनुभूति दे जाती है
सब खुद में समाहित करती है
क्या वो प्रेम का लोप है
क्या अंतिम द्वार पर 
प्रेम दिव्यजीवी हो जाता है 
या फिर प्रेम 
सिर्फ पहले द्वार पर ही रुक जाता है
अंतिम द्वार पर तो 
प्रेम का भी प्रेम में ही विलुप्तिकरण  हो जाता है
और सिर्फ 
अदृश्य तरंगों में ही प्रवाहित होता है 
और वहाँ
प्रीत ,प्रेम और प्रेमी तत्वतः एक हो जाते हैं ..........निराकार में परिभाषित हो जाते हैं 
कौन है उस पार ...........एक आवाज़ तो दो
बताओ तो सही ...........अपने होने का बोध तो कराओ 
यूँ ही नहीं पहेलियाँ बुझाओ .........ओ अंतिम छोर के वासी !!!

रविवार, 14 जुलाई 2013

प्रेम का गीत





मैने तो बांसुरी में राधा राधा पु्कारा 
जाने कैसे हर सुर संगीत बन गया 
जो ना कहा ना सुना किसी ने 
जाने कैसे वो प्रेम का गीत बन गया 

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

इतना सोणा तुझे किसने बनाया

Photo: ओहो बहुत स्टाइल में हो आज तो 
बताओ तो ज़रा किसका माखन चुराया है 
किसकी हाँडी फ़ोडी है 
किसके बछडे खोले हैं
 किससे की बरजोरी है 
ये आँखों की चकमक , 
ये होठों की मुस्कान 
ये चेहरे पर दिखती शैतानियत चमक 
सब बयाँ कर रही है 
कि आज जरूर किसी गोपी के मन को फिर हरा है तुमने ..........मोहन!
बोलो सच है ना !!!!!!!

ले जा रही हूँ इस नटखट चितवन को अपने संग 
ए ........एक बार मुझे भी रिझाओ न ऐसे ही !!!!!!!


इतना सोणा तुझे किसने बनाया जी करे देखती रहूँ …………
(अभी इस नटखट का ये रूप देख ये भाव जाग गये )

ओहो बहुत स्टाइल में हो आज तो 
बताओ तो ज़रा किसका माखन चुराया है 
किसकी हाँडी फ़ोडी है 
किसके बछडे खोले हैं
 किससे की बरजोरी है 
ये आँखों की चकमक , 
ये होठों की मुस्कान 
ये चेहरे पर दिखती शैतानियत चमक 
सब बयाँ कर रही है 
कि आज जरूर किसी गोपी के मन को फिर हरा है तुमने ..........मोहन!
बोलो सच है ना !!!!!!!

ले जा रही हूँ इस नटखट चितवन को अपने संग 
ए ........एक बार मुझे भी रिझाओ न ऐसे ही !!!!!!!


इतना सोणा तुझे किसने बनाया जी करे देखती रहूँ …………

शनिवार, 29 जून 2013

सखी री कोई उनको संदेसा पहुँचा दे



सखी री कोई उनको संदेसा पहुँचा दे

तेरी प्यारी राह तकत है

बैठी बिरहा की मारी
सखी री कोई उनको संदेसा पहुँचा दे

सुबह शाम का होश नहीं है

तनमन की सुध बिसरत है
कोई प्रियतम से मिलवा दे
सखी री कोई उनको संदेसा पहुँचा दे

मेरे सलोने नटवर नागर

नैनन की प्यास बुझा दे
बस इक बेर दरस दिखा दे
सखी री कोई उनको संदेसा पहुँचा दे

शुक्रवार, 21 जून 2013

कैसे कहूं सखी मन मीरा होता तो श्याम को रिझा लेता




कैसे कहूं सखी 

मन मीरा होता तो 
श्याम को रिझा लेता 
उन्हे नयनो मे समा लेता 
ह्रदयराग सुना देता 
पर ये तो निर्द्वन्द भटकता है
ना कोई अंकुश समझता है
या तो दे दो दीदार सांवरे
नहीं तो दर बदर भटकता है
पर मीरा भाव ना समझता है
ना मीरा सा बनता है
फिर कैसे कहूं सखी
मन मीरा होता तो
श्याम को रिझा लेता

अब तो एक ही रटना लगाता है
किसी और भुलावे में ना आता है
अपने कर्मों की पत्री ना बांचता है
अपने कर्मों का ना हिसाब लगाता है
जन्म जन्म की भरी है गागर
पापों का बनी है सागर
उस पर ना ध्यान देता है
बस श्याम मिलन को तरसता है
दीदार की हसरत रखता है
ये कैसे भरम में जी रहा है
फिर कैसे कहूं सखी
मन मीरा होता तो
श्याम को रिझा लेता

जाने कहाँ से सुन लिया है
अवगुणी को भी वो तार देते हैं
पापी के पाप भी हर लेते हैं
और अपने समान कर लेते हैं
वहाँ ना कोई भेदभाव होता है
बस जिसने सर्वस्व समर्पण किया होता है
वो ही दीदार का हकदार होता है
बता तो सखी ,
अब कैसे ना  कहूं
मन मीरा होता तो
श्याम को रिझा लेता

मंगलवार, 11 जून 2013

धीर धरो सखि पिया आवेंगे



धीर धरो सखि पिया आवेंगे 
गले लगावेंगे 
झूला झुलावेंगे 
मन के हिंडोलों पर 
पींग बढावेंगे 
नैनो से कहो 
नीर ना बहावें 
राह बुहारें 
चुन चुन प्रीत की 
कलियाँ बिछावें 
उम्मीद की बाती जलावें 
प्रेम रस की फ़ुहारें छलकावें 
रुक ना पावेंगे 
दौडे चले आवेंगे 
तेरे प्रेम पर वारि वारि जावेंगे 
धीर धरो सखि पिया आवेंगे 

प्रेम की प्यास उधर भी जगी है 
प्यासी मुरली अधरों पे सजी है 
प्रेम अगन इतना बढ़ा ले 
कि मोहन कुंजन में रुक न पावे 
सखियाँ को छोड़ दौड़े दौड़े आवें 
प्रेम मुरलिया तुझे ही बना लें 
और अधरों पर सजा लें 
फिर प्रेम की रागिनी बजावें 
सुध बुध अपनी भी बिसरावें 
तू मैं का हर भेद मिटावें 
प्रेम रस धार बहावें 
यूं मुरली की तान बढावें 
रसो वयि सः तुझे बनावें 
मधुर मिलन यूं हो जाए 
साकार से निराकार बनावें 
बस तू 
प्रेम अगन इतना बढ़ा ले 
धीर धरो सखि पिया आवेंगे 

बुधवार, 5 जून 2013

कौन आँगन मन पंछी ले उडा .............




लोग पूछते हैं कैसे हो और मैं कह देती हूँ बढिया हूँ 
अब कैसे बताऊँ जी की दशा ,कौन समझेगा यहाँ 
कौन आँगन मन पंछी ले उडा .............

मुंडेर पर काक कोई आता नहीं 
पिया का संदेसा लाता नहीं
हिलोरें दिल में उठती नहीं 
बेचैनी किसी खंजर से कटती नहीं 
सखि , किसे कहूँ मैं मन की दशा 
कौन आँगन मन पंछी ले उडा .............

ग्रीष्म का ताप अखरता नहीं 
आंतरिक ताप भाप बन उड़ता नहीं 
यादों की लू भी लगती नहीं 
सांकल कोई बजती नहीं 
सखी , कैसे पाऊँ उनका पता 
कौन आँगन मन पंछी ले उडा .............


बांसुरी कोई बजती नहीं 
वेदना ह्रदय की मिटती नहीं 
विरह के बादल छंटते नहीं 
प्रीत के मनके पिरते नहीं 
सखी , माला मैं कैसे गूंथूं बता 
कौन आँगन मन पंछी ले उडा .............



बुधवार, 29 मई 2013

प्रेम कभी नहीं होता स्खलित


प्रेम मोहताज़ नहीं होता
किसी अवलंबन का
प्रेम का बीज
स्वतः  अंकुरित होता है
नहीं चाहिए प्रेम को
कोई आशा ,
कोई अपनापन
कोई चाहत
प्रेम स्फुरण
आत्मिक होता है
क्योंकि प्रेम
प्रतिकार नहीं चाहता
प्रेम के बदले
प्रेम नहीं चाहता
फिर क्या करेगा
किसी ऊष्मा का
किसी नमी का
किसी ऊर्जा का
प्रेम स्व अंकुरण है
बहती रसधार है
फिर कैसे उसे
कोई पोषित करे
प्रेम तो स्वयं से
स्वयं तक पहुँचने का
जरिया है
फिर कैसे खुद को खुद
से कोई जुदा करे
कैसे कह दें
प्रेम स्खलित हो जायेगा
प्रेम कुछ पल के लिए
सुप्त बेशक हो जाये
अपने में ही बेशक
समा जाये
मगर प्रेम कभी
नहीं होता स्खलित
प्रेम तो दिव्यता का भान है

बुधवार, 22 मई 2013

पूर्णविराम से पहले !!!!!!!!

अर्धविराम की अवस्था हो
मगर राह ना सूझती हो
वर्णसंकर सी पगडण्डी हो
मगर राही ना कोई दिखता हो
अन्जान द्वीपों सी भटकन हो
मगर रूह ना कोई मिलती हो
एक आखिरी दांव खेला हो
और पासा भी उल्टा ही पड़ा हो
बताओ तो ज़रा फिर
चौसर के खेल में
कब शकुनी कोई जीता है और धर्मराज कोई हारा है ...........पूर्णविराम से पहले !!!!!!!!

सोमवार, 13 मई 2013

आँख में पड़ी किरकिरी सा रडकता तुम्हारा वजूद


आँख में पड़ी किरकिरी सा रडकता तुम्हारा वजूद 
देखो तो कभी मोती बन ही नहीं पाया 
जानते हो क्यों .............
क्योंकि 
मैने सहेजा था सिर्फ़ प्रेम को और तुमने अपने अहम को 
सिर्फ मन रुपी माखन चुराना 
या प्रीत के नयन बाण चलाना ही काफी नहीं होता 
प्रीत निभाने के भी कुछ दस्तूर हुआ करते हैं ........मोहन ! 
अगर तुम हो तो ........

रविवार, 5 मई 2013

यूं ठगे जाने का शौक यहाँ भी तारी नहीं


जो नहीं अपना बनाना 
जो नहीं मिलने आना 
जो नहीं दरस दिखाना 
फिर नहीं हमारा तुम्हारा 
निभाव मोहन ! 
यूं ठगे जाने का शौक 
यहाँ भी तारी नहीं 

मन के बीहड़ों में जाऊं 
या कपडे रंगाऊं 
कहो तो मोहन 
कौन सा जोग धरूँ
जो तुम्हारे मन भाऊँ 
गर नहीं है बताना 
नहीं रास रचाना 
फिर नहीं हमारा तुम्हारा 
निभाव मोहन !

जो एक कदम तुम बढाओ 
तो दूजा मैं भी धराऊँ 
जो तुम नैन मिलाओ 
तो मैं भी मतवाली बन जाऊं 
जो तुम प्रेम का प्रतिउत्तर प्रेम से दो 
तो मैं भी प्रेममयी बन जाऊं 
गर नहीं है ऐसा कोई इरादा 
बस झूठा ही है सारा बहकाना 
और अधर में है लटकाना 
फिर नहीं हमारा तुम्हारा 
निभाव मोहन !