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बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

कृष्ण लीला.......... भाग 39



इक दिन कान्हा कलेवा बांधे 
समस्त अंगों पर सुन्दर चित्रकारी किये
फूलों के गहने पहन
पशु पक्षियों की बोली बोलते
ग्वाल बालों संग
बछड़े चराने गए
सभी बालोचित क्रीड़ायें करने लगे
श्याम सुन्दर संग मनोहारी
खेल खेलने लगे
और आनंद मग्न होने लगे
तभी कंस का भेजा
अघासुर नामक दैत्य 
अजगर रूप बनाकर आया है
और राह में पर्वताकार रूप 
रख बैठ गया है
ग्वाल मंडली जब वहाँ पहुंची है
तब उसे देख यूँ बोली है
ये कौन सा पर्वत है
अब से पहले तो नहीं देखा
ये तो अजगर समान लगता है
तो दूसरा बोला
सूर्य किरण से बादल लाल हो गए हैं
मानो किसी अजगर का ऊपरी होंठ हो 
और जो बादलों की परछाईं
धरा पर पड़ती है
मानो वो इसका निचला होंठ हों
तभी तीसरा बोल पड़ा
ये दायीं और बायीं ओर की 
गिरी कंदराएं अजगर के
जबड़े जैसी लगती हैं
और ऊंची- ऊंची शिखर पंक्तियाँ
इसकी दाढें लगती  हैं
चौथा बोला 
ये लम्बी चौड़ी सड़क तो
अजगर की जीभ सरीखी लगती है
और गिरी शिखरों के बीच का अन्धकार
इसके मुख का भीतरी भाग लगता है 
तभी इक ग्वाल बाल बोल पड़ा
देखो - देखो इधर 
जंगल में आग लगी है
तभी तीखी और गरम हवा चली है
मानो कोई अजगर 
गरम- गरम सांस छोड़ रहा हो
तभी इक ग्वाल बाल बोल उठा
चलो आगे बढ़कर देखा जाये
इस गिरी कन्दरा में घुसा जाये
हमें किसी का क्या डर
जब हमारा कान्हा है हमारे संग
गर कोई राक्षस हुआ भी तो
बकासुर सम नष्ट हो जायेगा
कान्हा के हाथों मारा जायेगा
इतना कह ग्वाल बाल
उसके मुख में प्रवेश करते गए
इधर कृष्ण उनकी बात सुन सोचते रहे
इन्हें रोकना होगा
ये तो सर्प को रस्सी समझ रहे हैं
मगर जब तक रोकते
उससे पहले तो ग्वाल बाल
उसके मुख में प्रवेश कर गए


अघासुर और कोई नहीं
बकासुर और पूतना का भाई था
कान्हा से बदला लेने आया था
उसने अपना मुख ना बंद किया
जब तक कृष्ण ने ना प्रवेश किया
जैसे ही प्रभु ने अन्दर प्रवेश किया
अघासुर ने अपना मुख बंद किया
ये दृश्य देख देवता घबरा गए
हाय -हाय का उच्चारण करने लगे
जब भगवान ने देखा
मेरे भक्त परेशान हुए
तब उसके जबड़े में अपने 
शरीर का विस्तार किया
और अघासुर की श्वासों को बंद किया
उसकी आँखें उलट गयीं
व्याकुल हो छटपटा गया
और ब्रह्मरंध्र को फोड़ प्राणांत किया
उसकी दिव्य ज्योति प्रभु में समा गयी
ये देख देवता सब हर्षित हुए
कर जोड़ प्रभु की स्तुति करने लगे
प्रभु ने ग्वाल बाल सब जिला दिए
प्रभु का गुणगान होने लगा 
आकाश में दुदुभी नगाड़े बजने लगे
अप्सराएं नृत्य करने लगीं
मंगलमय वाद्य बजने लगे
जय जयकार की मंगलध्वनि
ब्रह्मलोक तक पहुँच गयी
तब ब्रह्मा जी ने वह ध्वनि सुनी
और आकर अद्भुत दृश्य देखा
और उनका मन भी 
प्रभु माया से मोहित हो गया

जब अजगर का वो शरीर सूख गया
ग्वाल बालों का वो क्रीड़ास्थल बना
मगर ये लीला ठाकुर ने 
पांचवें वर्ष में की 
जिसका वर्णन ब्रज वासियों को
ग्वालबालों ने छठे वर्ष में किया
ये सुन परीक्षित ने 
शुकदेव जी से पूछ लिया
गुरुदेव ये कैसे संभव हुआ
एक समय की  लीला का वर्णन
दूसरे समय में भी वर्तमानकालीन रहे 
अवश्य इसमें जरूर प्रभु की 
कोई महालीला होगी
कृपा कर गुरुदेव वो सुनाइए
प्रभु की  दिव्य लीलाओं का पान कराइए 


क्रमशः ..........

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

कृष्ण लीला ........भाग 38




इक दिन जब मोहन ने 
राधा जी के कहने पर 
दूध दुहा था
और राधा जी ने जाने का 
उपक्रम किया था 
तब मोहन ने अपनी
चित्ताकर्षक मुस्कान की मोहिनी
राधा पर डाली है
रास्ते में सखियों ने 
जैसे ही मोहन का नाम लिया 
राधा के हाथ से 
दूध का बर्तन छूट गया 
अचेत होते सिर्फ
यह ही शब्द 
अधरों पर आया है
मुझे काले साँप ने काटा है
इतना सुन सखियाँ 
 घर पर ले आयीं
और कीर्ति जी को
राधा की व्यथा बतलाई
जिसे सुन मैया बहुत घबरायी 
और झाड फूंक करवाई 
पर राधा  प्यारी को 
आराम ना आता 
मंत्र यन्त्र भी बेकार हुआ जाता 
जो सखी राधा की प्रीत पहचानती थी 
उसने उपाय बतलाया 
नन्द लाल का बेटा 
साँप काटे का मंत्र जानता है
इतना सुन कीर्ति को याद आ गया
जो राधा ने बतलाया था
वो दौड़ी- दौड़ी यशोदा के पास गयी
हाथ जोड़ विनती करने लगी
श्याम सुन्दर को साथ भेज देना
राधा का जीवन बचा लेना
सुन मैया बोल उठी
मेरा लाला तो बालक है
वो झाड़ फूंक क्या जाने
किसी नीम हकीम को दिखलाओ
अच्छे से राधा का इलाज करवाओ
तब कीर्ति ने सारा किस्सा बयां किया
कैसे मनमोहन ने एक गोपी को बचा लिया

ललिता जी जो दोनों की 
प्रीत पहचानती थीं
किस साँप ने काटा था
सब जानती थीं
जाकर चुपके से 
नंदलाल से कहा
जिसकी तुमने गौ दूही थी
वो अचेत पड़ी है
बस तुम्हारे नाम पर
आँखें खोल रही है
कोई मन्त्र यन्त्र ना काम करता है
तुम्हारे श्याम रंग रुपी 
सांप ने उसे डंसा है
ये विष लहर ना
किसी तरह उतर पाती है
राधा को रह - रहकर
तुम्हारी याद सताती है
विरह अग्नि में जल रही है
अपनी चंद्रमुखी शीतलता से
उसकी अगन शीतल करो
यदि सच में भुजंग ने डंसा हो 
तो भी मैं उन्हें अच्छा कर दूँगा 
कह मोहन घर को गए
वहाँ मैया ने हँसकर पूछा 
कान्हा तुमने साँप डँसे का
मंत्र कहाँ से है सीखा 
जाओ राधा को साँप ने डंसा है
उसे बचा लेना
इतना सुन मोहन
राधिका जू के पास गए
और अपनी मुरली को
राधा से छुआ दिया 
जिससे राधा का ह्रदय
ठंडा हुआ
और प्रेमाश्रु झड़ने लगे
ज्यों ही राधा को होश आया है
 कीर्ति जू  ने सारा हाल
राधा को सुनाया है
और बड़े प्रेम से
नन्कुमार को गोद में उठाया है
इस प्रकार राधा मोहन की 
प्रीत ने रंग चढ़ाया है
जो हर ब्रज वासी के 
मन को भाया है
मगर ललिता जी ने
असल मर्म को पाया है
ये भेद कोई न जान पाया है
अलौकिक प्रीत को लौकिक जन क्या जाने
ये तो कोई प्रेम दीवाना ही पहचाने 
जिसने खुद को पूर्ण समर्पित किया हो
वो ही प्रेम का असल तत्त्व है पहचाने 

क्रमशः ......................

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

कृष्ण लीला ........भाग 37





मगर राधा के मन को 
मोहन ऐसे भाए हैं
उनके बिना चैन
ना जिया को आये हैं 
तीसरे दिन दूध दोहने के बहाने
कान्हा के द्वारे पर आई हैं
और मोहन को आवाज़ लगायी है 
राधा प्यारी के शब्दों ने 
मोहन की प्रीत बढ़ाई है
मैया से बोल उठे , "मैया 
कल मैं यमुना का रास्ता भूल गया था
इक गोपी ने लाकर 
घर पर छोड़ा था 
अभी वो ही गोपी आवाज़ लगायी है
पर लज्जा के कारण
ना भीतर आई है
तुम ही उसे बुला लो मैया
इतना कह मोहन ने
अपनी माया फैलाई है
और मैया के ह्रदय में 
श्यामा की प्रीत बढ़ाई है 
तब मैयाके कहने पर
श्यामसुंदर ने 
राधा की बाँह पकड़ी है
और घर के भीतर लाये हैं 
राधा जू की सुन्दरता में 
मैया ने सुध बुध बिसरायी है 




फिर धैर्य धारण कर
बड़े प्रेम से राधा जी का
परिचय जाना है
कौन गाँव की बेटी हो
कौन तुम्हारे तात हैं
पहले ना कभी देखा है
इतना सुन राधा ने 
अपना नाम पता बतलाया है
जिसे सुन यशोदा का
ह्रदय हर्षाया है
तुम्हारी माँ बड़ी कुलवंती हैं 
तुम बृष भानु लली हो 
कह मैया ने गले लगाया है
और मन में ये ख्याल उतार आया है
कितना अच्छा हो 
मेरे मोहन से इसका विवाह हो
फिर मैया ने श्यामा जी का 
श्रृंगार किया है
और गहने कपडे पहना
मेवा मिठाई तिल चावली 
गोद में डाली है
और कान्हा के साथ 
खेलने की आज्ञा दी है
उन दोनों को खेलते देख
मैया वारी वारी जाती  है
और बार बार उन्हें
मोहन संग खेलने को बुलाती है
जब राधा प्यारी श्रृंगार कर
अपने घर को पहुंची है
तब उनकी मैया अचरज में बोली हैं
ये किसने श्रृंगार किया है
तब राधा जी ने बतला दिया
तुम्हारा और बाबा का नाम पूछकर
यशोदा जी ने श्रृंगार किया है
तिल चावली मेवा मिठाई 
दे विदा किया है
घर में घर में बात फ़ैल गयी
यशोदा के मन की बात जान
कीर्ति जी अपने मन की बात कही है
मेरी बेटी दामिनी सो
मोहन प्यारा श्याम घटा सा
दोनों की जोड़ी मन को भाई है
दोनोका विवाह हो जाये
ये बात बृष भानु जी को बताई है
अब राधा प्यारी नित्य
मोहन प्यारे संग खेला करती थीं
प्रीत को रोज नए रंग में रंगती थीं 

क्रमशः ..........

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

.कृष्ण लीला .........भाग 36



इक दिन मोहन 
मन -मोहिनी रूप बनाये
यमुना किनारे खेलने गए
किरीट कुंडल पहने
उपरना ओढ़े 
लकड़ियाँ हाथ में लिए 
पीताम्बर डाले सखा के 
कंधे पर हाथ धरे खड़े थे
उसी समय बृषभानु दुलारी 
राधिका प्यारी अति सुंदरी 
सात आठ वर्ष की अवस्था वाली 
यमुना स्नान को आई थीं
इक दूजे से नैना चार हुए
प्रीति पुरानी उमड़ पड़ी
दोनों की प्रीत जग पड़ी
हँसकर पूछा मोहन ने
ए सुंदरी गोरी- गोरी
ज़रा अपना नाम बताओ
कौन देस में रहती हो
कहाँ तुम्हारा धाम है 
कौन सा तुम्हारा गाम है 
ज़रा हमें भी बतलाओ
आज तक तुम्हें नहीं देखा है
प्रीती भरी वाणी ने 
राधा का मन मोह लिया
बृषभानु लली हूँ
राधिका नाम है
घर में सखियों संग खेला करती हूँ
बाहर नहीं निकलती हूँ 
इस कारण नहीं देखा है
पर मैंने सुना है
नन्द जी का बेटा
माखन चुरा कर खाता है
गोपियों को बहुत खिजाता है 
क्या तुम वो ही नंदकुमार हो ?
सुन मोहन बोल उठे
तुम्हारा मैंने क्या चुराया है 
बस तुम मेरे मन को भायी हो
सो घडी दो घडी आकर खेला करना
और नहीं कुछ चाहत है
इतना सुन राधा जी सकुचा गयीं
और मन में मोहन की प्रीत रख
बरसाने आ गयीं 


संध्या समय दूध दोहने का बहाना बना
मोहन से मिलने आ गयीं
क्योंकि मन मोहन में लग गया था
मोहिनी मूरत में अटक गया था
प्रीत पुरानी जग गयी थी 
जब दोनों की भेंट हुई थी 
श्यामसुंदर की माया से 
बदली छा गयी थी
दोनों ने प्रेमपूर्वक बात की
और जब देर हुई जाना
तब राधा जी घबरा गयीं
तब जल्दी में मोहन ने उनकी सारी ओढ़ ली 
और अपनी पीताम्बरी उन्हें दी
इधर मोहन सारी ओढ़े घर पर आये हैं 
जिसे देख यशोदा विचार करती हैं
जरूर किसी गोपी से प्रीत कर
उसकी सारी ले ली है 
अंतर्यामी मैया के मन की जान गए 
और मैया से बोल उठे
मैया आज यमुना किनारे 
जब गौओं को पानी पिलाता था 
एक गोपी स्नान के लिए 
सारी रख यमुना में उतर गईं
जैसे ही एक गौ भागी 
मैं उस गौ के पीछे भगा
गोपी ने डर के मारे
मेरी पीताम्बरी ओढ़ लिया
और अपनी सारी छोड़ गयी
मैं उस ब्रजबाला को जानता हूँ
अभी उससे पीताम्बर लेकर आता हूँ
इतना कह घर से बाहर
जाकर मोहन ने माया से 
सारी को  पीताम्बर बनाया
और अपने झूठ को 
और मैया की निगाह में सच बनाया 

इधर राधा प्यारी घबरायी सी 
पीताम्बर ओढ़े अपने घर गयी
उसकी हालात देख उनकी मैया बोल पड़ी
बेटी तेरी ये दशा कैसे हुई 
घर से तो भली चंगी थी गयी
तब राधा जी ने बात बनाई
इक गोपी मेरे साथ थी जिसे
सांप ने काटा था 
तब नंदलाल के झाडे से 
उसने होश संभाला था 
उसी का हाल देख मैं 
मैया डर गयी 
और गलती से उसकी चूनर ओढ़ ली 
मैया बिटिया को बारम्बार गले लगाती है
और समझाती हैं
तुम बाहर दूर खेलने मत जाना
अब मैं घर और गाँव में खेलूंगी
मैया तुम ना चिंता करना
कह राधाने आश्वासन दिया 

क्रमशः ...........

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

कृष्ण लीला .........भाग 35


जब कंस ने वत्सासुर का वध सुना
तब उसके भाई बकासुर को भेज दिया
बगुले का रूप रखकर वो आया है
जलाशय के सामने उसने डेरा लगाया है
पर्वत समान रूप बना 
घात लगाकर बैठा है 
कब आयेंगे कृष्ण 
इसी चिंतन में ध्यानमग्न बैठा है
मोहन प्यारे ने उसे पहचान लिया है
ग्वालबाल देखकर डर रहे हैं
तब मोहन प्यारे बोल पड़े हैं
तुम भय मत करना
हम इसको मारेंगे
इतना कह श्यामसुंदर उसके निकट गए
जैसे ही उसने मोहन को देखा है
वैसे ही उन्हें पकड़ निगल लिया है
और प्रसन्न हुआ है
मैंने अपने भाई के वध का बदला लिया है
इधर ग्वाल बाल घबरा गए 
रोते -रोते मैया को बताने चले
थोड़ी दूर पर बलराम जी मिल गए
सारा वृतांत उन्हें सुनाया है
धैर्य धरो शांत रहो 
अभी कान्हा आता होगा
तुम ना कोई भय करो
कह बलराम जी ने शांत किया है
जब कान्हा ने जाना
सब ग्वालबाल व्याकुल हुए हैं
तब अपने अंग में ज्वाला उत्पन्न की है
जिससे उसका पेट जलने लगा
और उसने घबरा कर 
श्यामसुंदर को उलट दिया
तब नन्दलाल जी ने उसकी 
चोंच पर पैर रख 
ऊपर की ओर उसे चीर दिया 
ये देख ग्वालबाल आनंदित हुए 
देवताओं ने भी दुन्दुभी बजायी है 
ग्वालबालों ने मोहन को घेर लिया
और बृज में जाकर सब हाल कह दिया
जिसे सुन सभी हैरत में पड़ गए
पर नंदबाबा ने मोहन के हाथों
खूब दान करवाया है 
आज मेरा पुत्र मौत के मुँह से
बचकर आया है
सब मोहन को निहारा करते हैं
खूब उनकी बलैयां लेते हैं
जब से ये पैदा हुआ 
तब से ना जाने कितनी बार
मौत को इसने हराया है
हे प्रभु हमारे मोहन की 
तुम रक्षा करना
कह - कह ब्रजवासी दुआएँ करते हैं
ये देख मैया बोली
लाला तुम ना बछड़े 
चराने जाया करो 
तब मोहन बातें बनाने लगे
मैया को बहलाने लगे
हमको ग्वाल बाल अकेला छोड़ देते हैं
अब मेरी बला भी 
बछड़ा चराने ना जावेगी
बस तुम मुझको 
चकई भंवरा मंगा देना
तब मैं गाँव में ही खेला करूंगा
इतना सुन यशोदा ने
चकई भंवरा मंगाया है
अब मोहन ग्वालबालों के संग
ब्रज में चकई भंवरा खेला करते हैं
जिसे देखने गोपियाँ आया करती हैं
नैनन के लोभ का ना संवरण कर पाती हैं
प्रीत को अपनी ऐसे बढाती हैं
जब कोई बृजबाला उनके
निकट खडी हो जाती है
तब उनकी प्रीत देख
मोहन हँसकर चकई ऐसे उड़ाते हैं
वो गोपी के गहनों में फँस जाती है
जिसे देखकर वो गोपी 
अंतःकरण में प्रसन्न हो 
प्रगट में गलियाँ देती है 
मोहन ऐसी मोहिनी लीलाएं
नित्य किया करते हैं
जिसके स्वप्न में भी दर्शन दुर्लभ हैं
वो मोहन गोप गोपियों संग
ब्रज में खेला करते हैं
बड़े पुण्य बडभागी वो नर नारी हैं 
जिन्होंने मोहन संग प्रीत लगायी है 
फिर भी न हम जान पाते हैं
उन्हें न पहचान पाते हैं 
वो तो आने को आतुर हैं
मगर हम ही ना उन्हें बुला पाते हैं 
ना यशोदा ना गोपी बन पाते हैं ...

क्रमशः ...........

रविवार, 22 जनवरी 2012

कृष्ण लीला .........भाग 34


 कान्हा की वर्षगांठ का दिन था आया
नन्द बाबा ने खूब उत्सव था मनाया 
गोप ग्वालों ने नन्द बाबा संग किया विचार 
यहाँ उपद्रव लगा है बढ़ने 
नित्य नया हुआ है उत्पात 
जैसे तैसे बच्चों की रक्षा हुई 
और तुम्हारे लाला पर तो 
सिर्फ प्रभु की कृपा हुयी 
कोई अनिष्टकारी अरिष्ट 
गोकुल को ना कर दे नष्ट
उससे पहले क्यों ना हम सब
कहीं अन्यत्र चल दें
वृन्दावन नाम का इक सौम्य है वन
बहुत ही रमणीय पावन और पवित्र 
गोप गोपियों और गायों के मनभावन 
हरा भरा है इक निकुंज 
वृंदा देवी का पूजन कर 
गोवर्धन की तलहटी में
सबने जाकर किया है निवास 
वृन्दावन का मनोहारी दृश्य
है सबके मन को भाया 
राम और श्याम तोतली वाणी में
बालोचित लीलाओं का सबने है आनंद उठाया 
ब्रजवासियों को आनंद सिन्धु में डुबाते हैं 
कहीं ग्वाल बालों के संग
कान्हा बांसुरी बजाते हैं
कभी उनके संग बछड़ों को चराते हैं
कहीं गुलेल के ढेले फेंकते हैं
कभी पैरों में घुँघरू बांध 
नृत्य किया करते हैं
कभी पशु पक्षियों की बोलियाँ 
निकाला करते हैं
तो कहीं गोपियों के 
दधि माखन को खाते हैं
नित नए नए कलरव करते हैं
कान्हा हर दिल को 
आनंदित करते हैं 



जब कान्हा पांच बरस के हुए
हम भी बछड़े चराने जायेंगे
मैया से जिद करने लगे
बलदाऊ से बोल दो 
हमें वन में अकेला ना छोडें
यशोदा ने समझाया
लाला , बछड़े चराने को तो
घर में कितने चाकर हैं 
तुम तो मेरी आँखों के तारे हो
तुम  क्यों वन को जाते हो
इतना सुन कान्हा मचल गए
जाने ना दोगी तो 
रोटी माखन ना खाऊँगा
कह हठ पकड़ ली  
यशोदा बाल हठ के आगे हार गयी
और शुभ मुहूर्त में 
दान धर्म करवाया 
और ग्वाल बालों को बुलवाया
श्यामसुंदर को उन्हें सौंप दिया
और बलराम जी को साथ में 
भेज दिया
जब कंस ने जाना 
नंदगोप ने वृन्दावन में
डाला बसेरा है 
तब उसने वत्सासुर राक्षस को भेज दिया
बछड़े का रूप रखकर आया है
और बछड़ों में मिलकर
घास चरने लगा है
उसे देख बछड़े डर कर भागने लगे
पर श्यामसुंदर की निगाह से
वो ना बच पाया है
उसे पहचान केशव मूर्ति ने कहा 
बलदाऊ भैया ये 
कंस का भेजा राक्षस है 
बछड़े का रूप धर कर आया है
चरते - चरते वो 
कृष्ण के पास पहुँच गया 
तब कान्हा ने उसका
पिछला पैर पकड़ 
घुमा कर वृक्ष की जड़ पर पटका 
एक ही बार में प्राणों का 
उसके अंत हुआ है
यह देख देवताओं ने पुष्प बरसाए हैं
ग्वालबाल भी उसका अंत देख हर्षाये हैं


क्रमशः ...........

बुधवार, 18 जनवरी 2012

कृष्ण लीला ........भाग 33


इक दिन फल बेचने वाली आई है
जन्म -जन्म की आस में

मोहन को आवाज़ लगायी है

अरे कोई फल ले लो
आवाज़ लगाती फिरती है
मगर आज ना टोकरा खाली हुआ
एक भी फल ना उसका बिका
रोज का उसका नित्य कर्म था
प्रभु दरस की लालसा में 
नन्द द्वार पर आवाज़ लगाती थी
और दरस ना  पा 
निराश हो चली जाती थी
मगर आज तो 
अँखियों में नीर भरा है
करुण पुकार कर रही  है
वेदना चरम को छू रही है 
स्वयं का ना भान रहा 
सिर्फ मोहन के नाम की रट लगायी है
कब दोगे दर्शन गिरधारी
कब होगी कृपा दासी पर
इक झलक मुझे भी दिखलाओ
जीवन मेरा भी सफल बनाओ

कातर दृष्टि से द्वार को देख रही है 
मोहन के दरस को तरस रही है
दृढ निश्चय आज कर लिया है
जब तक ना दर्शन होंगे
यहीं बैठी रहूंगी
जब मोहन ने जान लिया
आज भक्त ने हठ किया है
तो अपना हठ  छोड़ दिया
यही तो प्रभु की भक्त वत्सलता है
प्रेम में हारना ही प्रभु को आता  है
पर भक्त का मान रखना ही प्रभु को भाता है 
भक्त के प्रेम पाश में बंधे दौड़ लिए हैं

मैया से बोल उठे हैं
मैया मैं तो फल लूँगा
पर मैया बहला- फुसला रही है
इतने घर में फल पड़े हैं
वो खा लो लाला
पर कान्हा ने आज बाल हठ पकड़ा है 
मैं तो उसी के फल खाऊंगा
लाला पैसे नहीं है कह मैया ने समझाना चाहा
पर कान्हा ने ना एक सुनी
किसी तरह ना मानेंगे जब मैया ने जाना
तब बोली मैया, पूछो उससे 
क्या अनाज के बदले फल देगी
इतना सुन कान्हा किलक गए हैं
अंजुलियों  में अनाज भर लिया है 
ठुमक - ठुमक कर दौड़े जाते हैं
अनाज भी हथेलियों से गिरता जाता है
मगर कान्हा दौड़ लगाते आवाज़ लगाते हैं 
रुकना फलवाली मैं आता हूँ 

बाहर जाकर फलवाली से कहते हैं
मैया फल दे दो 
तोतली वाणी सुन 
मालिन  भाव विह्वल हुई जाती है
और कहती है
लाला एक बार फिर मैया कहना
और कान्हा फिर पुकारने लगते हैं
मैया फल दे दो ना
बार - बार यही क्रम दोहराती है
प्रभु की रसमयी वाणी सुन 
जीवन सफल बनाती है
आज जन्मों की साध पूरी हुई है
नेत्रों की प्यास तृप्त हुई है
अश्रु धारा बह रही है
प्रभु का दीदार कर नेत्र रस पी रही है 
अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है
कान्हा के हाथों पर फल रख देती है

ना जाने उन छोटे- छोटे हाथों में
कौनसा करिश्मा समाया था
सुखिया मालन के सभी फलों ने
आज कान्हा के हाथों में स्थान पाया था
पर कान्हा उससे पहले जो 
अनाज लेकर आये थे
वो छोटी- छोटी अंजुरियों में 
समा ना पाया था 
रास्ते भर बिखरता आया था
सिर्फ दो चार दाने ही बचे थे
उन्हें ही टोकरी में रख देते हैं
और उसके फल लेकर
पुलक- पुलक कर 
आनंदित हो अन्दर चल देते  हैं

मगर आज उस मालिन का 
भाग्योदय हो गया था
वो तो आल्हादित हो रही थी
प्रभु प्रेम में मगन हो रही थी
अब ना कोई साध बची थी
नाचती- गाती घर को गयी थी 
मगर जो टोकरी फलों की रोज उठाती थी
वो ना आज उससे चल रही थी
जैसे - तैसे घर को पहुंची थी
और जैसे ही टोकरी उतारी थी
वो तो मणि- माणिकों से भरी पड़ी थी 

ये देख वो रोने लगी 
अरे लाला मैंने तुझसे ये कब माँगा था
बस तेरे दीदार की लालसा बांधी थी
हर आस तो पूरी  हो गयी थी
पर तू कितना दयालू है
ये आज तूने बतला दिया
और मुझे अपना ऋणी बना लिया 
ये प्रभु की भक्त वत्सलता है
कितना वो भी प्यार पाने को तरसता है
इस प्रसंग से ये ही दर्शाया है
जिसमे ना लेश मात्र स्वार्थ ने स्थान पाया है
सिर्फ प्रेम ही प्रेम समाया है 
बस निस्वार्थ प्रेम ही तो प्रभु के मन को भाया है 

जो एक बार उनका बन जाता है
फिर न दरिद्र रह पाता है 
उसका तो भाग्योदय हो जाता है
जिसने नामधन पा लिया
कहो तो उससे बढ़कर 
कौन धनवान हुआ 
बस यही तो दर्शाना था
सभी को तो प्रभु ने 
संतुष्ट करके जाना था
हर मन की साध को 
पूर्णता प्रदान करना 
प्रभु की भक्तवत्सलता दर्शाता है 
फिर ओ रे मन तू 
उस प्रभु से क्यों न प्रेम बढाता है 

क्रमशः ..................