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शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

इसे प्रश्नोत्तरी कहो या वार्तालाप या आरोप प्रत्यारोप…3

प्रभु और भक्त की नोंक झोंक अब अगले मुकाम पर आ पहुँची ………


अगला प्रश्न भक्त ये करता है
प्रभु एक तरफ तुम ये कहते हो
तेरा योगक्षेम मैं वहन करूंगा
तू बस मेरा चिंतन कर
और जब भक्त ऐसा करता है
फिर भी तुम अपनी कलाबाजियों से 
बाज नहीं आते हो
और बीच बीच में उसे 
किसी ना किसी तरह सताते हो
बताओ भक्त कैसे निश्चिन्त हो
जब तुम ही उसे धोखा देते हो
और कठिन परीक्षा की आग में झोंक देते हो
बेचारा भक्त तो निश्चिन्त हो जाता है
अपना हर कर्म , हर सोच , हर विचार 
सब तुम्हें ही अर्पण कर देता है
जहाँ वो अपना कुछ नहीं मानता है
फिर बताओ तो जरा 
तुम कैसे ऐसे भक्त को
परीक्षा की उलझन में डाल देते हो
क्या तुम्हारा दिल नहीं पिघलता है
माना सुना है कि आँच की कसौटी पर
ही सोना कुंदन बनता है 
मगर जिसे तुमने छू लिया हो
जो पारसमणि बन गया हो
उसे अब और क्या प्रमाणित करने को रहा
कहीं ऐसा तो नहीं
तुम्हें इस खेल में ज्यादा मज़ा आता है
और अपनी सत्ता का अहसास कराकर 
तुम आनंदित होते हो
हाय रे मेरे प्यारे ! तू भी आज मुझे
अजब भक्त मिला है
जिसने मेरे सारे खेलों को खोला है
मैं यूँ ही नहीं ऐसे खेल रचता हूँ
पात्र देखकर ही उसमे जल भरता हूँ
ये सब अपने लिए नहीं करता हूँ
जब देखता हूँ मटका पक चुका है
तभी उसे जल में प्रवाहित करता हूँ
ताकि बाकी सब भी उसका अनुसरण करें
और जल्द से जल्द मुझसे आ मिलें
क्योंकि भक्त और मुझमे जब 
कोई भेद नहीं रहता है
तो भक्त पीड़ा भी वहन नहीं करता है
वो सुख दुःख से परे हो जाता है
हर कृत्य में उसे मेरा खेल ही नज़र आता है
और वो भक्ति भाव से 
उसकी पूर्णता में अपनी 
भागीदारी निभाता है
मगर दोष ना कोई मढ़ता है
क्योंकि दो हों तो दोष मढे
खुद को कैसे कोई खुद ही आरोपित करे
जब भक्त ये जान लेता है
तभी तो परीक्षा पर खरा उतरता है
अब तुम्हारी बात ही मैं कहता हूँ
जब तुम ये कहते हो 
मुझमे और जीव में कोई भेद नहीं
मैं ही हर रूप में समाया हूँ
सब मेरा ही लीला विलास है
ना कोई जीव है ना ब्रह्म 
सब मेरा ही रूप मुझमे व्याप्त है
तो फिर प्रश्न कैसा और किससे?
बोलो प्यारे भोले भक्त 
जब सब मैं हूँ 
अपनी परछाईं से खेलता हूँ
तो कहो तो जरा 
सुख में भी मेरा रूप समाया है
और दुःख में भी तो मेरा ही अंतस अकुलाया है
मैं ही मैं चारों तरफ छाया है
फिर तुम पर क्यूँ पड़ी
इन प्रश्नों की छाया है
तुम चाहे दो मानो चाहे एकोअहम 
मगर भेद नहीं कर सकते हो
सुनकर भक्त का माथा झुक गया
वो प्रभु के चरणों में नतमस्तक हुआ
उसे समझ सब आ गया
इसे  प्रश्नोत्तरी कहो या वार्तालाप या आरोप प्रत्यारोप 
इसका भेद भी पा गया
ये पूछने वाला भी एक ब्रह्म है
और जवाब देने वाला भी 
वो ही सर्वस्व  है
बस अपने किस रूप को कैसे प्रस्तुत करना है
किस रूप से क्या काम लेना है
किसे कैसे खुद से मिलाना है
कैसे खुद में समाना है
ये सब प्रभु का ही आनंद विलास  है 
जहाँ कोई ना दूजा अस्तित्व प्रगट होता है
ये तो प्रभु की लीला का मात्र एक अंश होता है
खुद से खुद की प्रश्नोत्तरी 
खुद से खुद के जवाब
खुद से खुद की पहचान
सब उनका है दृष्टि विलास
वास्तव में तो प्रभु ने अपनी सत्ता दर्शायी है
और अपने खेल में अपनी भागीदारी ही निभाई है
फिर कहाँ और कौन भक्त
कैसा समर्पण कैसा बँधन
सब उसी का उसी में आनंद समाया है 
बस दृष्टि भेद से फर्क समझ नहीं आया है
अब भक्त की जय कहो या भगवान की 
इसका प्रश्नकर्ता हो या उत्तरदाता 
सब मे वो ही था समाया 
बस माध्यम मुझे था बनाया 
या कहो वो खुद ही इस रूप मे उतर आया
और एक नया पन्ना इस तरह लिखवाया 
जिसे भिन्न रुपों मे वो गा चुका है
पर एक बार फिर से दोहराया 
भूला बिसरा पाठ फिर से याद करवाया 
प्रभु हैं अजब अजब है उनकी माया 
जिसमे "मै" का ना कोई वजूद कहीं पाया


क्रमश:……………

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

इसे प्रश्नोत्तरी कहो या वार्तालाप या आरोप प्रत्यारोप............2




मगर ये वार्तालाप 
यहीं ना बंद हुआ 
भक्त ने झट दूसरा प्रश्न दाग दिया
प्रभु जब तुमने मान लिया
तुम ही सब कुछ करते हो
तो बताओ तो जरा
फिर भक्त की परीक्षा क्यूँ लेते हो
क्यों उसे दो के भ्रम में उलझाते हो
क्यूँ तुम में और उसमे कोई भेद है
ये बतलाते हो
सुन प्रभु ने जवाब दिया
जब भक्त मेरे हैं
मैं उनका हूँ
तो उनके प्रेम का परिक्षण करता हूँ
क्या ये भी मुझे उतना ही चाहता है
जितना मैंने इसे चाहा है
या ये अपनी किसी गरज से
मुझसे मिलने आया है
जब खोटा है या खरा 
ये परख लेता हूँ
तब उस पर अपना 
सर्वस्व  न्योछावर करता हूँ
और भक्त के हाथों बिक लेता हूँ
अब वो जैसा चाहे मुझे नचाता है
चाहे तो भूखा रखे
चाहे तो काम करवाए
चाहे तो बर्तन मंजवाए
चाहे तो झाडू लगवाए
मैं उसके प्रेम पर रीझ जाता हूँ
और उसकी ख़ुशी में ही
अपनी ख़ुशी समझता हूँ
जैसे भक्त मेरी ख़ुशी में
अपनी ख़ुशी समझता है
वैसे ही मैं भी उसके साथ करता हूँ
यहाँ दोनों के भाव 
एकाकार हो जाते हैं
दोनों ही अपना स्व भूल जाते हैं
और एक रूप हो जाते हैं
यही तो वो भाव होता है
जिसके लिए मैं ये 
सारी लीला रचता हूँ
और तुम मुझ पर दोषारोपण करते हो
बताओ तो जरा कहाँ फिर
दोनों में कोई भेद रहा
और कब मैंने दो का भेद कहा
यही तो मैं समझाना चाहता हूँ
तू मेरी किरण है जो मुझसे बिछड़ी है
बस एक बार मुझे आवाज़ दे
मैं सौ कदम आगे आ जाता हूँ
और उसे अपने में मिला लेता हूँ
फिर कहाँ दोनों में भेद रहा
ये भेद मैंने नहीं डाला है
बस दृष्टि के बदलने से ही
सृष्टि बदली नज़र आती है
वरना तो तुझमे मुझमे कोई भेद नहीं
यही समझाना चाहता हूँ
पर जीव भूला भूला फिरता है
और आवागमन में फंसता है
अरे अरे फिर तुम उसी बात पर आते हो
प्रभु मुझे फिर घुमाते हो
अभी तो तुमने माना है
सब तुम ही करते हो
तो इस रूप में भी तो 
तुम्हारा ही सारा खेल होता है
भेद विभेद सब दृष्टि भ्रम होता है
जबकि कर्ता कर्म और फल 
सब तुम्हारा ही रूप होता है
देखो ये शब्दों की उलझन में ना उलझाओ
मुझे अपने शब्द जाल में ना फंसाओ
और जब तुम कहते हो
तुझमे मुझमे कोई भेद नहीं
फिर क्यों कठिन परीक्षा लेते हो
क्यों जीव को इतना भटकाते हो
जो जान पर बन आती है
तब जाकर तुम मिलने आते हो
और दूसरी तरफ कहते हो
बस मेरा सुमिरन किया कर
और कर्म सारे मेरे अर्पण किया कर
बताओ तो जरा 
जीव क्या करे और क्या ना करे
कैसे खुद को अपने कर्तव्यों से विमुख करे
जब तुम ही उसे फंसाते हो
कर्त्तव्य निभाने का उपदेश देते हो
कर्म की शिक्षा देते हो
और जब वो कर्म में संलग्न होता है
तब उसे भोगों में लिप्त होने का दंड देते हो
ये कैसा तुम्हारा विधान है
जो जीव की समझ से पार है
अरे भोले भक्त मेरे 
मैंने ना कोई दंड विधान रखा
सिर्फ इतना ही तो है कहा
कर्म करे जा फल की इच्छा मत रख
अर्थात निर्लिप्त भाव से कर्म कर
और अपने सारे कर्म मुझे अर्पण कर
मुझे अर्पण करने से वो ही कर्म तेरा
मेरी  पूजा बन जायेगा
और फिर मुझसे मिलने में
ना कोई बाधा तू पायेगा 
कर्म करते भी मुझसे मिला जा सकता है
जरूरी नहीं तू राम नाम की माला ही जपा करे
ये कर्म भूमि मैंने ही बनाई है
बस इतनी ही तो बात कहलाई है
यहाँ कर्म किये बिना ना
कोई एक क्षण रह सकता है
बस तू खुद को कर्म का कर्ता मत मान
और कर्म अपना मेरे अर्पण कर
फिर देख मुझसे मिलना सुगम हो जायेगा
तेरे पथ पर तू बिना पुकारे भी
मुझे खड़ा पायेगा 
अरे वाह प्रभु .....क्या बात तुम कहते हो
जब जीव कर्म करेगा तो बताओ तो जरा
कैसे कर्म बँधन से खुद को मुक्त करेगा
क्या कर्म बिना किसी आशा के किया जा सकता है
क्या कर्म से बिना सम्बन्ध जोड़े कोई कर्म किया जा सकता है
जब कर्म से कोई नाता होगा 
तभी तो कर्म सही ढंग से होगा
और उसे पूरा करने की जब इच्छा होगी
तभी तो कर्म में उसकी रति होगी 
बताओ फिर कैसे कर्मफल से जीव
खुद को विमुख कर सकता है
बिना चाहत के कोई कैसे
कर्म कर सकता है
कहीं ना कहीं किसी ना किसी अंश में
कोई तो चाहत छुपी होगी
अच्छा बताओ जरा
अगर कोई तुम्हें चाहे
तो क्या तुम्हें पाने की चाहत नहीं रखेगा
और तुम्हें पाने के लिए 
वो तुम्हारा सुमिरन भजन मनन नहीं करेगा
अब सारे कर्म वो कर रहा है
मगर बिना चाहत के तो
तुम्हें पाने का कर्म भी नहीं कर रहा है
फिर भला कैसे जीव
चाहत मुक्त हो सकता है
कैसे खुद को पूर्ण विमुख कर सकता है
जब तक किसी कार्य को करने का कारण नहीं होगा
कार्य कहो तो कैसे संपन्न होगा 
प्रभु तुम्हारी बातें बहुत भरम फैलाती हैं
जो जीव के समझ नहीं आती हैं
देखो तुम्हें अपनी कार्यप्रणाली बदलनी होगी
थोड़ी जीव की भी सुननी पड़ेगी
ये नहीं सारा दोष जीव के सिर मढ़ दो
और खुद को पाक साफ़ दिखा दो
तुम भी दोषमुक्त नहीं हो सकते हो
जब तक जीव पर आरोप रखते हो
प्रभु प्यारे भक्त की बातों में 
रस लेते हैं
और मधुर मधुर मुस्कान से 
दृष्टिपात करते हैं
भक्त और भगवान की महिमा
अजब न्यारी है
जहाँ भक्त ने ही वकील और जज की कुर्सी संभाली है
और प्रभु कटघरे में खड़े
मधुर मधुर मुस्काते हैं
और अपने प्यारे भक्त की मीठी बातों पर
रीझे जाते हैं

क्रमश :………

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

इसे प्रश्नोत्तरी कहो या वार्तालाप या आरोप प्रत्यारोप --1

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
श्री गणेशाय नमः
श्री सरस्वत्यै नमः
श्री सद्गुरुभ्यो नमः 

अब इसे क्या कहूं वार्तालाप या प्रश्नोत्तरी या भक्त और भगवान की खट्टी मीठी नोंक झोंक .........मगर ये भाव उठते जरूर हैं हर किसी के मन में तो आज उन्हें ही कहने का प्रयत्न किया है और पता नहीं सबके मन मे उठते भी हैं या नहीं मगर मेरे मन मे उठे और मैनें उनसे प्रश्न किये तो उन्होने अन्दर से यही उत्तर दिये जो आज आप सबके सम्मुख हैं…………



जीवन मृत्यु बने दो द्वार
आवागमन से ना पाया पार
इधर जीव घबराया 
उधर ईश्वर भी अकुलाया
जब विकल हुई दोनों की धार
मिलन का बन गया आधार
सम्मुख प्रभु को पाया जब उसने
जिह्वा  तब लगी रुकने
अनुपम सौंदर्य में खो गया
अपना सर्वस्व भी भूल गया
तब प्रभु ने चेतना का किया संचार
क्यूँ घबराया था यूँ अकुलाया था
किया प्रश्न ये बारम्बार
जब चेतना जागृत हुई
खुद की जब स्मृति हुई
जीव ने प्रश्न किया इस बार
प्रभो ! क्यों जन्म मृत्यु का रचा संसार
जिसमे बांधा कर्म का तार ?
मधुर मुस्कान धर प्रभु ने
सुधामय वाणी से दिया जवाब
ये मेरा है लीला विलास
नित्य खेल मैं रचता हूँ
बस तुझमे विलक्षण बुद्धि धरता हूँ
मगर तू उससे ऐसे लिपटता है
स्व स्वरुप भी भूलता है
ना तेरे आना हाथ में 
ना तेरे जाना हाथ में
फिर क्यूँ मैं -मैं का नारा रटता है
जबकि तू कुछ नहीं है
मात्र हाथों की कठपुतली है
बस यही भूल तू करता है
और आवागमन में फंसता है
सुन जीव मुस्कुराया 
प्रभु की चाल समझ प्रश्न किया
जब तुम्हारा खेल है
तुम उसके नियंता हो 
तुम ही सारा कर्ता- धरता हो
फिर क्यूँ बुद्धि की आड़ लेते हो
क्यूँ जीव को भरम ये देते हो
जब तुम खुद ही सब कुछ करते हो
फिर क्यूँ खुद को कर्तुम अकर्तुम 
अन्यथा कर्तुम कहते हो
जब नाटक तुमने लिखा
उसके सब पात्र तुमने रचे
सब पात्रों को संवाद तुमने दिया
अभिनय को मंच दिया 
फिर भला बताओ तो ज़रा 
कैसे जीव की बुद्धि का यहाँ 
प्रवेश हुआ
सारी रचना के रचयिता तुम हो
तो कैसे तुमसे पात्र उन्मुख हो सकता है
वो तो तुम्हारे इशारे पर ही चलता है
फिर भी अभिनय मंच पर 
दृश्य चाहे बदलता है 
समय भी नए रूप धरता है
मगर नाटक वो ही चलता है
वो उससे बाहर ना निकलता है
तुमने उसे ऐसे घेरा है
चाहकर भी ना निकल सकता है
फिर कहो तो जीव ने कब 
स्वयं को तुमसे ऊपर माना
वो तो तुम्हारी ऊंगली के इशारे पर
अभिनय करता है 
जब पात्र का हर संवाद तुम्हारा है
उसकी हर गतिविधि पर लगा
पहरा तुम्हारा है 
फिर कैसे कहते हो 
ये अपने मन की करता है 
सुन प्रभु  मुस्काए
और जीव के सारे भेद सुलझाये
हाँ ....मैं ही ये खेल रचता हूँ
मैं ही पात्रों को संवाद देता हूँ
अभिनय की तालीम देता हूँ
और रंगमंच पर छोड़ देता हूँ
मगर वो अभिनय की बारीकियां भुला देता है
खुद को खुदा मन बैठता है
जो मैंने संवाद दिए 
जैसा अभिनय को कहा
ठीक उससे उलट जब करता है
तभी उसके भाग्य का पांसा पलटता है
और वो आवागमन में फंसता है
अरे वाह प्रभु .........ये कैसे कह सकते हो
तुमने शिशु रूप में जन्म दिया
अब बताओ तो जरा 
उस जरा से शिशु ने ऐसा कौन सा कर्म किया
जो वो अपने मन की कर सके
अभी तो वो बोलना भी नहीं जानता है
ना खुद अपने नित्यकर्म कर सकता है
फिर बुद्धि के प्रयोग की तो बात ही दूसरी हो जाती है
अब उसे जैसे सांचे में 
ढालना होता है
तुम उसमे वैसा ही रंग भर देते हो
और अपने मन का आकार देते हो
और दोष जीव के मत्थे मढ़ देते हो 
बताओ ये कौन सा खेल हुआ
जिसमे सिर्फ परवशता होती है 
बिन सहारे के तो लकड़ी भी नहीं खडी होती है
उसके मुँह में जुबान भी तुम ही देते हो
बुद्धि रूप में भी तुम ही प्रवेश लेते हो
अब कैसे जीव का कोई कर्म 
अकर्म हो सकता है 
जब हर रूप में तुमने ही आकार लिया होता है
अरे मेरे भोले भक्त
तूने सिर्फ जो सुना देखा जाना 
वो तो सिर्फ एक पक्ष होता है
हर तस्वीर का एक 
दूसरा पक्ष भी होता है
बेशक मैं ही सबमे व्याप्ता हूँ
और मैं ही हर सांचे को आकार देता हूँ
मगर साथ में उसमे 
एक गुण भी भर देता हूँ
उसकी बुद्धि में एक बात धर देता हूँ
देख रंगमंच पर जाकर 
तू मुझे ना भूल जाना
मैं तेरा जनक हूँ
गोड फादर हूँ
तू मुझे ना भुलाना
अभिनय करते करते कहीं
उसी में ना रच बस जाना
और जीव मुझसे वादा करता है
और जब रंगमंच पर उतरता है
तो पात्र में ऐसे डूब जाता है
वो अपने घर का पता भी भूल जाता है
और फिर अपनी बुद्धि
दूसरे गोरख धंधों में लगाता है
मगर जिसने भेजा उसे याद नहीं करता है
और मैं इस खेल का रचयिता 
ये देख देख कर दुखी होता हूँ
ये मेरे पात्र को क्या हुआ
कैसे इसने नया रंग लिया
मेरा तो सारा खेल ही
इसने बिगाड़ दिया
अब इसे याद दिलाने को
अपनी पहचान कराने को
मैं दूसरे पात्र या घटनाएं 
उसके जीवन में अवतरित करता हूँ
मगर ये अपने अहम् के वशीभूत हो
सबको दरकिनार करता है
और खुद को ही दुनिया का
भगवान समझता है
जब मैं समझा समझा कर 
हार जाता हूँ
तब उसे अपने पास बुलाता हूँ
और अपनी पहचान करवाता हूँ
जब उसे समझ आ जाता है
और जब वो एक मौका
और चाहता है
उसे फिर से दुनिया में भेज देता हूँ
ये सोच इस बार ये जरूर बदलेगा
मगर वो फिर भी नहीं सुधरता है
और बार बार खुद ही आवागमन में फंसता है
सुन भक्त खिलखिलाकर हँस पड़ा
और प्रभु से प्रश्न किया 
अरे प्रभु ......एक तरफ तुम
गीता में उपदेश ये देते हो
मैं ही सबका कर्ता- धरता हूँ
मेरी इच्छा के बिना तो 
पत्ता भी नहीं हिल सकता है
फिर कहो तो कैसे कोई जीव
अपने मन की कर सकता है
जब तुम ही हर रूप में समाये हो
जब तुम्हारा ही ये संसार रचाया है
और इसके कण - कण में तुम ही समाये हो
फिर कहो कैसे जीव और ब्रह्म का भरम  फैलाये हो 
जब मुझमे भी तुम हो
और तुम में मैं
हर कण कण में सृष्टि के
तुम्हारा ही दर्शन होता है
फिर भला वहाँ कैसे 
किसी की बुद्धि का प्रवेश हो सकता है
कहीं कहते हो 
मैं कुछ नहीं करता हूँ
मैं निर्लेप रहता हूँ
और कहीं कहते हो
सब मेरी दृष्टि का विलास है
सबमे मेरी माया समायी है
मैं ही जर्रे जर्रे में समाया हूँ
मुझसे ही ये सृष्टि जगमगाई है
अब तुम खुद ही दोगली बात करते हो
और जीव को दुधारी तलवार पर चलाते हो
और दूर खड़े तुम मुस्काते हो
ये तो ना न्याय हुआ
ये तो सब तुम्हारा ही किया धरा हुआ
तुम बस यूँ ही जीव को फंसाते हो
और उसकी दुर्दशा देख मुस्काते हो
क्यूँकि खुद ही रचयिता होते हो
खुद ही पात्र भी बनते हो
और खुद ही तुम दिल्लगी करते हो
और दोष जीव पर मढ़ते हो
प्रभु ये ना सही खेल हुआ
इसमें तुम्हारा पांसा तुम ही पर
उल्टा पड़ गया 
भक्त की मीठी बातें सुन
प्रभु खिलखिला उठे
और भक्त की बात को ही 
ऊंचा बना दिया
हाँ मैं ही सब कर्ता नियंता हूँ 
मान लिया और 
भक्त का मान रख लिया 

क्रमश: ……………

बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया



शब्दहीन, भावहीन ,स्पंदनहीन ह्रदय को
और दिमाग को कुंद औ मूढ बना दिया
सांवरे तूने ये क्या किया , ये क्या किया

ना रसधारा बहती है

ना नामोच्चार होता है
बस ये विग्रह निर्लेप सा रहता है
अब कौन दिशा है जाना
सबको भ्रमित बना दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

ना ह्रदय द्रवित होता है

ना अश्रु  नैनो से ढलते हैं
बस निर्विकारता छा जाती है
निर्जीव इस विग्रह पर
ये कैसा कुहासा छा दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

ना मै अब मै रही

ना तू ही मुझे मिला
एक तत्व भी अज्ञात रहा
ये कैसा द्वंद समा गया
जो मुझे प्रश्नसूचक बना दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

ना प्रेम का छोर मिला

ना कोई उस ओर मिला
बस प्रेमाभक्ति का ह्रास रहा
ये कैसा रोग लगा दिया
भरा, पूजा का थाल लौटा दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

अब ना दिशा का बोध रहा

ना अपना ही होश रहा
जब से तुझमे खुद को मिला दिया
तेरी चाह को परवान चढा दिया
और खुद को भी मिटा दिया
फिर भी ना तेरा दरस हुआ
और चौखट से जो अपनी
तूने खाली हाथ लौटा दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया


तेरे हाथ बिके बेमोल

अब किधर जायेंगे
जो तूने हमे रुसवा किया
तेरे कूचे मे ही ना मर जायेंगे
मगर  ना कहीं कोई ठौर पायेंगे
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

पूर्णाहूति …तुभ्यम समर्पितं गोविन्दं…कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी ……भाग 71


प्राकृत देह का निर्माण
स्थूल , सूक्ष्म और कारण शरीरों से हुआ
जिनके कारण ही जीव
जन्म मृत्य के चक्कर में पड़ा
ये प्राकृत शरीर
चाहे मैथुन से , चाहे संकल्प से
चाहे ह्रदय , नाभि, कंठ, नेत्र ,
या सिर्फ स्पर्श से या चाहे
दृष्टि से मिलते हैं
मगर कर्म बँधन से मुक्त ना होते हैं
मगर अप्राकृत शरीर
विलक्षण होते हैं
जो महाप्रलय में भी
ना नष्ट होते हैं
फिर भगवद देह तो
साक्षात् भगवद्स्वरूप है
रक्त मांस , मेद, अस्थि से ना निर्मित है
फिर प्रभु का स्वरुप
कैसे रक्त मांस अस्थि मय होता
उनमे देह देही , गुण गुणी
रूप रुपी , नाम नामी
लीला लीलापुरुषोत्तम का
कोई भेद नहीं
प्रभु का अंग अंग पूर्ण कृष्ण है
प्रभु की प्रत्येक इन्द्री से
सभी कार्य हो सकते हैं
जैसे उनके कान देख सकते हैं
आँखें सुन सकती हैं
त्वचा स्वाद ले सकती है
रसना सूंघ सकती है
नाक स्पर्श कर सकती है
वे हाथों से देख सकते हैं
आँखें सुन सकती हैं
कृष्ण का सब कृष्ण रूप होने से पूर्ण है
इसी कारण उनकी नित्य माधुरी
नित्य नवीन सौन्दर्यमयी है
प्रभु का शरीर ना कर्म जन्य है
ना मैथुनी ना दैवी
वो तो सर्वथा विशुद्ध भगवत स्वरुप हैं
तभी अखंड ब्रह्मचारी कहलाते हैं


प्रभु की ये लीला  पूर्ण दिव्य थी
तभी योगमाया को कह
अपना मन बनवाया
क्योंकि प्रभु के पास स्वयं का
ना कोई मन होता है
और गोपियों ने तो
अपना मन प्रभु में मिला दिया था
तब प्रभु ने विहार के लिए
नवीन मन की
दिव्य मन की सृष्टि की
यही योगमाया प्रभु के लिए
दिव्य स्थल , दिव्य सामग्री
दिव्य मन का निर्माण करती है
तभी प्रभु की बांसुरी
जड़ को चेतन , चेतन को जड़
चल को अचल, अचल को चल
विक्षिप्त को समाधिस्थ
और समाधिस्थ को विक्षिप्त बनाती है
तभी गोपियाँ बंसी की धुन सुनते ही
सब कार्य छोड़ प्रभु की ओर
चल पड़ती हैं
उन्हें ना ध्यान कुछ रहता है
कौन सा कम अधूरा हो
या पूरा करके जाएँगी
क्योंकि वो तो नित्य संकल्प हो चुकी थीं
सर्वस्व समर्पण कर चुकी थीं
बेशक शरीर से सारे कार्य करती थीं
मगर वंशी की धुन कानों में पड़ते ही
उनका ध्यान कर्म की पूर्णता पर ना रहता था
जैसे सन्यासी का मन
वैराग्य की प्रबल ज्वाला से परिपूर्ण रहता है
फिर वैराग्य की पूर्णता
और प्रेम की पूर्णता
एक ही तो बात हुई
गोपियाँ ब्रज और प्रभु के बीच
पूर्ण वैराग्य स्वरुप हैं
या मूर्तिमान प्रेम
इस विषय में कौन निर्णय ले सकता है
गोपियों और प्रभु के
अलौकिक रूप को
कैसे जान सकता है
फिर उनकी दिव्य लीला का
कोई कैसे वर्णन कर सकता है


फिर कैसे मैं अज्ञानी वर्णन कर सकती हूँ
बस प्रभु चरणों में ही
सारा लेखन समर्पित करती हूँ
यूँ तो जितना गुणगान करो
थोडा ही रहता है
अभी ना जाने कितने और
दिव्य भाव यहाँ बतलाये हैं
जो मानुष के समझ ना आये हैं
प्रभु प्रेरणा से लिया संकल्प पूर्ण हुआ
ये प्रभु की दिव्य लीलाओं का
प्रभु के लिए गुणगान हुआ
अगली प्रेरणा तक
अब लेखनी को विराम देती हूँ
जब जैसी प्रभु की मर्ज़ी होगी
जब गोपी विरह के भावों का समावेश होगा
तभी उद्धव गोपी संवाद रूप में
नव सृजन होगा
जब प्रभु इस लायक समझेंगे
तब उद्धव गोपी संवाद का आगाज़ करेंगे
तब तक उस पूर्णकाम को
कोटि कोटि नमन करती हूँ
जो मुझे नराधम को अपनी शक्ति से नवाज़ा
और अपनी लीलाओं का गुणगान करने का मौका दिया
कैसे उऋण हो सकती हूँ
प्रभु कृपा की यही तो विलक्षण महिमा है
स्वयं सब कार्य संपन्न करते हैं
और उसका श्रेय भक्तों को दे देते हैं
मैं नतमस्तक हुई जाती हूँ
पर पार ना उनका पाती हूँ
बस उनके दर्शन की अभिलाषी हूँ
प्रेम सुधा की प्यासी हूँ
 
!!!!!!!!अथ श्री कृष्ण कथा !!!!!!

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी ……भाग 70

अब प्रभु ने जितनी गोपियाँ
उतने रूप धरे थे
दो- दो गोपियों के बीच कन्हैया
गलबहियां डाले नाचते थे
कभी एक गोपी के चारों तरफ
कृष्ण नृत्य करते थे
रसमयी दिव्य लीला का
प्रभु ने प्रारंभ किया
सहस्त्रों गोपियाँ सहस्त्रों कृष्ण
चारों तरफ नृत्य करते थे
जिसे देखने देवता भी
पत्नियों सहित
आकाश में उतरे थे
स्वर्ग की दुन्दुभियाँ स्वयं बज उठीं
दिव्य पुष्प वर्षा होने लगी
गन्धर्व गण प्रभु का यश गान करने लगे
गोपियों के कंगन
पैरों की पायल और करधनी के घुँघरू
एक साथ बजने लगे
ताल से ताल मिलाने लगे
सुर लय ताल ना बिगडती थी
गोपियाँ चाहे रूकती थीं
चाहे थकती थीं , चाहे गिरती थीं
पर लय ताल पर ना असर होता था
अजब चमत्कारिक रसमयी
अद्भुत वातावरण बना था
कृष्ण गोपियों  संग कभी
बड़े वेग से घूमते थे
कभी गोपियाँ कलापूर्ण ढंग से मुस्काती थीं
भौहें मटकाती थीं
नाचते- नाचते पतली कमर
ऐसे लचक -लचक जाती थी
मानो टूट गयी हो
नाचते -नाचते पसीने की बूँदें
चेहरे पर छलछला रही थीं
उन पर काले केश यूँ लगते मानो
काले सर्प ओस की बूँद चाटने आये हों
तन -मन वस्त्रों की सुधि
गोपियाँ भूल गयीं
चोटियाँ ढीली पड़ गयीं
नीवों की गाँठें खुल गयीं
सिर्फ और सिर्फ
आनंद विलास छा गया
कोई गोपी थक जाती तो कृष्ण को पकड़ लेती
तो किसी गोपी का चन्दन
कृष्ण के अंग से लग जाता
और सारा वातावरण महका जाता
कोई गोपी कहती
ज़रा मेरे कलेजे पर
हाथ रख देखो सांवरे
कैसा धड़कता है
आठों पहर तुम इसमें रहते हो
डरती हूँ कहीं
कलेजा धड़कने से तुम्हें दुःख ना पहुंचे
ये उनके प्रेम की पराकाष्ठा थी
बस में होता तो धडकनों को भी रोक देतीं
पर अपने प्रियतम को
ना ज़रा सा भी क्लेश होने देतीं
जब प्रेम की ऐसी उच्चावस्था हो
वहाँ कैसे ना प्रभु की
अनंत कृपा हो
कैसे ना प्रभु उनके वश में हों
यूँ मोहन ने ब्रजबालाओं संग
छह राग और छत्तीस रागनियों संग
रास विलास किया
किसी को ना तन- मन की सुधि रही
नाचते- नाचते गोपियों का आँचल उड़ जाता था
कभी मोहन का मुकुट गिर जाता था
कभी मोतियों  की माला
टूट कर बिखर जाती थी
पर किसी को  किसी की
सुधि कहाँ रह  जाती थी
सब को यूँ लगता
मोहन मेरे साथ ही रास करते हैं
कोई गोपी मोहन के सुर में
ऐसे राग अलापती थी
कि मोहन वंशी बजाना भूल जाते थे
और उसके राग में खो जाते थे
जैसे निर्विकार शिशु दर्पण में
अपनी परछाईं से खेला करता है
वैसे ही राधारमण कभी उन्हें
ह्रदय से लगाते थे
कभी प्रेमभरी चितवन से
घायल करते थे
कभी उन्मुक्त हँसी हँसते थे
कभी अंग स्पर्श करते थे
प्रभु के संस्पर्श से
गोपियाँ प्रेमानंद में भाव विह्वल हुईं
केश खुल गए
हार टूट गए
गहने वस्त्र अस्त व्यस्त हो गए
ये देख देवता भी चकित हो गए
यूँ तो प्रभु आत्माराम हैं
उनमे ना किसी क्रिया का लेशमात्र है
अपने अतिरिक्त किसी और की आवश्यकता नहीं
फिर भी उन्होंने
जितनी गोपियाँ उतने रूप धरे थे
राग रंग के मद में गोपियाँ
गहने और वस्त्र एक दूजे पर
वारना करती हैं
ऐसे अद्भुत दृश्य को देख
यमुना का जल ठहर गया
पशु पक्षी मोहित हो
चित्रलिखे से खड़े रह गए
हवा बहना भूल गयी
जब राधा संग मोहन नृत्य करते हैं
जिसे देख- देख गोपांगनाओं  के ह्रदय
हर्षित होते हैं
तभी एक गोपी नन्द
और एक वृषभानु बनी
और कान्हा का राधा संग
गठजोड़ कर ब्याह करा
समधियों का शिष्टाचार कराया
और राधा के हाथ में
कंगना बांध मोहन से खुलवाती हैं
और जब मोहन खोल ना पाते हैं
तो मीठी ठिठोलियाँ करती हैं
फिर सब गोपियाँ दोनो का पूजन करती हैं
इस दिव्य महारास के दर्शन कर
देवता मोहित होते हैं
और गोपियों की ब्रज रज की
वहाँ के जड़ -चेतन के
भाग्य की सराहना करते हैं
क्यों ना हमें ब्रज में जन्म मिला
ये सोच कर अकुलाते हैं
जब गोपियाँ प्रभु संग विलास कर थक गयीं
तब प्रभु ने यमुना में
गोपियों संग प्रवेश किया
जैसे गजराज हथनियों संग
जल क्रीडा करता है
एक दूजे पर जल की बौछार करते हैं
देवता पुष्प वर्षा करते स्तुति करते  हैं
अद्भुत दृश्य को निहारा करते हैं
जब सबके अन्तस्थ शीतल हुए
तब प्रभु जल से बाहर निकले
और यमुना तट पर आये
योगमाया ने सबको वस्त्र
आभूषण इत्र गजरे दिए
सबने पुराने वस्त्र वहीँ छोड़ दिए
जिन्हें देवताओं ने प्रसाद रूप
टुकड़े कर आपस में बाँट लिया
वास्तव में ये तो प्रभु के
चिन्मय स्वरुप की चिन्मयी लीला थी
कामभावना हो या क्रिया या चेष्टा
सब उनके ही आधीन थी
जिसमे कोई दूसरा स्वरुप ना था
सिर्फ स्वरुप ही निज स्वरुप में अवस्थित था
मगर परीक्षित के मन में प्रश्न उठा
जब प्रभु ने धर्म की रक्षा को अवतार लिया
तो क्यों परस्त्रियों का स्पर्श किया
जब प्रभु पूर्णकाम थे
तो किस अभिप्राय से ऐसा कर्म किया
शुकदेव ने जिसका इस प्रकार उत्तर दिया
समरथ को नहीं दोष गोसाईं
ज्यों पावक चाहे अच्छा हो या बुरा
सब ग्रहण कर लेती है
पर उस पर ना दोष लगता है
जैसे भोलेनाथ  ने
हलाहल का पान किया
मगर उनका उससे कुछ ना बिगड़ा क्योंकि
सामर्थ्यवान का कर्म
निज उद्देश्य से नहीं होता
जगत के कल्याण के लिए
उनका सब कर्म है होता
अहंकार रहित ऐसे पुरुष
ना किसी कर्म बँधन में फंसते हैं
उनके तो हर कर्म जगत हित में होते हैं
फिर चाहे कर्म शुद्ध हों या अशुद्ध
मगर ऐसा ही कर्म यदि
असामर्थ्य विहीन करे
तो अपनी दुर्दशा को स्वयं पहुंचे
जो आचरण अनुकरणीय हो
वो ही जीवन में उतारा जाता है
मगर अन्य मनुष्यों द्वारा
हर कार्य किसी ना किसी
उद्देश्य के निहित किया जाता है
जो स्वार्थ और अनर्थ से जुड़ा होता है
मगर देवता आदि इनसे
ऊपर उठ जाते हैं
तभी ऐसे कर्म कर पाते हैं
तो सोचो जब ये ऐसा कर पाते हैं
तो इनको बनाने वाला
वो जग नियंता
कैसे उसे मानवीय गुणों
शुभ अशुभ
से जोड़ा जा सकता है
कैसे उनमे कर्म बँधन की
कल्पना की जा सकती है
जिनकी चरण रज का
भक्त सेवन करते हैं
जिनके प्रभाव से योगीजन
कर्म बंधन काट डालते हैं
वे प्रभु भक्तों की इच्छा पर ही
अपना चिन्मय स्वरुप प्रकट करते हैं
जब वो ही प्रभु
आत्मरूप से
चर -अचर समस्त विश्व में व्याप्त हैं
फिर वो गोपियों , उनके पतियों
गाय, बछड़ों , बच्चों से
कहो कैसे जुदा हैं
ये तो जीवों पर परम कृपा
बरसाने को प्रभु
ऐसी लीला करते हैं
जिन्हें सुन जीव भगवद परायण हो जायें
उसका चित प्रभु में ही विलय हो जाये
इसलिए प्रभु की इस लीला को
ना दोष दृष्टि से देखो
ये तो जीव और ब्रह्म का
आत्मसाक्षात्कार है
जो जन्म जन्मान्तरों से बिछड़ा है
और महारास में जाकर
अपनी ज्योति में जा मिला है
यही तो जीवन और जीव की परमगति है '
जिसे पाने को जीव
लख चौरासी में भटकता है
इस प्रकार प्रभु ने महारास का आनंद दे
गोपियों की विदा किया
मगर उनके चित को
अपने श्री चरणों में रख लिया
अब गोपियाँ रहती तो घर में थीं
सारे गृह कार्य भी करती थीं
मगर उनकी दृष्टि
उनका मन
उनकी हर क्रिया
सिर्फ कृष्ण के लिए ही होती थी
सबमे कृष्ण का ही दर्शन करती थीं
भेदबुद्धि मिट चुकी थी
एक पर ही अब टिक चुकी थी
बस यही तो महारास का महाभाव है
जहाँ दो का भाव मिट जाता है
और जीव पूर्णता पा जाता है
परीक्षित ये हाल उनके घर में
किसी ने ना जाना
ये ही तो प्रभु की दिव्य लीला होती है
जो अन्दर ही घटित होती है
बाहर से तो हर क्रिया यथावत होती है
मगर अंतर में सब भेद मिट जाता है
जीव ब्रह्म का मिलन हो
अंतस में महारास हो जाता है
इसे पाने को ही हर जीव भटका करता है
और यही उसके जीवन का
प्रथम और अंतिम लक्ष्य होता है
गोपियाँ कोई देह नहीं
बल्कि एक भाव हैं
जिसमे जीव जब "मैं" को भुला देता है
तभी निज स्वरुप को पा लेता है
यह रास वस्तुतः परम उज्जवल रस का दिव्य प्रकाश है
जिन सुधीजनों में गोपीभाव पुष्ट होता है
उन्हें ही इस दिव्य महारास का अनुभव होता है
आत्मा का आत्म में विलास ही
महारास कहलाता है
जब साधक का ध्यान टिक जाता है
ना केवल जड़ शरीर बल्कि
सूक्ष्म शरीर को प्राप्त होने वाले
स्वर्ग , कैवल्य या मोक्ष का भी त्याग होजाता है
और दृष्टि में केवल
चिदानंद स्वरुप कृष्ण बस जाता है
उनके ह्रदय में ही
कृष्ण को तृप्त करने वाला
प्रेमामृत बरसता है
उनकी इस अलौकिक स्थिति में
स्थूल शरीर और उसकी क्रियाओं का
लेश भी ना बचता  है
ऐसी कल्पना तो देहात्मबुद्धि से
जकड़े जीवों को ही होती है
जिन्होंने गोपियों को जाना
या गोपीभाव  को पहचाना
उन्होंने फिर सिर्फ वैसी ही अभिलाषा की
फिर वो चाहे ब्रह्मा हो या शंकर
उद्धव हो या अर्जुन
सब की रति प्रभु चरणों में हुई

क्रमश:…………..........



गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी………भाग 69


जब विरह की उच्चतम अवस्था हुई
और प्रभु ने देखा
अब ये बस मेरी हुईं
तभी प्रभु ने खुद को प्रकट किया
यहाँ एक कारण नज़र आता है
प्रभु के अंतर्धान होने का
वो बतलाना चाहते हैं
जो गोपियाँ  दिन रात
मेरे नाम की माला जपती थीं
जिनका मेरे सिवा ना दूजा ठिकाना था
उनकी परीक्षा लेने से भी ना चूकता हूँ
जिन्होंने सर्वस्व  समर्पण किया था
उनको भी किसी भी मोड़ पर
परीक्षा में बैठा देता हूँ
तो जीव जो उनकी तरफ आते हैं
और अपने प्रेम का दावा करते हैं
तो उन्हें कैसे छोड़ सकता हूँ
प्रभु देखना चाहते हैं
ये कच्चा है या पक्का
क्या इसका भाव वास्तव में
प्रेम समर्पण का है
या अभी भी दुनियावी
बातों से भरा है
जब प्रभु ठोक बजाकर परख लेते हैं
तब उसे रास में शामिल कर लेते हैं
और उसका योगक्षेम स्वयं वहन कर लेते हैं

जब प्रभु ने जान लिया
अब ये प्राण छोड़ देंगी
पर विरह में ना जीवित रहेंगी
तब प्रभु ने उनकी अलौकिक प्रीति जान
स्वयं को प्रकट किया
खिले कमल सा प्रभु का मुखकमल
वैजयंती माला पहने
मंद मंद मुस्कुराते
मुरली मधुर बजाते
प्रभु का जब दर्शन किया
गोपियों में प्राणों का संचार हुआ
ज्यों रेत पर पड़ी मीन पर
बरखा ने जीवनदान दिया
सब गोपियों के ह्रदय आंगन  खिल उठे
कान्हा को सबने घेर लिया
किसी गोपी ने उनका हाथ पकड़ लिया
किसी ने उनका चरण स्पर्श किया
किसी ने उन्हें नेत्र द्वार से
ह्रदय में बिठा लिया
और नेत्र बंद कर
अन्दर ही अन्दर उनका
आलिंगन कर
प्रेम समाधि में डूब गयी
कोई गोपी अपने कटाक्ष बाणों से
बींधने लगी
कोई गोपी प्रेम गुहार करने लगी
तो कोई गोपी निर्मिमेष नेत्रों से
प्रभु के मुखकमल का
मकरंद रस पान करने लगी
फिर भी ना ह्रदय तृप्त होता है
सभी गोपियों ने प्रभु में ध्यान लगाया है
जिसे देख उनका ह्रदय हर्षाया है
प्रभु विरह की वेदना से
जो दुःख उपजा था
वो अब दूर हुआ था
परम शांति का गोपियों को
अनुभव हुआ था
प्रभु के दर्शन से
गोपियाँ पूर्णकाम हुईं
इतना आनंदोल्लास हुआ
ह्रदय की सारी आधि व्याधि मिट गयी
अब गोपियों ने चन्दन केसर युक्त
अपनी ओढनी बिछा
प्रभु को विराजमान किया
जिन प्रभु को योगसाधन से भी
पवित्र ह्रदय में
ऋषि मुनि ना
ह्रदय सिंहासन पर बैठा पाते हैं
वो कृष्ण आज प्रेम के वशीभूत हो
यमुना की रेती में
गोपियों की ओढनी पर बैठे दिखाई देते हैं
ये ही तो प्रेम की सगाई है
जो सिर्फ गोपियों ने ही निभाई है
प्रभु के संसर्ग का , संस्पर्श का
गोपियाँ आनंद लेती हैं
और कभी कभी कह उठती हैं
कितना सुकुमार है
कितना मधुर है
और मन ही मन
प्रभु के छिपने से नाराज होने का
अभिनय कर उन्हें
दोष स्वीकारने को कहती हैं
गोपियों ने यहाँ प्रभु से प्रश्न किया
हे नटवर ज़रा इतना तो बतलाना
कुछ लोग ऐसे होते हैं
जो प्रेम करने वालों से ही प्रेम करते हैं
और कुछ लोग
प्रेम ना करने वालों से भी प्रेम करते हैं
परन्तु कोई कोई तो
दोनों से ही प्रेम नहीं करते हैं
प्यारे ज़रा बतलाओ
इन तीनों में से तुम्हें
कौन अच्छा लगता है ?
तब प्रभु ने जवाब यूँ दिया
गोपियों जो प्रेम करने पर प्रेम करे
ये तो सिर्फ स्वार्थियों का व्यापार हुआ
इसमें ना कोई सौहार्द हुआ
और ना ही धर्माचरण का पालन हुआ
जो लोग ना करने वालों से भी प्रेम करते हैं
वहाँ ही निश्छल सत्य और पूर्ण धर्म का पालन हुआ
जैसे सज्जन, माता पिता , करुणाशील लोग
बिना कारण दया करते हैं
और सबके परम हितैषी होते हैं
कुछ ऐसे होते हैं
जो प्रेम करने वालों से भी
प्रेम नहीं करते
और प्रेम ना करने वालों का तो वहाँ
प्रश्न ही नहीं उठता है
ऐसे लोग भी चार प्रकार के होते हैं
एक जो निज स्वरुप में मस्त रहते हैं
जहाँ द्वैत का ना भास होता है
दूसरे वे जिन्हें द्वैत तो भासता है
पर वो कृतकृत्य हो चुके हैं
उनका ना फिर किसी से कोई प्रयोजन रहता है
तीसरे वे हैं जो जानते ही नहीं
हमसे कौन प्रेम करता है
और चौथे वे हैं जो जान बूझकर
अपना हित करने वालों को भी सताना चाहते हैं
उनसे भी द्रोह रखते हैं
गोपियों मैं तो प्रेम करने वालों से भी
प्रेम का वैसा व्यवहार ना कर पाता हूँ
जैसे करना चाहिए
और ऐसा मैं इसलिए करता हूँ
ताकि उनकी चितवृत्ति मुझमे लगी रहे
निरंतर मेरा ही ध्यान उन्हें बना रहे
इसलिए ही उन्हें
मिल मिल कर छुप  जाता हूँ
और इस तरह
उनका प्रेम बढाता हूँ
निस्संदेह तुम लोगों ने
लोग मर्यादा वेदमार्ग
सगे सम्बन्धियों को त्यागा है
तभी मुझे पाया है
अब तुम्हारी मनोवृत्ति
मुझमे लगी रहे
निरंतर मेरा ही चिंतन तुम्हें होता रहे
इसलिए परोक्ष रूप से
तुमसे प्रेम करता हुआ भी
मैं छुप गया था
इसलिए मेरे प्रेम में
तुम ना दोष निकलना
तुम मेरी सर्वथा प्यारी हो
जन्म जन्म के लिए
तुम्हारा ऋणी हुआ  हूँ
क्योंकि तुमने उन बेड़ियों को तोडा है
जिसे बड़े बड़े ऋषि मुनि भी ना तोड़ पाते हैं
यदि मैं अपने अमर शरीर से
अमर जीवन से
अनंत काल तक
तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्याग का
बदला चुकाना चाहूँ
तो भी ना चुका सकता हूँ
और तुम्हारे ऋण से ना कभी
उऋण हो सकता हूँ
प्रभु के मुख से उनकी
सुमधुर वाणी सुन
जो विरह्जन्य ताप शेष था
उससे गोपियाँ मुक्त हुईं
अब प्रभु ने यमुना के पुलिन पर
गोपियों संग रासलीला प्रारंभ की 


क्रमश:…………