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शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

नई सुबह ----------भाग ३

तब हर्षमोहन ने कहा ,"मुझे तुमसे जरूरी बात करनी है इसलिए अभी तुम नहीं जा सकते. बस शाम को आकर तुमसे बात करता हूँ . अभी आज एक जरूरी मीटिंग है वो निपटाकर आ जाऊं ".
माधव के पास रुकने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं था..................

अब आगे -----------

शाम को जब हर्षमोहन आये तो उन्होंने माधव को बुलाया और उससे कहना शुरू किया ,  "देखो माधव तुम जैसा होनहार इन्सान फिर इसी दलदल में जाए तो मुझ  पर धिक्कार है . मैं चाहता हूँ तुम अपना एक अलग आकाश बनाओ . ज़िन्दगी में ऊंचाइयों को छुओ . अपने आप को एक नयी पहचान दो".

ये सुनकर माधव बोला , " सर , मैं एक भिखारी हूँ  और मुझमे ऐसी कोई काबिलियत नहीं जो आप ऐसा कह रहे हैं . हम तो ज़मीन के लोग ज़मीन से ही जुड़े रहते हैं  और एक दिन इसी में मर खप जाते हैं . हमारे पास से तो काबिलियत भी दूर से ही नमस्कार करके निकल जाती है ".


ये सुनकर हर्षमोहन ने कहा , " माधव तुम अपने आप को चाहे जितना छुपा लो मगर मैं तुमको और तुम्हारे अन्दर छुपी काबिलियत को पहचान गया हूँ . मुझे पता चल गया है कि मेरे सामने कोई छोटा मोटा इंसान नहीं बल्कि एक गंभीर शख्सियत का मालिक बैठा है जो ऐसा छुपे रुस्तम है कि हर पल नकाब ओढ़े रहता है . मगर आज वक़्त आ गया है कि तुम ये नकाब उठा दो और दुनिया के आगे खुद को जाहिर कर दो . ना जाने कितने प्रशंसक तुम्हारे दीदार को तरस रहे हैं ".


ये सुनकर तो माधव सकपका गया .उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये इंसान है या जादूगर , जो उसके बारे में सब जान गया . 


खुद को संयत करते हुए हिम्मत जुटाकर माधव बोला ,"सर , मैं एक आम इन्सान हूँ . आपको जरूर कोई गलफहमी हो रही है . मुझमे ऐसी कोई बात नहीं है जिससे आप इतना प्रभावित हो रहे हैं ".


तब हर्षमोहन ने कहा , " माधव अब खुद को भ्रमजाल से बाहर निकालो और सत्य को स्वीकार करो . मुझे अब तुम्हारे बारे में सब पता है कि तुम कौन हो? जब तुम्हारा एक्सिडेंट हुआ था तब तुम्हारे झोले में जो कागज़ थे वो मैंने अब तक संभल कर रखे हुए हैं . उन्ही कागजों से मुझे तुम्हारे बारे में सब पता चल गया .  बाकी मैं खुद ऐसे काम में हूँ कि तुम्हारे बारे में इन सबके बाद सारी जानकारी निकलना कोई मुश्किल काम नहीं , इतना तो तुम समझते ही होंगे.अब खुद को छुपाने से कोई फायदा नहीं इसलिए अब साफ़ -साफ़ बात करो . "


ये सुनकर माधव बोला , " ठीक है सर , जब आपको सब पता चल ही गया है तो फिर अब कहिये , क्या चाहते हैं आप "?


ये सुनकर कुछ देर खामोश हो कर  कुछ सोचते हुए से हर्षमोहन बोले , " माधव , एक बात बताओ तुम इतनी ज़हीन शख्सियत के मालिक हो , फिर क्यूँ तुमने खुद को दुनिया से छुपा रखा है ? क्यूँ दुनिया के सामने नहीं आते ? तुम्हें देखने और तुम्हें जानने के लिए आज तुम्हारे पाठक कितना बेचैन हैं ये तुम सोच भी नहीं सकते . फिर ऐसा कौन सा कारण है जो तुम खुद को सारे ज़माने से छुपा कर रखते हो और एक गुमनामी की ज़िन्दगी जीते हो ?.


इतना कहकर हर्षमोहन खामोश हो गए और माधव की तरफ प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगे . माधव बेचैनी से पहलू बदलने लगा मगर कुछ कह नहीं पा रहा था . उसके चेहरे पर छाई उदासी की महीन सी रेखा उसके दिल में उबलते ख्यालों को छुपा पाने में असमर्थ हो रही थी . ना तो वो कुछ कह पा रहा था और ना ही चुप रहकर हर्षमोहन की बात का मान घटाना  चाहता  था  क्योंकि उसके दिल में अब हर्षमोहन के लिए एक खास स्थान बन चुका था . 
बड़ी मुश्किल से अपने जज्बातों को काबू करके माधव ने बोलना शुरू किया .माधव  ने कहा , " सर आपकी जगह कोई और होता तो शायद मैं इस बात का कभी जवाब ना देता मगर आज आप से कहकर शायद मैं अपने दिल पर बरसों से रखा गम का भार कुछ हल्का कर सकूँ ".


कुछ देर रुककर माधव ने कहना शुरू किया , " सर , मैं पहले ऐसा नहीं था. मेरा भी एक हँसता मुस्कुराता परिवार था . मैं अपने माता पिता की इकलौती संतान था . बेहद लाड- प्यार से पला हुआ . हम अपनी ज़िन्दगी में बेहद खुश थे. जैसे एक मध्यमवर्गीय परिवार की ज़िन्दगी होती है वैसी ही  मेरी भी ज़िन्दगी थी . कोई गम नहीं था ज़िन्दगी में . हमेशा मस्ती करना और हंसमुख मिजाज़ इन्सान था मैं. कॉलेज के दिन याद आते हैं जब मैं उमंगों से भरा कॉलेज जाया करता था , आर्ट्स का स्टुडेंट था  क्योंकि मेरी साहित्य में रूचि थी और हिंदी मेरा प्रिय विषय . इसलिए  पढ़ाई की  कोई टेंशन तो थी नहीं और शुरू- शुरू  में वैसे भी मस्ती ही मस्ती होती है . मैं भी बेफिक्र सा मौज- मस्ती करता कॉलेज जाया करता था . 

मैं अपनी शायरी के लिए सारे कॉलेज में मशहूर था और किसी भी कार्यक्रम में जब तक मेरा नाम ना होता तो वो कार्यक्रम अधूरा ही माना जाता था . एक दिन जब मैं ऐसा ही एक कार्यक्रम पेश करके बाहर निकला तो एक आवाज़ ने मुझे चौंका दिया. शहद सी मीठी , कोयल सी कुहुकती  एक आवाज़ ने जब मेरा नाम लेकर आवाज़ दी तो मैं ठिठक कर रुक गया . पीछे मुड़कर देखा तो एक लड़की मुझे बुला रही है . मैंने सोचा शायद वो भी मेरी कोई फैन  है क्यूँकि कॉलेज की लड़कियों में मैं काफी मशहूर था . उसके पास गया तो पूछा कि क्या बात है तो उसने कहा , " मैं शैफाली हूँ  और इस कॉलेज में नयी -नयी आई हूँ इसलिए ज्यादा तो कुछ नहीं जानती मगर आपसे एक बात कहती हूँ कि आप जो शायरी करते हैं यूँ तो उसमे कोई कमी नहीं है मगर फिर भी इस तरफ कभी गंभीरता से ध्यान देना कि तुम्हारी शायरी सिर्फ रोमांटिक पहलू पर ही केन्द्रित है . अपनी शायरी में यदि तुम विविधता लाओ और साथ ही गहराई भी तो तुम एक उत्कृष्ट शायर बन सकते हो जिसका नाम सारे देश उज्जवल होगा क्योंकि तुम में वो बात तो है जो तुम्हारी शायरी को एक नयी  दिशा दे सकती है . तुम कोशिश करना और कभी सोचना इस तरफ और अगर बुरा लगे तो माफ़ी चाहती हूँ मगर मेरे ख्याल से अब तक तुम्हें सिर्फ तुम्हारे प्रशंसक ही मिले होंगे . कोई मेरे जैसा आलोचक  और सही मार्गदर्शन करने वाला नहीं मिला होगा . तुम अपनी प्रतिभा को सही दिशा दोगे तो मुझे बेहद ख़ुशी होगी  . इतना कहकर शैफाली मुझे स्तब्ध खड़ा छोड़कर चली गयी और मैं काफी देर बुत -सा ठगा खड़ा रहा ................


क्रमशः.................



11 टिप्‍पणियां:

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

कहानी में एक नया मोड आया है....आगे का इंतजार है!....धन्यवाद!

मनोज कुमार ने कहा…

कहानी एक रोचक मोड़ पर पहुंच गई है। अगली कड़ी की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रतीक्षा है।

राजभाषा हिंदी ने कहा…

इतनी प्रभावशाली कहानी लिखने के लिए बड़ी प्रतिभा चाहिए और आप में है ।


हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

स्‍वच्‍छंदतावाद और काव्‍य प्रयोजन , राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

दीपक 'मशाल' ने कहा…

कहानी ने रोचक मोड़ ले लिया है.. आगे-आगे देखते हैं अब होता है क्या... :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अब कहानी का रुख पलटा है ...रोचक बन रही है ...आगे का इंतज़ार है ..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (ਦਰ. ਰੂਪ ਚੰਦ੍ਰ ਸ਼ਾਸਤਰੀ “ਮਯੰਕ”) ने कहा…

अब कथा रोचक हो चली है!
--
आगे का भाग पढ़ने की इच्छा जाग उठी है!

rashmi ravija ने कहा…

अब तो कहानी और भी इंटरेस्टिंग हो गयी है..नया मोड़ जो आ गया है...वो भी ख़ूबसूरत सा...
अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार

Babli ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और रोचक लगा! अब तो अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा!

कविता रावत ने कहा…

कहानी बहुत रोचक ....
आज तो सिर्फ आज की ही पोस्ट पढ़ पाई पिछली पोस्ट जरुर देखूंगी ..आगले कड़ी का इन्तजार रहेगा ...

Kishore Choudhary ने कहा…

शेफाली का आगमन बड़े अधिकार पूर्ण तरीके से हुआ है और जनाब तो लेखक निकले :)
बहुत बढ़िया.