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सोमवार, 6 सितंबर 2010

नई सुबह -------भाग ४

इतना कहकर शैफाली मुझे स्तब्ध खड़ा छोड़कर चली गयी और मैं काफी देर बुत -सा ठगा खड़ा रहा -----------
अब आगे -------------

वो तो दोस्तों ने जब मुझे काफी देर तक दूर खड़ा देखा तो आकर पूछा , "कौन थी वो जो उसके ख्यालों में पहली ही मुलाकात में डूब गया " क्यूँकि उन सब को पता था कि मेरी कोई गर्ल फ्रेंड नहीं है और किसी भी लड़की से आज तक मैंने कभी इतनी देर बात नही की  थी तो उनके लिए तो ये एक नयी बात ही थी.  उस सारा दिन मेरा  मन कॉलेज  के किसी भी काम में नहीं लगा . लेक्चरार ने क्या  पढाया, यार दोस्तों ने क्या कहा मुझे कुछ याद नहीं. मैं तो सारा दिन एक ही सोच में डूबा था कि वो थी कौन जिसने इतनी आत्मीयता से मुझे समझाया जैसे कोई अपना किसी अपने के लिए चिंतित होता है. घर आकर भी मैं इसी उधेड़बुन में लगा रहा और अगले दिन का इंतज़ार करने लगा. सारी रात एक बेचैनी सी छाई रही. रात कटने का नाम ही नहीं ले रही थी . यूँ लग रहा था जैसे आज की  रात मेरी ज़िन्दगी की सबसे लम्बी रात हो. 

अगले दिन वक़्त से काफी पहले ही मैं घर से कॉलेज के लिए निकल पड़ा और कॉलेज के गेट के पास एक पेड़ की ओट में इस तरह खड़ा हो गया कि  मैं तो सबको देख सकूँ मगर कोई मुझे ना देख सके. आज मुझे शिफाली का इंतज़ार था इसलिए हर आने वाले स्टुडेंट में मैं शैफाली को ढूँढ रहा था. खड़े खड़े काफी वक्त निकल गया यहाँ तक कि  मेरी एक क्लास भी मिस हो गयी .यार दोस्त मुझे ढूंढते फिर रहे थे और मैं किसी और को .

थक- हार कर जैसे ही जाने को हुआ  तभी देखा एक चमचमाती कार कॉलेज के गेट के पास अगर रुकी  और उसमे से शैफाली उतरी . उसे देखते ही मेरे तो जैसे पंखों को परवाज़ मिल गयी हो . मैं लगभग दौड़ता सा उसकी तरफ लपका और उसके सामने जाकर खड़ा हो गया मगर अब ख़ामोशी ने आकर मेरा रास्ता रोक लिया . जुबान तालू से चिपक गयी . समझ नहीं आ रहा था कि  कल से तो उससे मिलने को इतना बेताब था और आज जब वो सामने है तो कुछ समझ  नहीं आ रहा था कि  क्या कहूं . मुझे इस तरह चुप देख शेफाली ने ही 'हेलो' कहा और मेरा हाल पूछा तो मुझे भी शब्द मिल गए और मैं कह उठा ,
               बीमार कर के जो चले गए बज़्म से 
              आज पूछ रहे हैं बीमार का हाल कैसा है 
अब मैं अपने चिर -परिचित अंदाज़ में वापस आ गया था . इतना सुन शैफाली ने हँसते हुए कहा -----क्या हुआ है जो मुझ पर इतना संगीन इलज़ाम लगाया जा रहा है . तब मैंने कहा ," शैफाली जी, कल से जब से आपने जो बातें कहीं तभी से आपके ही बारे में सोच रहा हूँ कि  आपको इतना सूक्ष्म ज्ञान कैसे है. जो बात आज तक किसी ने नहीं कही वो आपने निसंकोच पहली ही बार में कह दी  तो मुझे लगता है कि  आप मेरी सबसे बड़ी शुभचिंतक हैं. आप मेरी मार्गदर्शिका बन जाइये और जब भी मैं कुछ भी नया लिखूँगा तो आपको जरूर दिखाऊँगा और आप उसमें जो भी कमी हो बताइयेगा ताकि मैं अपने स्तर में सुधार कर सकूँ ".


मेरे इतना कहते ही  शैफाली जोर से खिलखिलाकर हँस पड़ी और मैं सकपका गया कि  कहीं मैंने अपने पागलपन में कुछ गलत तो नहीं कह दिया इतने में वो बोली ," अरे माधव जी, मैं कोई बहुत बड़ी चिन्तक या विश्लेषक या आलोचक नहीं हूँ मैंने तो सिर्फ साधारण रूप में ये बात कही थी क्योंकि कहीं  ना कहीं मुझे लगा कि  तुम में वो बात  है जो तुम्हें बुलंदी पर ले जा सकती है . बाकी मेरे बारे में कोई ग़लतफ़हमी मत पालो ".


इतना कहकर वो अपनी क्लास में चली गयी और एक बार मुझे सोचने के लिए अकेला छोड़कर. अब धीरे -धीरे मुझमे सच में बदलाव आने लगा था. जिस शायरी को मैंने कभी गंभीरता से नहीं लिया था उसे अब मैंने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था. मैं अपनी शायरी अब और डूबकर लिखने लगा था . जैसा कि  शैफाली ने कहा था . अब उसमे देश , समाज, व्यवहार सब शामिल होता मगर तब भी कभी शैफाली ने  मेरी तारीफ नहीं की बल्कि  हर रचना में कोई ना कोई कमी निकाल ही देती और मैं हर रचना को और स्तरीय बनाने  के लिए पुरजोर मेहनत  करने लगा यहाँ तक कि  अब
मुझमे अब वो पहले  जैसी चंचलता भी कम हो गयी थी और गंभीरता अपना राज़ करने लगी थी. 


मैं और शैफाली दोनों को एक- दूसरे की जब जरूरत होती मिलने लगे थे मगर सिर्फ लेखन से सम्बंधित बातें ही हमारे  तक सीमित थीं. मगर कॉलेज और यार दोस्तों में हमारे प्यार के चर्चे सिर उठाने लगे. सभी तरह तरह के कयास लगाने लगे और जब मुझे और शैफाली  को इस बात का पता चला तो दोनों बहुत जोर से हँसे . हम दोनों तो कभी ऐसा सोच भी नहीं सकते थे .हमें तो समझ ही नहीं आया कि  कैसे सबको सच बताएं क्योंकि कॉलेज में तो जरा किसी से हँस कर बोले नहीं कि ' मामला फिट है' वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है और यहाँ तो हम दोनों ही जब देखो तब एक दूसरे के साथ ज्यादातर वक्त बिताने लगे थे इसलिए किसी का मूँह कैसे बंद किया जा सकता था और अगर हम कुछ कहते भी तो किसी ने उस बात को मानना नहीं था जबकि हम दोनों के बीच ऐसा कुछ नहीं था मगर फिर भी कुछ कर नहीं पा रहे थे . इसी बीच शैफाली की क्लास से एक सेमिनार १५ दिनों के इए शिमला जा रहा था और वो भी वहाँ जा रही थी . ये एक साधारण बात थी तो मैंने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया मगर जब शैफाली चली गयी तो .................


क्रमशः --------------
 

12 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

पठनीयता से भरपूर होना इस शृंखला की विशेषता है।
अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी।

गीली मिट्टी पर पैरों के निशान!!, “मनोज” पर, ... देखिए ...ना!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (ਦਰ. ਰੂਪ ਚੰਦ੍ਰ ਸ਼ਾਸਤਰੀ “ਮਯੰਕ”) ने कहा…

धारावाहिक बहुत बढ़िया चल रहा है!
--
अगली कड़ी की प्रतीक्षा!

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

हिन्दी का प्रचार राष्ट्रीयता का प्रचार है।

हिंदी और अर्थव्यवस्था, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

राजभाषा हिंदी ने कहा…

रोचक कथा। अगली कड़ी की प्रतीक्षा।

हिन्दी का प्रचार राष्ट्रीयता का प्रचार है।

हिंदी और अर्थव्यवस्था, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अगली कड़ी..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कहानी बहुत अच्छी और प्रवाहमयी है ..ऐसे मोड़ पर क्रमश: आ जाता है कि उत्सुकता बढ़ जाती है ...अब आगे इंतज़ार है

अशोक बजाज ने कहा…

लाजवाब .


पोला की बधाई भी स्वीकार करें .

ललित शर्मा-ললিত শর্মা ने कहा…

सार्थक लेखन के लिए बधाई
अगली कड़ी की प्रतीक्षा है

साधुवाद

लोहे की भैंस-नया अविष्कार
आपकी पोस्ट ब्लॉग4वार्ता पर

rashmi ravija ने कहा…

अच्छी लगी माधव से शेफाली कि दोस्ती का प्रसंग...अगली कड़ी की प्रतीक्षा

डॉ. नूतन " अमृता " ने कहा…

aap ki kahani bahut sundar banti chali jaa rahi hai.. araam se tassali se padhti hoo.aur intjaar rahega aagey k hisso kaa...

Babli ने कहा…

कहानी बहुत ही अच्छी और रोचक लगी! अब तो अगली कड़ी की प्रतीक्षा है!

Kishore Choudhary ने कहा…

ये मुलाकात एक बहाना है...
शिमला के सफ़र के बारे में सोच रहा हूँ. शेर भी कमाल था वंदना जी यही तो सुख है एक कवयित्री का कथा लिखने में एक एक्स्ट्रा फाइन शोट खेल लेती हैं.