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गुरुवार, 9 सितंबर 2010

नई सुबह ----------भाग ५

इसी बीच शैफाली की क्लास से एक सेमिनार १५ दिनों के इए शिमला जा रहा था और वो भी वहाँ जा रही थी . ये एक साधारण बात थी तो मैंने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया मगर जब शैफाली चली गयी तो .................
अब आगे-----------

मगर जब शैफाली चली गयी तो मेरा मन उदास रहने लगा. मुझे कुछ भी  अच्छा ना लगता . एक बेचैनी -सी हर जगह छाई रहती. मैं खोया- खोया सा रहने लगा. सारा कॉलेज उसके बिना सूना -सूना सा  लगने लगा. चारों तरफ वीराना नज़र आता. किसी से बात करने का दिल न  करता. दोस्त कुछ कहते तो उन पर भड़क जाता.............उनकी छोटी से छोटी बात भी मुझे चुभने लगी  थी. मैं परेशान  हो गया कि ये मुझे क्या हो रहा है इसलिए घर जल्दी चला जाता मगर चैन तो कहीं नहीं आ रहा था हर जगह मुझे उदास , खामोश, वीरान नज़र आती. एक अजीब सी  जद्दोजहद से गुजर रहा था और इस हाल में एक दिन मैंने फिर लिखना शुरू किया ताकि अपने को कुछ बिजी रख सकूँ. 


अब हर शेर , हर ग़ज़ल में सिर्फ दर्द ही दर्द , विरह और प्रेम के रंग भरे थे. रात दिन खुद को सिर्फ और सिर्फ लेखन में ही डुबा दिया ताकि कुछ पल चैन से जी सकूँ  वरना तो हर प़ल काट खाने को आता था. 


१५ दिन कैसे बीते ये तो सिर्फ मैं ही जानता था मगर अगले दिन शैफाली आ गयी होगी मुझसे मिलेगी आते ही ,इसी उत्साह में रात कैसे कट गयी पता ही नहीं चला. इन्सान का मन भी कैसा होता है कभी तो इंतज़ार का क्षण- क्षण उसे युगों से बड़ा लगता है और कभी एक युग भी एक क्षण सा प्रतीत होता है. सब वक़्त का ही तो खेल है. कुछ ऐसा ही हाल मेरे मन का था. 


अगले दिन शैफाली से मिलने के लिए मैं जल्दी से जल्दी पंख लगाकर उड़कर कॉलेज पहुंचना  चाहता था. मैं जल्दी से उसी जगह पहुच गया जहाँ हम  मिला करते थे मगर वहाँ शैफाली नहीं  थी  तो मैं उसे उसकी क्लास में ढूँढने गया तो पता चला कि वो नहीं आई है. उसकी शिमला में तबियत ख़राब हो गयी थी इसलिए कुछ दिन बाद आएगी.


आज मुझे अफ़सोस हो रहा था कि इतने दिन हो गए हमें मिलते मगर कभी भी हम दोनों ने एक -दूसरे के घर -परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं ली . मैं  तो आज तक जानता ही नहीं था कि उसका घर कहाँ है. अब इंतज़ार करने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं था . मैं क्यूँकि लड़कियों से ज्यादा बात नहीं करता था तो उसकी सहेलियों से भी इस बारे में नही पूछ सकता था कि ना जाने कोई उसका क्या मतलब निकाले .


अब हर दिन उसके इंतज़ार में बीतने लगा और मेरी बेचैनी भी बढ़ने लगी. यार दोस्त मुझसे बात करना चाहते मेरा दिल बहलाना चाहते मगर मेरे तो होशोहवास पर मेरा ही काबू ना था. 


एक दिन मेरे एक दोस्त राकेश ने कहा ,"माधव तू मान न  मान  लेकिन ये  सच है मेरे यार , तुझे शैफाली से प्यार हो गया है. ये बेचैनी, उसके बिना कुछ भी अच्छा ना लगना, दोस्तों से भी बात ना करना,हर वक्त कहीं खोया खोया रहना --------ऐसा तभी होता है जब किसी को किसी से प्यार हो जाता है . तू हर वक़्त उसी का इंतज़ार करता रहता है . उसके नाम लेने पर तेरे चेहरे पर मुस्कान खिल जाती है जैसे लाखों गुलाब एक साथ एक ही बार में खिल गए हों और उसके बगैर तू ऐसा रहता है जैसे किसी ने तेरा सब कुछ छीन लिया हो , अब तू ही बता ये प्यार नहीं है तो और क्या है.अब मान भी जा इस बात को नहीं तो अपने दिल से पूछ कर देख ------क्यों तू ऐसा हो गया. क्या पहले तू ऐसा था. हर दम ज़िन्दगी से भरपूर खुद भी खुश रहता और दूसरों को भी हँसाता रहता था मगर अब देख अपने आप को . कोई भी तुझे जानने वाला पहली ही नज़र में बता देगा कि तुझमे बदलाव आ गया है और ये बदलाव तो सुखद है. अगर तुझे महसूस होता हैकि मैं सही कह रहा हूँ तो इस बारे में सोचना और अपने प्यार का इज़हार कर ताकि हमें हमारा वो ही पुराना दोस्त वापस मिल जाए".


इतना कहकर राकेश तो चला गया मगर अपने पीछे सौ सवाल छोड़ गया.


आज मैं सोचने को मजबूर हो गया था कि कहीं राकेश सही तो नहीं कहा रहा था. कहीं ये सारे लक्षण  प्यार के तो नहीं . क्या सचमुच मुझे प्यार हो गया है जो मैं शैफाली के बिना रह नहीं पाता हूँ. उसके साथ के बिना अधूरा महसूस करना , शायद यही प्यार है. 


अब मैं शैफाली के आने का इंतज़ार करने लगा . करीब एक हफ्ते बाद शैफाली कॉलेज आई तो उसे देखकर यूं लगा जैसे ना जाने कितने सालों से बीमार रही हो . मैं तो उसे देखकर स्तब्ध रह गया. परन्तु शैफाली उसी जोशो- खरोश से मिली जैसे हमेशा से मिलती थी. मैंने पूछा कि  क्या हुआ था तो हँसकर बोली ,"तुम्हारी शायरी सुनी नहीं थी ना इसलिए दिल बीमार हो गया था मगर अब आ गयी हूँ और तुम भी मौजूद हो तो देखना दो ही दिन में ठीक हो जायेगा". मुझे उसकी बातों ने आश्वस्त नहीं किया मगर मैं उसे परेशान भी नहीं करना चाहता था इसलिए चुप रहा.
तभी शैफाली बोली ,"अच्छा बताओ ,इतने दिन मेरे बिना कैसे बिताये ? क्या मेरी याद आई ?क्या मेरी याद में कोई नज़्म लिखी या सोचा अच्छा हुआ मैडम चली गयी चलो कुछ  दिन तो स्कूल की छुट्टी हुई". कितनी सहजता से शैफाली कहे जा रही थी और मैं उसे सिर्फ सुने जा रहा था . इस पल के लिए ही तो इतने दिन से तड़प रहा था और दिल चाह रहा था कि वो कहती रहे और मैं सुनता रहूँ बस और वक़्त यहीं रुक जाये. "अरे , कहाँ खो गए माधव, तुम्ही ही से तो बात कर रही हूँ"  जब शैफाली ने ये कहकर मुझे हिलाया तो अहसास हुआ कि मैं कहाँ हूँ. उस दिन मैंने ज्यादा बात नहीं की और कोशिश करता रहा की मेरी किसी बात से शैफाली को बुरा ना लगे.


अगले दिन मैं कुछ नोर्मल हुआ तो मैंने शैफाली के कहने पर उसे इतने दिन क्या -क्या किया सब बताया और जो -जो लिखा था सब उसे दिखाया. आज मेरा लिखा पढने के बाद शैफाली की आँखों में आँसू भर आये. एक उदासी उसके चेहरे पर छा गयी और वो बुत बनी बैठी रह गयी. उसे इस हाल में देखकर मैं परशान हो गया . ,मुझे लगा कि शायद कुछ गलत लिख दिया मैंने जो वो इतना दुखी हो गयी है. मैंने उसे कहा , " शैफाली तुम परेशान  मत होना अगर ख़राब लिखा है या  पसंद नहीं आया तो कह दो , तुम्हें पता है मुझे तुम्हारा कुछ भी कहना बुरा नहीं लगता ". इस पर वो बोली , " अरे माधव वो बात नहीं है . आज मैं कह सकती हूँ कि अब तुम्हारी लेखनी में वो जादू आ गया है  जिसकी मुझे तलाश थी. आज तुम्हारे लेखन में कहीं कोई कमी नहीं रही. सच यही तो चाहती थी मैं . अब तुम्हें आसमान छूने  से कोई नहीं रोक सकता". मेरे लिए तो ये सब अप्रत्याशित था.


शैफाली  ने पूछा , " अच्छा बताओ ये सब कैसे हुआ. १५ दिन में ही इतना सब कैसे बदल गया. कौन सा ऐसा चमत्कार हुआ कि तुम्हारे लेखन में इतनी उत्कृष्टता आ गयी "?


तब मैंने कहा ---------------


क्रमशः---------------

11 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

कहानी अब और रोचक होती जा रही है!
--
अगली कड़ी की प्रतीक्षा है!

ओशो रजनीश ने कहा…

nice post

यहाँ भी अपने विचार प्रकट करे ---
( कौन हो भारतीय स्त्री का आदर्श - द्रौपदी या सीता.. )
http://oshotheone.blogspot.com

निर्मला कपिला ने कहा…

अज ही पिछली कहानी भी पढी बहुत रोचक कहानी है। आगे इन्तज़ार रहेगा। शुभकामनायें।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बढ़िया चल रही है कहानी ...अब आगे और रोचकता का इंतज़ार है ..

VIJAY TIWARI 'KISLAY' ने कहा…

हुत ही भावनात्मकता उभर आई है कहानी में.
सुंदर चित्रण.
- विजय तिवारी

मनोज कुमार ने कहा…

रोचकता बरकरार है!
अगले अंक का इंतज़ार है!!

आंच पर संबंध विस्‍तर हो गए हैं, “मनोज” पर, अरुण राय की कविता “गीली चीनी” की समीक्षा,...!

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

...बहुत अच्छी प्रेम कहानी है....अगली कडी का इंतजार है!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कहानी रोचक होती जा रही है।

Kusum Thakur ने कहा…

कहानी रोचक ....अगले अंक का इंतज़ार रहेगा !!

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

हिन्दी का विस्तार-मशीनी अनुवाद प्रक्रिया, राजभाषा हिन्दी पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

Kishore Choudhary ने कहा…

तब मैंने कहा

मुझे प्यार तुमसे नहीं है मगर मैंने अब तक न जाना कि क्यों प्यारी लगती है बातें तुम्हारी क्यूँ तुमसे मिलने का ढूंढूं बहाना... शायद आगे कुछ ऐसा होगा पर अभी इस कहानी को पढ़ने में बड़ा मजा आ रहा है.