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शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

नई सुबह -------भाग ८

उसका नाम कृष्णा था. मगर मुझे ये नहीं पता चल पाया कि पागलखाने से भाग जाने के बाद मैं कहाँ रहा ? कैसे दिन गुजरे? किसने देखभाल की? इस बारे में मुझे कुछ पता नहीं चल पाया. 

अब कृष्णा ने कहा ,"अब तुम क्या करोगे भैया "?................

अब आगे ..............


मैंने कहा , "  मुझे तो समझ नहीं आ रहा क्या करूँ , कहाँ जाऊं? मैं आखिर जिंदा ही क्यों हूँ ? अब किसके लिए जियूँ ? कौन है मेरा? मेरा तो सारा संसार ही लुट चुका ". तब कृष्णा ने कहा ," अगर आप बुरा ना मानो तो या तो आप ज़िन्दगी को नए सिरे से शुरू करो या मेरे साथ मेरी झोंपड़ी में रहने चलो". मैंने कहा , " अब किसके लिए नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू करूँ ? अब तो जीने की चाह ही नहीं रही  ". तब कृष्णा मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपनी झोंपड़ी में ले गया .


झोंपड़ी क्या थी सिर्फ इतनी कि दो लोग मुश्किल से पैर फैला सकते थे . एक नया ही अनुभव था मेरे लिए. जैसा जीवन जीने के बारे में कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था आज वो नारकीय जीवन मेरे सामने था मगर मुझे इस सब की कोई परवाह ना थी . जब इन्सान की जीने की चाह ख़त्म हो जाए तो फिर वो किसी भी हाल में रह लेता है . कृष्णा भीख माँग कर गुजारा करता था . जो भी मिलता उसी से अपना और मेरा पेट भरता था . यहाँ तक कि कभी -कभी वो खुद भूखा सो जाता मगर मेरा पेट जरूर भरता . हाँ ,यदि कुछ ना मिलता तो दोनों भूखे पेट ही सो जाते . 


कुछ दिन तक सब यूँ ही चलता रहा और अब मैं भी उसका अभ्यस्त हो चला था तब मुझे बहुत ही आत्मग्लानि होने लगी कि मेरी वजह से वो बेचारा इतना दुखी होता है मगर कभी उफ़ नहीं करता . मैं उसका लगता क्या हूँ........कुछ भी नहीं मगर फिर भी उसके चेहरे पर कभी शिकन नहीं आती . हमेशा हर हाल में मुस्कुराता रहता है. क्या मैं उस पर बोझ बनकर रहूँगा हमेशा ...........जब ये अहसास हुआ तो मुझे लगा कि मुझे भी कोई  काम करना चाहिए  इसलिए मैंने एक दिन उससे कहा कि मुझे भी अपने साथ काम पर लगा दो . घर में खाली बैठा रहता हूँ. उसने काफी मना किया मगर मैं उसके साथ अगले दिन ज़बरदस्ती चला गया मगर मुझसे भीख मांगी ही नहीं गयी क्योंकि ये तो मेरे संस्कारों में ही नहीं था . 


मैंने अगले दिन से दूसरी जगहों पर काम करने की कोशिश की मगर मुझे तो कोई काम आता नहीं था इसलिए लाख कोशिशों के बाद भी मुझे काम नहीं मिला.मजदूरी भी करनी चाही मगर कभी इतनी मेहनत की नहीं थी तो शरीर ने साथ नहीं दिया और बीमार पड़ गया ..........इसका बोझ भी कृष्ण पर ही पड़ा , इससे तो मैं और बेचैन हो गया . एकतो खुद पहले ही उस पर बोझ था ही अब मेरी बीमारी की वजह से वो और परेशान था .मुझे अपने आप से घृणा होने लगी...........क्या है मेरे जीवन का उद्देश्य ...........क्या यही कि दूसरों को दुःख ही देता रहूँ...............अपनी हर मुमकिन कोशिश की मगर कहीं कोई नौकरी भी नहीं मिली क्योंकि हर किसी को कोई ना कोई जमानत चाहिए थी और मेरा तो इस संसार में अपना कहलाने वाला कोई नहीं था इसलिए थक हार कर मैं एक बार फिर उसके साथ जाने लगा . मुझसे भीख तो नहीं मांगी गयी मगर एक कटोरा लेकर खड़ा रहता था . जो भी अपने आप डाल जाता तो ठीक मगर मैं कभी खुद नहीं माँगा करता था.

तभी एकदिन लाल बत्ती पर खडी एक गाडी पर लिखा शेर मैंने पढ़ा तो याद आया कि कभी मैं भी इस फन में माहिर हुआ करता था. तभी एक विचार कौंधा कि क्यों ना अपने उसी हुनर का प्रयोग करूँ और मैंने एक बार फिर से लिखना शुरू कर दिया और भीख से मिले पैसे बचाने लगा ताकि जब पैसे इकठ्ठा हो जाएँ तो अपनी एक किताब छपवाऊं और जितने भी मेरे आस पास के भिखारी दोस्त हैं इनके जीवन में खुशियों का कुछ तो उजाला कर सकूँ . मेरे इस प्रयत्न का जब कृष्णा को पता चला तो वो भी इसमें सहयोग करने लगा और पैसे बचाने लगा . यहाँ तक कि इस चाह में ना जाने कितनी ही रातें वो भूखा सोया होगा.



फिर एक दिन मैं  प्रकाशन के लिए सम्पादक के पास अपनी किताब छपवाने के आशय से गया और अपना लिखा उन्हें पढवाया . वैसे तो ये काम इतना आसान नहीं था मगर मेरा लिखा पहला पृष्ठ पढ़ते ही संपादक मेरे लेखन का कायल हो गया और उसने कम से कम पैसों में मेरी पुस्तक छापने और बिक्री का प्रबंध किया . शायद मेरी नेकनीयती की वजह से भगवान को मुझ पर पहली बार दया आ गयी थी तभी मेरा पहला ही संस्करण इतना लोकप्रिय हुआ कि हाथों हाथ बिक गया और उसके बाद मुझे कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा . बस मैंने इतना किया  कि वहाँ भी मैंने अपना परिचय किसी को नहीं दिया क्योंकि अब कोई लालसा बची ही नहीं थी . अपने लिए जीने की चाह तो कब की मिट चुकी थी बस अब तो उन किताबों की बिक्री से प्राप्त पैसे को मैं पूरा का पूरा सिर्फ अपने भिखारी दोस्तों और आस- पास के दूसरे झुग्गी- झोंपड़ी वासियों पर खर्च कर दिया करता था . यहाँ तक कि उस पैसे का एक भी रुपया अपने ऊपर खर्चा नहीं करता था और सिर्फ भीख के पैसे से ही अपना गुजर -बसर करता था क्योंकि मेरे मन में एक विश्वास घर कर गया था कि ये सब उन सबकी दुआओं और भूखे पेट सोकर बचे पैसे की बदौलत ही संभव हो पाया है और वो पैसा मेरे लिए मेरी पूजा का प्रशाद बन चुका था जिसे मैं सबमे बाँटकर बेहद शांत और खुश महसूस करता था ............जब किसी चेहरे पर ख़ुशी देखता तो मुझे आत्मिक शांति मिलती ..........बस उस पल लगता शायद ईश्वर ने मुझे इन सबकी सेवा के लिए भी बचा कर रखा था ...........जो सुख देने में है वो लेने में कहाँ ...........ये तब जान पाया था और अब इसे ही मैंने अपने जीवन का ध्येय बना लिया था. 

मेरा संपादक हमेशा चाहता था कि मैं दुनिया के सामने आऊं मगर अब कोई इच्छा बाकी नहीं थी इसलिए चाहता था कि अपने लेखन से कुछ ऐसा कर जाऊं ताकि कुछ लोगों का जीवन बदल जाए . 


बस यही मेरी ज़िन्दगी की सारी हकीकत है सर, इतना कहकर माधव चुप हो गया ................


क्रमशः.................अगली किस्त आखिरी है 

 

11 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

कहानी रोचक रही लेकिन अन्त जानने की जिग्यासा बढ गयी है। शुभकामनायें।

वीना ने कहा…

अब लग रहा है कि अंत में क्या होगा...आखिरी किश्त का इंतजार है..पुरानी पोस्ट भी पढ़ी हैं कहानी अच्छी है

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

मशीन अनुवाद का विस्तार!, “राजभाषा हिन्दी” पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

कहानी मार्मिक और रोचक दोनों ही रूप ले चुकी है, लेकिन जीवन में ऐसे भी चरित्र होते हैं और आगे भी होते रहेंगे. आगे का इन्तजार.

Babli ने कहा…

बहुत ही सुन्दर, शानदार और रोचक कहानी है! अब तो अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार है!

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही अच्छी कहानी रही...यह पढ़ मन द्रवित हो गया की..."जब जीने की चाह ही नही रही तो सुख -सुविधा का क्या ख़याल..."...पर माधव का टैलेंट व्यर्थ नहीं गया...उसने दुबारा लिखना शुरू किया...और उसका लिखा लोगों को पसंद भी आया...बड़ा सुखद लगा ये सब पढना..
अगली किस्त का इंतज़ार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर रहा यह एपोसोड भी!
--
इस धारावाहिक पर तो
एक बहुत सुन्दर फिल्म भी बन सकती है!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जिज्ञासा बढ़ी हुयी है।

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

ZEAL ने कहा…

सुन्दर कहानी...आगे का इंतज़ार रहेगा

ओशो रजनीश ने कहा…

बहुत ही सुन्दर, शानदार और रोचक कहानी...

अच्छी रचना है ........

इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??