पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लॉग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जायेये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

फॅमिली बैकग्राउंड

दोस्तों
अभी कुछ दिन पहले मुझसे रश्मि जी ने ये प्रश्न पूछा था और उसका जवाब मैंने ये लिखकर दिया था ...........ये तो थी मेरी सोच अब आप बताइए आप इस बारे में क्या सोचते हैं 


फॅमिली बैकग्राउंड का क्या अर्थ है ? पूरी तरह से सोचकर लिखें ... शब्दिकता पर न जाएँ.




आज के युग में लोग फॅमिली का ही अर्थ नहीं जानते तो फॅमिली बैकग्राउंड  का अर्थ कहाँ समझेंगे . फिर भी एक कोशिश करती हूँ इसे अपने नज़रिए से अर्थ देने की.


मेरे ख्याल से फॅमिली बैकग्राउंड से सीधा अर्थ तो ये ही निकलता है कि-----------

  1. एक फॅमिली के लोग और उनके पूर्वज कैसे थे या कैसे हैं , उन सबके ख्यालात कैसे हैं ?
  2. आधुनिकता की सिर्फ चादर ओढ़े हैं या असलियत में उनके विचारों में परिपक्वता है ?
  3. उनके रहन सहन का तरीका कैसा है?
  4. बोलचाल की भाषा कैसी है ?
  5. सभ्य और सुसंस्कृत है या जैसा देश वैसा भेष वाली है ?
  6. वो क्या काम करते हैं? काम को लेकर कितने serious हैं ?
  7. धार्मिकता का सिर्फ लबादा ही ओढ़ रखा है या वास्तव में संस्कार वान हैं ?
  8. समाज में उनका क्या स्थान है ? कहीं ऐसा तो नहीं सामने तो सब झुककर सलाम करते हों और पीछे से गाली देते हों ?
  9. इन्सान का व्यवहार ही उसकी पहचान होता है .छोटों से कैसा और बड़ों से कैसा व्यवहार करते हैं और हमउम्र से कैसे मिलते हैं ?
  10. अभिमान और दंभ ही तो उनके आभूषण नहीं ? या सहनशीलता , दया और परोपकार ही उनके आभूषण हैं ?

इस तरह की अनेकों चीजें होती हैं जो एक फॅमिली के लिए धरातल बनाती हैं जिनसे उस फॅमिली के बारे में सही आकलन किया जा सकता है .




इसकी तह तक कैसे जायेंगे और क्या वही होता है जिसके लिए हम तथाकथित बैक ग्राउंड देखते हैं ?


ये एक बहुत ही मुश्किल प्रश्न है और जिसका उत्तर तलाशने निकले इन्सान को उसका सही जवाब मिल जाये ये कहना मुमकिन नहीं है क्योंकि हम सभी सिर्फ कुछ पहलुओं पर ही गौर करके आगे की कार्यवाही रोक देते हैं और सोचते हैं कि  जिसकी इतनी बातें सही हैं तो वो सच में सही होगा फिर बाद में धोखा खाने पर हाथ मलने के सिवा और कुछ नहीं मिलता .
हर काम को जितनी लगन और सहनशीलता से किया जाये वो उतना ही अच्छा फल देता है और अगर किसी का फॅमिली  बैकग्राउंड देखना हो तो उसके लिए तो बहुत ही धैर्य से काम लेना होगा .........अपनी आँख और कान चौकन्ने रखने होंगे, किसी की कही बातों पर विश्वास न करके खुद जांचना परखना चाहिए .........हर कदम फूंक फूंक कर रखना चाहिए तभी ये संभव हो सकता है कि मनोवांछित परिणाम प्राप्त हो ............और यदि एक बार धैर्य और लगन से काम कर लिया जाए , छानबीन कर ली जाए तो ज़िन्दगी भर का आराम और दिमागी तसल्ली  मिल जाती है ..........ये पता चल जाता है कि जिसके बारे में हमने जानकारी हासिल की है - वो कैसा है ? हमारी कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं .........एक बार पता चल जाये तो निर्णय लेने में आसानी होती है और ज़िन्दगी को नयी दिशा मिल जाती है .
सिर्फ किसी के कहने भर से या किसी को जानने भर से हम उसके बारे में कोई आकलन नहीं कर सकते .इसी का असर हमारे निर्णय पर पड़ता है और एक सही निर्णय ही ज़िन्दगी को सहज और सरल बना सकता है और गलत उम्र भर की मुसीबत . 
इसलिए मेरी दृष्टि में तो इन सब बातों पर गौर करने के बाद ही हम किसी के बारे में या उसकी फॅमिली के बारे में सही आकलन कर सकते हैं. 



बुधवार, 6 अप्रैल 2011

साथी हाथ बढाना…………


भ्रष्टाचार को अब तो
समूल नष्ट करना होगा
सोये हुओ को अब जगना होगा
वरना अन्जाम से डरना होगा
ये सोया शेर जागा है आज
इससे बचना है तो
हथियार डालने होंगे
एक अन्ना के साथ
लाखों करोडों सितारे होंगे
अब आसमाँ को झुकना होगा
जमीन को उसका हक देना होगा
देश को भ्रष्टाचार मुक्त करना होगा
वरना क्रांति ऐसी आयेगी
सब बहा ले जायेगी
शासन की जडें हिला जायेगी
जागो ……सोने वालों
अब तो जागो………
आज सोने की चिडिया को अपने ही लोग खा रहे हैं । भारत तो कल भी सोने की चिडिया था और आज भी है ……क्या कमी है कुछ नही तभी तो देखो इतना धन है कि लोग अपने हाथो खोखला कर रहे हैं……………कल परायो ने लूटा आज अपने लूट रहे हैं अगर ऐसा बिल आ गया होता तो आज देश का नक्शा ही दूसरा होता………विश्व पटल पर जब आज भारत की छवि इतनी ऊँचाइयां प्राप्त कर रही है तो ज़रा सोचिये अगर वो धन जो स्विस बैंक मे जमा है वो यहीं उपयोग होता तो देश कहाँ से कहाँ पहुँच गया होता मगर जब पालनहार ही मारनहार बन जाये तो आम जनता कहाँ जायेगी और देश तो बर्बादी के कगार पर पहुंचेगा ही ऐसे मे अन्ना जी जैसे महापुरुष का कदम एक तडपते हुये इंसान के मूँह मे दो बूँद गंगाजल डालने के बराबर है और इसमे हम सब को सहयोग करना चाहिये ये किसी एक इंसान की नही सारे देश की जनता की आवाज़ है और हम सब इस मुहिम मे उनके साथ हैं…………जय हिंद

मंगलवार, 29 मार्च 2011

अब कैसे नव सृजन हो ?...................100 वीं पोस्ट

शब्द निराकार हो गए
अर्थ बेकार हो गए
अब कैसे नव सृजन हो ?

चिंतन बिखर गया
आस की ओस
हवा मे ही
खो गयी
निर्विकारता
निर्लेपता का
आधिपत्य हो गया
अब कैसे नव सृजन हो ?

ह्रदय तरु पर
कुंठाओ का पाला
पड गया
संवेदनायें अवगुंठित
हो गयीं
दृश्य अदृश्य हो गया
अब कैसे नव सृजन हो?

शून्यता मे आरुढ
हर आरम्भ और अंत
भेदभाव विरहित
आत्मानंद
सृष्टि का विलोपन
अब कैसे नव सृजन  हो?

रविवार, 27 मार्च 2011

निस्वार्थ्

कभी कभी शब्द एक खेल बन जाते हैं दिल और दिमाग के बीच ……कभी दिल के हाथ बिकते हैं तो कभी दिमाग के हाथों नीलाम होते हैं.………पर क्या कभी शब्दो को सही मुकाम हासिल होता है? क्या शब्दों की अपनी दुनिया मे उनका कोई निज़ी अस्तित्व होता है जब तक की अभिव्यक्त ना हो जायें ……किसी के हाथ की कठपुतली ना बन जायें तब तक शब्द सिर्फ़ शब्द बन कर ही रह जाते हैं …………अस्तित्व होते हुये भी अस्तित्वहीन …………क्या स्त्री और शब्दों मे कोई समानता है? शायद हाँ, तभी अपने स्वतंत्र अस्तित्व होते हुये भी अपनी पह्चान के लिये किसी के हाथों की कठपुतली बन जाते है दोनो………शायद दोनो का एक ही स्वभाव है………दूसरे को पहचान देना…………दूसरे के भावो को स्वंय मे समाहित करना और बिखर जाना…………खुद को मिटा देना मगर अपना जीना सार्थक कर देना ……………शायद ज़िन्दगी ऐसे भी जी जाती है ……निस्वार्थ्।

बुधवार, 23 मार्च 2011

मुझे भी अपना बना लेना

पुकारना नही आता
पूजन नही आता
वन्दन नही आता
नमन नही आता
बस
स्मरण करना
व्याकुल होना
और अश्रु बहाना
यही मेरी पूंजी है
मोहन ये आह
क्या तुम तक
पहुंचती है?
क्या तुम्हे भी
याद आती है
क्या तुम भी
विरह मे
तडपते हो?
निर्विकार
निर्मोही
निर्लेप हो
जानती हूँ
फिर भी
सुना है
किसी के लिये
तुम भी तड्पते हो
उस किसी मे
एक नाम मेरा भी
जोड लेना
राधा नही बनना
बस बंसी बना
अधरों पर
सजा लेना
मुझे भी
श्री अंग लगा लेना
प्राण रस फ़ूंक देना
अमृत रस बरसा देना
श्याम ,मुझे भी
अपना बना लेना



ये उस दिन सुबह लिखी गयी थी जिस दिन जापान मे सुनामी का कहर बरपा था और शायद एक कहर इस तरह मेरे दिल पर भी बरपा था या शायद आगत का कोई संदेशा था ये और दिल से ये उदगार फ़ूट पडे।

रविवार, 20 मार्च 2011

मै तो हर मोड पर उनको ढूँढा सदा्

मै तो हर मोड  पर
उनको ढूँढा सदा्
होली के बहाने
रंगो को लगाने
ना जाने कौन गली
छुपे हैं सांवरिया
किस बैरन ने
छुपाय लीन्हो
सजनवा हमार
हरण कर लीन्हो
कोई तो पता
बताय दीन्हो
होली म्हारी
सरस कर दीन्हो

टेसू के फ़ूल
कुम्हला गये हैं
अबीर गुलाल भी
रोने लगे हैं
सजन के बिन
मायूस हुये हैं
अब तो पता
बताय दो गुजरिया
फ़ाग को रंग
चढाय दो गुजरिया
हमका सजन से
मिलाय दो गुजरिया
प्रीत रस मे
भीजन दो गुजरिया
हमका सांवरिया से
मिलाय दो गुजरिया
आज प्रेम अटरिया
चढ्न दो बावरिया
होली के बहाने
प्रेम की होली
खेलन दो गुजरिया
श्याम को मेरा
होने दो गुजरिया

गुरुवार, 17 मार्च 2011

आज बिरज मे होरी रे रसिया

आज बिरज मे होरी रे रसिया-2-
मेरे  बिरज मे ना हुई बरजोरी रे रसिया

मै भी प्रेम रंग घोल के बैठी
श्याम मिलन की आस मे बैठी
मुझ संग हुई ना ठिठोली रे रसिया
आज बिरज मे होरी रे रसिया-2-

श्याम रंग की मै हूँ दीवानी
मीरा सी नाचूँ मस्तानी
मुझ संग होरी ना खेले रे सांवरिया
आज बिरज मे होरी रे रसिया

शनिवार, 12 मार्च 2011

कैसे खेलूँ मैं कन्हाई

कैसे खेलूँ मैं कन्हाई 
तेरे संग प्रीत की होरी 

ब्रज गोपियाँ  
ढूँढें गली गली 
प्रेम की ओढ़ चुनरिया 
 यहाँ वहां जहाँ तहां देखा
मिला न श्याम सलोना  
 जा बैठा छुप के 
मैया के आँचल में
कैसे ढूंढूं मैं कन्हाई 
कैसे खेलूँ मैं कन्हाई
तेरे संग प्रीत की होरी  


श्याम रंग की 
भर पिचकारी 
जब सखियों ने मारी
मैं भी हो गयी श्याम रंग में 
मैं भी रंग गयी श्याम रंग में
सुन मेरे ओ कन्हाई
अब तो आ जा रे सांवरिया
अब तो मिल जा रे सांवरिया
कैसे खेलूँ मैं कन्हाई
तेरे संग प्रीत की होरी 


प्रीत की रीत मैं नाही जानूं 
होरी को बन गयो बहानो 
श्याम से मिलने है जानो 
अब न चलेगो कोई बहानो
आ जा आ जा रे सांवरिया
गले लगा जा रे सांवरिया
श्याम रंग में भिगो जा रे सांवरिया
दुल्हनिया अपनी बना जा रे सांवरिया
प्रेम रस पिला जा रे सांवरिया
फाग मेरी भी मना जा रे सांवरिया
होरी की रीत निभा जा रे सांवरिया
पूरण कर जा हर आस रे सांवरिया
छूटे अब ये भव त्रास रे सांवरिया
होरी का रंग ऐसा चढा जा रे सांवरिया
सुध बुध खो बन जाऊँ जोगनिया
मै तेरी तू मेरा बन जाये रे सांवरिया
इक दूजे मे खो जायें रे सांवरिया
रंग मे रंग मिल जाये रे सांवरिया
इक रंग हो जायें रे सांवरिया 
होरी हो जाये सार्थक रे सांवरिया
प्रीत चढ जाये गगन रे सांवरिया

मंगलवार, 8 मार्च 2011

कान्हा कान्हा
मै जोगन बन जाऊंगी
तेरे प्रेम मे
मै जोगन बन जाऊँगी

श्याम प्यारे मोहन प्यारे
रटती रही नाम तुम्हारे
अब तुम बिन कटते नही
दिन रैन हमारे
इक बार आ जाओ
मोहन प्यारे
गले से लगा जाओ
श्याम सखा रे
कान्हा कान्हा
मै जोगन बन जाऊंगी


कर में लेकर इकतारा
प्रेम दीवानी मीरा बन जाऊँ
श्याम नाम की रटना लगाऊं
श्याम धुन में हो मतवाली
गली गली नाचूं
बन श्याम दीवानी
कान्हा कान्हा
मैं जोगन बन जाउंगी



मंगलवार, 1 मार्च 2011

वक्त वक्त की बात है

अरे शिखा कहाँ भागी जा रही है ? ढंग से चप्पल तो पहन ले और फिर बैठकर आराम से नाश्ता कर ले. ये क्या तरीका है भागते- भागते एक कौर मूंह  में और एक हाथ में और दूसरे हाथ में सामान. ये कोई तरीका है कितनी बार कहा है आराम से बैठकर खाया कर मगर तू तो सुनती ही नहीं है. उमा बोले जा रही थी और शिखा फटाफट काम करती जा रही थी और हंसती जा रही थी, अरे माँ, क्यूँ परेशान हो रही हो ? मैंने खा लिया है तुम्हें तो पता है न देर हो रही है और देर से ऑफिस जाउंगी तो डांट पड़ेगी शिखा कहती रही मगर उमा तो अपने ही ख्यालों में थी . बोली , "न जाने क्या होगा तेरा मुझे तो समझ ही नहीं आता, कैसे तेरा गुजारा होगा ? अरे पराये घर भी जाना है , यहाँ तो मैं हूँ सब कुछ पका -पकाया तैयार मिलता है वहां तो तुझे ही सब करना भी पड़ेगा और खुद को जाना भी होगा तब कैसे करेगी"? 
शिखा बोली,"ऐसा कुछ नहीं होगा ,देख लेना, सभी तो होंगे , मिलजुलकर करेंगे तो जल्दी से हो जायेगा सुनते ही उमा बोली , कौन से ख्वाब में जी रही है मेरी बिटिया , आज तक तो मैंने देखा नहीं एक भी ऐसा घर, बस घर की बहू ही सबके लिए काम करे और कमाकर भी लाये . इस पर शिखा बोली, माँ तुम देखना, अब ऐसा कुछ नहीं होने वाला . आज सब  अपना- अपना काम खुद  करते हैं और वहां भी सभी को करना होगा . वो किसी अनोखी मिटटी के नहीं बने जैसे मैं वैसे वो. और फिर आजकल काफी से ज्यादा काम तो मशीनों से ही हो जाते हैं . तुम चिंता मत करो. इस पर उमा बोली , "चिंता ! तेरी तो सबसे ज्यादा चिंता है . खुद को कुछ आता है नहीं कैसे सबको खुश रखेगी? और पति का भी ध्यान रखना पड़ेगा तुझे ही .....सुनते ही शिखा खिलखिलाकर हंस पड़ी और बोली, "मैं ख्याल रखूँगी "? क्यूँ क्या वो कोई दूध पीता बच्चा होगा? सुनकर उमा बोली, " कैसी बात करती है ? पति की जरूरतों का ध्यान रखना ही तो पत्नी का फ़र्ज़ होता है . उसके काम तो करने ही पड़ते हैं".
इतना  सुनना था कि शिखा तिलमिला कर बोली , क्यूँ उसके काम करूँगी, मैं क्या कोई उसकी गुलाम होंगी जो काम करूँगी. अरे माँ, ये बताओ मुझमे क्या कमी है जो मैं घर और बाहर दोनों जगह अपने को पीसती रहूँगी . अच्छे ओहदे पर हूँ , अच्छी तनख्वाह है , किस बात की कमी है मुझमे. और फिर आजकल पति और पत्नी दोनों को मिल जुलकर ही काम करना पड़ता है और करना भी चाहिए तभी ज़िन्दगी आराम से गुजरती है . 
सुनकर उमा बोली , कैसी बातें करती है शिखा , मुझे तो कभी -कभी डर लगता है पता नहीं तेरी कैसे निभेगी? बराबरी  करने से  कुछ नहीं होता .......कितना भी ऊँचा ओहदा हो हर औरत को घर के कामकाज , देखभाल करनी ही पड़ती है . आखिर वो भी तो पैसा  लाता  है घर में  और उसका घर होता है तो क्यूँ नही चाहेगा तुम से ऐसी अपेक्षा कहकर उमा शिखा का मुँह ताकने लगी. माँ , पैसे लाने से ही सब कुछ नहीं होता मैं भी तो लाती हूँ . बराबर के अधिकार और कर्त्तव्य होते हैं दोनों के. कोई छोटा बड़ा नहीं होता पति- पत्नी के रिश्ते में . अब ये बताओ तुमने अपनी बेटी में ऐसी कौन सी कमी देखी जो वो किसी के आगे झुकेगी. जितना वो अपने बेटे पर पैसा खर्च करते हैं क्या तुमने उससे किसी भी तरह कम पैसा खर्चा किया है क्या ? क्या उन लोगों से कम शिक्षा दिलवाई है ? या मुझमे किसी तरह की कोई कमी है ? जब मुझमे कोई कमी नहीं है तो तुम क्यों चिंता करती हो . अब वो ज़माने नहीं रहे . आज स्त्री और पुरुष दोनों कदम से कदम मिलाकर चलते हैं तभी सफलता पाते हैं और तुम देखना मेरे साथ ऐसा ही होगा और बहुत खुशहाल जीवन होगा हमारा . तुम निश्चिन्त रहो , इतना कहकर शिखा तो चली गयी मगर उमा अपनी ही उधेड़बुन में पड़ी रही . उसे चिंता सताती कि इसके ऐसे विचारों के कारण न जाने कैसे इसकी निभेगी ?

मगर वक्त अपनी रफ़्तार से चलता है . शिखा ने जो कहा वो ही करके दिखाया  भी . आज शिखा और रोहित दोनों ही खुशहाल जीवन जी रहे हैं . मिलबाँट कर काम करते हैं बच्चों को भी अच्छी परवरिश दे रहे हैं ये देखकर उमा ख़ुशी से फूली नहीं समाती और सोचती वक्त के साथ सब बदलता है फिर चाहे  सामाजिक मान्यताएं हो या इंसानी सोच. उनके वक्त में तो ऐसा सोच भी नहीं सकते थे मगर आज की पीढ़ी काफी व्यावहारिक हो गयी है और एक दूसरे की जरूरतों को समझती है तभी इतनी कुशलता से घर , ऑफिस , बच्चों और समाज में तालमेल बैठा लेती है . आज की पीढ़ी की कार्यकुशलता , ऊर्जा और हिम्मत देख उमा की सारी सोच को विराम मिल गया था और भविष्य के प्रति वो आश्वस्त हो चुकी थी.

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

क्या हाऊस वाईफ का कोई अस्तित्व नहीं ?

क्या हाऊस वाईफ  का कोई अस्तित्व नहीं ?
क्या उसे financial decision लेने का कोई अधिकार नहीं ?
क्या   हाऊस वाईफ सिर्फ बच्चे पैदा  करने और घर सँभालने के लिए होती हैं ?
क्या हाऊस वाईफ का परिवार , समाज और देश के प्रति योगदान नगण्य हैं ?
यदि नहीं हैं तो
क्यों ये आजकल के लाइफ insurance , बैंक या mutual fund आदि से फ़ोन पर पूछा  जाता हैं कि आप हाऊस वाईफ हैं या वर्किंग  ?
financial decision तो सर लेते होंगे ?
इस तरह के प्रश्न करके ये लोग  हाऊस वाईफ के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़ा नहीं कर रहे ?

क्यों आज ये पढ़े लिखे होकर भी ऐसी अनपढ़ों जैसी बात पूछी जाती हैं और सबसे मज़ेदार बात ये कि पूछने वाली भी महिला होती हैं .
क्यूँ उसे पूछते वक्त इतनी शर्म नहीं आती कि महिलाएं वर्किंग हों या हाऊस वाईफ उनका योगदान देश के विकास में एक पुरुष से किसी भी तरह कमतर नहीं हैं . जबकि  आज सरकार ने भी घरेलू  महिलाओं के योगदान को सकल घरेलू  उत्पाद में शामिल करने का निर्णय लिया हैं .................अपने त्याग और बलिदान से , प्रेम और सहयोग से हाऊस वाईफ इतना बड़ा योगदान करती हैं ये बात ये पढ़े लिखे अनपढ़ क्यूँ नहीं समझ पाते ?

आज एक स्वस्थ और खुशहाल समाज इन्ही हाऊस वाईफ की देन हैं यदि ये भी एक ही राह पर निकल पड़ें तो पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करने में कोई कमी नहीं रहेगी और उसका खामियाजा वो चुका रहे हैं तभी वो भी हम पूरब वालों की तरफ देख रहे हैं और हमारे रास्तों का अनुसरण कर रहे हैं . आज बच्चों की परवरिश और घर की देखभाल करके जो हाऊस वाईफ अपना योगदान दे रही हैं वो किसी भी वर्किंग वूमैन से काम नहीं हैं ---------क्या ये इतनी सी बात भी इन लोगों को समझ नहीं आती ?

इस पर भी कुछ लोगों को ये नागवार गुजरता है और वो उनके अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं ..........पति और पत्नी दोनों शादी के बाद एक इकाई की तरह होते हैं फिर सिर्फ आर्थिक निर्णय लेने की स्थिति में एक को ही महत्त्व क्यूँ? क्या सिर्फ इसलिए क्यूंकि वो कमाता है ? ऐसा कई बार होता है कि कोई मुश्किल आये और पति न हो तो क्या पत्नी उसके इंतज़ार में आर्थिक निर्णय न ले ? या फिर पत्नी की हैसियत घर की चारदीवारी तक ही बंद है जबकि हम देखते हैं कि कितने ही घरों में आज और पहले भी आर्थिक निर्णय महिलाएं ही लेती हैं........पति तो बस पैसा कमाकर लाते हैं और उनके हाथ में रख देते हैं ..........उसके बाद वो जाने कैसे पैसे का इस्तेमाल करना है ..........जब पति पत्नी को एक दूसरे पर इतना भरोसा होता है तो फिर ये कौन होते हैं एक स्वच्छ और मजबूत रिश्ते में दरार डालने वाले.............ये कुछ लोगों की मानसिकता क्या दर्शा रही है कि हम आज भी उस युग में जी रहे हैं जहाँ पत्नी सिर्फ प्रयोग की वस्तु थी ............मानती हूँ आज भी काफी हद तक औरतों की ज़िन्दगी में बदलाव नहीं आया है तो उसके लिए सिर्फ हाउस वाइफ  के लिए ऐसा कहना कहाँ तक उचित होगा जबकि कितनी ही वोर्किंग वुमैन  भी आज भी निर्णय नहीं ले पातीं ...........उन्हें सिर्फ कमाने की इजाजत होती है मगर खर्च करने या आर्थिक निर्णय लेने की नहीं तो फिर क्या अंतर रह गया दोनों की स्थिति में ? फिर ऐसा प्रश्न पूछना कहाँ तक जायज है कि निर्णय कौन लेता है ? और ऐसा प्रश्न क्या घरेलू महिलाओं के अस्तित्व और उनके मन सम्मान पर गहरा प्रहार नहीं है ?


 ऐसी कम्पनियों पर लगाम नहीं लगाया जाना चाहिए ..........उन्हें इससे क्या मतलब निर्णय कौन लेता है .........वो तो सिर्फ अपना प्रयोजन बताएं बाकि हर घर की बात अलग होती है कि कौन निर्णय ले ...........ये उनकी समस्या है चाहे मिलकर लें या अकेले........उन्हें तो इससे फर्क नहीं पड़ेगा न ........फिर क्यूँ ऐसे प्रश्न पूछकर घरेलू महिलाओं के अस्तित्व को ही सूली पर लटकाते हैं ?


क्या आप भी ऐसा सोचते हैं कि -----------

घरेलू महिलाएं निर्णय लेने में सक्षम नहीं होतीं?
उन्हें अपने घर में दायरे तक ही सीमित रहना चाहिए?
आर्थिक निर्णय लेना उनके बूते की बात नहीं है ?
जो ये कम्पनियाँ कर रही हैं सही कर रही हैं?

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

क्या होती है माँ

माँ की महिमा अनंत है कितना ही कह लो हमेशा अधूरी ही रहेगी ...........क्या माँ के प्यार को शब्दों में बांधा जा सकता है ? उसके समर्पण का मोल चुकाया जा सकता है ? जैसे ईश्वर को पाना आसान नहीं उसी तरह माँ के प्यार की थाह पाना आसान नहीं क्यूँकि माँ इश्वर का ही तो प्रतिरूप है फिर कैसे थाह पाओगे? कैसे उसका क़र्ज़ चुकाओगे? 

माँ के प्रति सिर्फ फ़र्ज़ निभाए जाते हैं , क़र्ज़ नहीं चुकाए जा सकते . माँ के भावों को समझा जाता है उसके त्याग का मोल नहीं लगाया जा सकता ...........उसको उसी तरह उम्र के एक पड़ाव पर सहेजा जाता है जैसे वो तुम्हें संभालती थी जब तुम कुछ नहीं कर सकते थे ...........जानते हो जैसे एक बच्चा अपनी उपस्थिति का अहसास कराता है .........कभी हँसकर , कभी रोकर , कभी चिल्ला कर , कभी किलकारी मारकर......... उसी तरह उम्र के एक पड़ाव पर माँ भी आ जाती है जब वो अकेले कमरे में गुमसुम पड़ी रहती है और कभी -कभी अपने से बातें करते हुए तो कभी हूँ , हाँ करते हुए तो कभी हिचकी लेते तो कभी खांसते हुए अपने होने का अहसास कराती है और चाहती है उस वक्त तुम रुक कर उससे उसका हाल पूछो , दो शब्द उससे बोलो कुछ पल उसके साथ गुजारो जैसे वो गुजारा करती थी और तुम्हारी किलकारी पर , तुम्हारी आवाज़ पर दौड़ी आया करती थी और तुम्हें गोद में उठाकर पुचकारा करती थी , तुमसे बतियाती थी ........ऐसे ही तुम भी उससे कुछ पल बतियाओ , उसकी सुनो चाहे पहले कितनी ही बार उन बातों को तुम सुन चुके होते हो पर उसे तो याद नहीं रहता  ना तो क्या हुआ एक बार और सही .........उसने भी तो तुम्हारे एक ही शब्द को कितनी बार सुना होगा , जब समझ नहीं आता होगा मगर तब भी उस शब्द में तुम्हारी भाषा समझने की कोशिश करती होगी ना ............वैसे ही क्या तुम नहीं सुन सकते ? क्या कुछ पल का इन छोटे छोटे लम्हों में उसे सुकून नहीं दे सकते ? बताओ क्या तुम ऐसा कर पाओगे ? नहीं , तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगे. तुम्हारे पास वक्त ही कहाँ है ? तुम तो यही उम्मीद करते हो कि इतनी उम्र हो गयी माँ की मगर अक्ल नहीं है कब क्या कहना है .........ज़रा सी बात पर ही  दुत्कार दोगे ...........बहुत मुश्किल है माँ होना और बहुत आसान है बेटा बनना ...............ये तो एक बानगी भर है उसने तो अपनी ज़िन्दगी दी है तुम्हें ...........अपने लहू से सींचा है ..........क्या कभी भी कोई भी बेटा या बेटी इसका मोल चुका सकते हैं ?  क्या कभी भी मातृॠण  से उॠण  हो सकते हैं ? ये तो सिर्फ अपना फ़र्ज़ भी ढंग से निभा लें और माँ को प्यार से दो रोटी दे दें दो मीठे बोल बोल दें और थोडा सा ध्यान दे दें तो ही गनीमत है .............इतना करने में भी ना जाने कितने अहसान उस बूढी काया पर डाल दिए जायेंगे और वो अकेली बैठी दीवारों से बतियाएगी मगर अपना दुःख किसी से ना कह पाएगी आखिर माँ है ना ........कैसे अपने ही बच्चों के खिलाफ बोले ................हर दर्द पी जायेगी और ख़ामोशी से सफ़र तय कर जायेगी ..........जाते जाते भी दुआएँ दे जायेगी .........बस यही होती है माँ ..........जिसके लिए शब्द भी खामोश हो जाएँ .

वक्त की सलीब पर लटकी
एक अधूरी ख्वाहिश है माँ
बच्चे के सुख की चाह में पिघली
एक जलती शमा है माँ
ज़िन्दगी के नक्कारखाने में
बेआवाज़ खामोश पड़ी है माँ
वक्त पर काम आती है  माँ
मगर वैसे बेजरूरत है माँ
घर के आलीशान सामान में
कबाड़ख़ाने का दाग है माँ
सांसों संग ना महकती है माँ
अब तो उम्र भर दहकती है माँ 
जब किसी काम ना आये
तो उम्र भर का बोझ है माँ
वक्त की सलीब पर लटकी
एक अधूरी ख्वाहिश है माँ

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

प्रकृति भी प्रेम रस बहाने लगी

आम के पेड़ पर बौर आने लगे
कोयलिया भी गुनगुनाने लगी
कलियाँ भी खिलखिलाने लगीं
पुष्पों पर वासंतिक रंग छाने लगे
दिल में उमंगों के गीत आने लगे
आ जाओ कान्हा मन मधुबन में
प्रकृति भी प्रेम रस बहाने लगी

कालिंदी भी लहराने लगी
प्रेम मयूर ह्रदय आँगन में
मदमस्त हो नृत्याने लगा
कुञ्ज गलियाँ भी बुलाने लगीं
मुरलिया भी प्रेम धुन गाने लगी
आ जाओ कान्हा मन मधुबन में
अब तो प्रेम रस सब बहाने लगे
प्रकृति भी प्रेम रस बहाने लगी

प्रेम चुनरिया धानी कर दो
प्रेम रस में मुझको पग दो
आनंद सिन्धु आनंद बरसा दो
महारास में शामिल कर लो
प्रीत की रीत निराली कर दो
प्रेम रंग वासंतिक कर दो
आ जाओ कान्हा मन मधुबन में
प्रकृति भी प्रेम रस बहाने लगी

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

अनूठा परिवर्तन्………क्या आप भी ऐसा सोचते हैं?

आज एक सोच ने जन्म लिया है यार , पता नहीं तू या दुनिया उसे कैसे ले मगर सोचता हूँ कि काश ऐसा हो सके तो आधे से ज्यादा परिवार सुख शांति का जीवन बसर कर सकें ........कहते कहते राकेश  सोच में डूब गया .

अरे ऐसी कौन सी सोच ने तुझे जादू की पुडिया थमा दी कि तू दुनिया की मुश्किलात का हल ढूँढने लगा ...........बोल ना राकेश ..........अबे साइंटिस्ट कहाँ खो गया , अब कुछ बोल भी , कहते हुए विनीत राकेश को देखने लगा .

हलकी सी मुस्कान बिखेरता हुआ , आँखों में गहराई लिए राकेश बोला ,देख विनीत , आधे से ज्यादा रिश्ते आपस में आई दूरी की वजह से टूट जाते हैं खास तौर से पति पत्नी का रिश्ता ...........दोनों एक उम्र तक तो एक दूसरे को झेल लेते हैं मगर उसके बाद जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तब दोनों में एक ठंडापन सा आने लगता है , एक दूसरे से कटने लगते हैं , छोटी छोटी बातें   इतना उग्र रूप धारण कर लेती हैं कि परिवार बिखर जाते हैं मगर कोई भी उस मोड़ पर अपनी हार स्वीकार नहीं करना चाहता ..........इसे ज़िन्दगी का अहम् बना लेता है और अपने अहम् से कोई नीचे नहीं आना चाहता , एक पल के लिए रुकते हुए राकेश बोला ,"ऐसे में अगर कुछ ऐसा हो जाये जिससे ज़िन्दगी में नयी ऊर्जा का संचार हो जाए तो क्या वो रिश्ते जो इतने सालों से एक दूसरे से बंधे थे , टूटने से बच ना जाएँ .

इतना सुनकर विनीत बोला," बात तो सही है मगर महाराज ये भी बताइए कि कैसे होगा ये सब ? कौन सा जादू का मंतर फेर कर रिश्तों को टूटने से बचाया जा सकता है ."


देख, आज कल ज्यादातर रिश्ते किसी दूसरे के ज़िन्दगी में आने से टूटते हैं , ये तो मानता है ना तू .ज्यादातर मामले ये ही होते हैं . अनैतिक सम्बन्ध भी ज्यादातर एक उम्र के बाद ही पनपते हैं जब रिश्तों में बासीपन महसूस होने लगता है या दोनों अपनी ही दुनिया में मस्त होजाते हैं और दूसरे से अपेक्षा रखते हैं कि वो उन्हें अब तक नहीं समझा तो ऐसे रिश्ते का बोझ क्या ढोना ?तब इंसान दूसरी तरफ , जहाँ उसकी सोच और उसे समझने वाला कोई मिलता है तो उसकी तरफ उसका रुझान बढ़ने लगता है और कब ऐसे रिश्ते मर्यादा की सीमाएं पार कर लेते हैं और फिर अच्छा भला  घर कब टूट जाता है, पता भी नहीं चलता . मगर अपने जीवन साथी से कोई कुछ नहीं कहता कि एक दूसरे से वो क्या चाहते हैं और शायद दोनों में से कोई एक दूसरे से इतने वर्ष साथ रहने का बाद कहने की इच्छा भी नहीं रखता ये सोचकर कि जो अब तक नहीं समझा वो अब कहने पर क्या समझेगा ? और बस आपस में दूरियां बढ़ने लगती हैं और फिर धीरे धीरे जब  किसी का जीवन में प्रवेश होता है तो वो उसे अपना सा लगने लगता है ...........और यहीं घर परिवार टूटने लगता है.


हाँ , आजकल तो यही देखने में ज्यादा आ रहा है वरना तो ज़िन्दगी कभी हँसते तो कभी रोते सभी गुजार ही लेते हैं मगर किसी दूसरे का दखल अपनी शादी शुदा ज़िन्दगी में कोई नहीं चाहता .


तो फिर सोच अगर ये दखल एक सकारात्मक रूप ले ले तो ?


अरे वो कैसे? चौंकता हुआ विनीत बोला .


तब राकेश हँसता हुआ बोला.........देख हम सभी की ज़िन्दगी में ये क्षण आते ही हैं मगर हर कोई उसका डटकर मुकाबला नहीं कर पाता  सिर्फ कुछ दृढ निश्चयी  लोग होते हैं जो इस फेज  से गुजर जाते हैं मगर बाकी की ज़िन्दगी अस्त व्यस्त हो जाती है ............ऐसे में अगर वो इस रिश्ते को सिर्फ एक ऐसे रूप में लें जैसे राधा कृष्ण का था , जैसे वहाँ वासना का कोई स्थान नहीं था मगर रिश्ता इतना गहरा था कि जितना कृष्ण की पत्नियाँ भी कृष्ण को नहीं जानती थीं उतना राधा जानती थी ..........इतना पवित्र , पावन रिश्ता हो और सबसे बड़ी बात ये दोनों को पता भी हो चाहे पति हो चाहे पत्नी , किसी का भी रिश्ता हो मगर पता दोनों को हो कि वो उसे चाहता है या चाहती है मगर उस चाहत में वासना नहीं है सिर्फ एक दूसरे को समझने की शक्ति है जो उनके अहसासों को  समझते हैं , उनकी अनकही बातों को दिशा देने वाला कोई है उनके जीवन में , वो बातें  जो कोई भी पति या पत्नी कई बार एक दूसरे से नहीं कह पाता वो एक अनजान जो उन्हें भावनात्मक स्तर पर समझता है उससे कह देता है और फिर वो अपने को कितना हल्का महसूस करने लगता है और ज़िन्दगी दुगुने जोश से जीने लगता है क्योंकि सिर्फ एक यही अहसास काफी होता है कई बार जीने के लिए कि कोई है जो उसे उससे ज्यादा समझता है, जिससे वो अपने दिल की उन सब बातों को कह सकता है जो अपने साथी से नहीं कह पाता  ..........इसी से ज़िन्दगी में आशा और उर्जा का संचार होने लगता है और ज़िन्दगी एक नयी करवट लेने लगती है ..........बस सबसे बड़ी बात ये हो कि पति और पत्नी दोनों को एक दूसरे पर इतना विश्वास जरूर हो कि वो इस सम्बन्ध को अपनी मर्यादा से आगे नहीं लाँघेगा .............फिर देखो ज़िन्दगी कितनी हसीन हो जाएगी .............बशर्ते वहाँ भाव प्रधान हों वासना नहीं ...........कहकर राकेश चुप हो गया और विनीत खिलखिलाकर हँस पड़ा और बोला, "बेटे , ये दुनिया अभी इतनी बोल्ड नहीं हुई है जिसने आज तक राधा कृष्ण के सम्बन्ध को नहीं स्वीकारा उस पर भी आक्षेप लगाती रहती है उसमे कहाँ ये उम्मीद करता है कि इस बात को स्वीकार करेगी ............अरे ऐसे रिश्ते की आड़ में ना जाने कौन कैसे खेल खेल जाएगा ..........वैसे मैं तेरी बात भी समझ रहा हूँ मगर सिर्फ मेरे समझने से क्या होगा ............शायद तेरा ख्याल समाज को एक नयी दिशा दे मगर इतना बड़ा दिल कहाँ से लायेगा कोई ?जो सुनेगा हंसेगा या पागल कह देगा और वैसे भी कानून में भी इसे मान्यता नहीं मिलेगी ............अभी सोच में इतने बदलाव नहीं आये हैं ........अब मुझे ही देख , यदि तू कहे कि मैं तेरी बीवी को तुझसे ज्यादा जानता हूँ और जो वो महसूस करती है उसका मुझे ज्यादा पता है तो इतना सुनते ही मैं आग बबूला हो जाऊँगा और शायद कोई गलत कदम भी उठा लूं या तुझसे हमेशा के लिए नाता तोड़ लूं ...........मैं ये मानता हूँ कि दूसरे के लिए कहना आसान है मगर व्यावहारिकता में लाना उतना ही मुश्किल ..........जब मैं तेरी बात मानकर भी नहीं मानना चाहता तो सोच ये दुनिया कैसे इसे स्वीकार कर सकती है? कहकर विनीत राकेश का मुँह देखने लगा और राकेश एक गहरी सोच में डूब गया और बोला ............परिवर्तन के लिए एक बार तलवार का दंश खुद ही झेलना पड़ता है , गोली अपने सीने पर ही खानी पड़ती है.........अब देख आज समाज ने कितने परिवर्तन स्वीकार कर ही लिए ना जैसे लिव इन रिलेशन हो या गे , धीरे धीरे सब स्वीकार्य कर ही लेता है समाज क्योंकि सब अपने मन के मालिक है और व्यस्क हैं तो कोई किसी पर उस हद तक दबाब बना ही नहीं पाता  ............बेशक कदम क्रांतिकारी है मगर सबके मन को एक बार सोचने पर मजबूर तो करेगा ही आखिर कौन चाहेगा कि आपसी ठंडेपन के कारण उनकी बसी बसाई  गृहस्थी उजड़ जाए .........कई बार कहा भी जाता है ना कि कुछ दिन एक दूसरे से दूर रहो और फिर महसूस करो कि तुम दोनों के जीवन में  एक दूसरे के लिए कितनी अहमियत है बस उसी अहमियत का अहसास बिना दूर जाये भी बना रहेगा अगर रिश्ते को थोड़ी स्पेस देने लगें हम  और अपने विचारों में थोडा खुलापन ला सकें और एक दूसरे को उसके अंदाज़ में जीने की थोड़ी सी स्वतंत्रता देने लगें मगर मर्यादा में रहकर ही तो देखना दुनिया में ज्यादातर घर कभी टूटें ही ना .........उनके घरोंदे हमेशा आबाद रहें .............सिर्फ ज़रा सा सोच में परिवर्तन करने से और देखना एक दिन आएगा विनीत जब दुनिया इस बात को भी स्वीकारेगी और मुझे उस दिन का इंतज़ार है और देखना , जो सकता है इसकी पहल मुझे  ही करनी पड़े .......कहकर राकेश अपने विचारों की दुनिया में खो गया .

राकेश द्वारा दिया विचार क्या समाज स्वीकार कर पायेगा?
क्या रिश्तों को इस रूप में नयी दिशा दी जा सकती है?
क्या आप अपने जीवन साथी की ज़िन्दगी में किसी और का प्रवेश भावनात्मक स्तर पर स्वीकार कर सकते हैं ?
अपनी गृहस्थी बचाए रखने के लिए ऐसे स्वस्थ परिवर्तन को मान्यता दी जानी चाहिए ........जहाँ साथ रहना आसान भी ना हो और अलग भी नहीं होना चाहते हों उस स्थिति में क्या ये परिवर्तन सुखद नहीं होगा?


आप क्या सोचते हैं?

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

मधु हो तुम

मधु हो तुम
और मेरी क्षुधा अनंत
सदियों से अतृप्त 


प्रेम सुधामृत हो तुम
और मेरी तृष्णा अखंड 
सदियों से अपूर्ण

अलोकिक श्रृंगार हो तुम
रूप का अनुपम भंडार हो तुम
और मैं प्रेमी भंवरा
सदियों से रूप पिपासु


पूर्ण  हो तुम
और मेरी यात्रा अपूर्ण
सदियों से भटकता
सदियों तक भटकता
अनंत कोटि मिलन
अनंत कोटि विछोह 
अनंत अपूरित
तृष्णाओं का महाजाल 
ओह! पूर्ण , कहो 
अब कैसे अपूर्ण
पूर्ण  हो ?
कैसे विशालता में
बिंदु समाहित हो?
हे पूर्ण तृप्त
करो मुझे भी 
अब पूर्ण तृप्त !

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

मेरे मन मधुबन में आओ

मेरे मन  मधुबन में आओ-२-
श्याम हम झूला झूलें रे 


प्रेम के हिंडोले पर मुझको बिठाकर
श्याम प्रीत की पींगे बढ़ावो रे
श्याम हम .............................


रास रंग में मुझको रंगाकर
श्याम प्रीत की माँग सजावो रे
श्याम हम.................................

डर डर जाऊं जब मैं वैरागन 
श्याम प्रेम से गले लगावो रे
श्याम हम ........................

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

कर्तव्यपालन की सज़ा

जब जल्दी हो तो सारे काम भी उल्टे होते हैं . कभी हाथ से दूध गिरता है तो कभी बर्तन तो कभी सब्जी . हद हो गयी है आज  तो लगता है अपांटमेंट कैंसल ही करनी पड़ेगी. कितनी मुश्किल से तो एक महीने बाद टाइम मिला था लगता है आज वो भी हाथ  से निकल  जायेगा. चलो कोशिश करती हूँ जल्दी से जाने की .ये सब सोचते हुये मै जल्दी जल्दी काम निबटाने लगी।


फिर जल्दी से काम निपटाकर मैं हॉस्पिटल के लिए निकल गयी मगर रास्ते में ट्रैफ़िक इतना कि लगा आज तो जाना ही बेकार था मगर अब कुछ नहीं हो सकता था क्यूँकि इतना आगे आ चुकी थी कि वापस जा नहीं सकती थी तो सोचा चलो चलते है . एक बार कोशिश करुँगी डॉक्टर को दिखाने की . किसी तरह जब वहाँ पहुची तो देखा बहुत से मरीज बैठे थे तो सांस में सांस आई कि चलो नंबर तो मिल ही जायेगा बेशक आखिर का मिले और आखिर का ही मिला . अब डेढ़ घंटे से पहले तो नंबर आने से रहा इसलिए एक साइड में बैठकर मैगजीन पढने लगी ।


थोड़ी देर बाद यूँ लगा जैसे कोई दो आँखें मुझे घूर रही हैं आँख उठाकर देखा तो सामने एक अर्धविक्षिप्त सी अवस्था में एक औरत बैठी थी और कभी- कभी मुझे देख लेती थी .उसके देखने के ढंग से ही बदन में झुरझुरी -सी आ रही थी  इसलिए उसे देखकर अन्दर ही अन्दर थोडा डर भी गयी मैं. फिर अपने को मैगजीन में वयस्त कर दिया मगर थोड़ी देर में वो औरत अपनी जगह से उठी और मेरे पास आकर बैठ गयी तो मैं सतर्क हो गयी. ना जाने कौन है , क्या मकसद है  , किस इरादे से मेरे पास आकर बैठी है, दिमाग अपनी रफ़्तार से दौड़ने लगा मगर किसी पर जाहिर नहीं होने दिया. मगर मैं सावधान होकर बैठ गयी . तभी वो अचानक बोली और मुझे अपना परिचय दिया और मुझसे मेरे बारे में पूछने लगी क्यूँकि उसे मैं जानती नहीं थी इसलिए सोच- सोच कर ही बातों क जवाब दिए . फिर बातों-बातों में उसने मुझसे अपनी थोड़ी जान -पहचान भी निकाल ली. अब मैं पहले से थोड़ी सहज हो गयी थी.


फिर मैंने उससे पूछा कि उसे क्या हुआ है तो उसके साथ उसकी माँ आई हुई थी वो बोलीं की इसे डिप्रैशन है और ये २-२ गोलियां नींद की खाती है फिर भी इसे नींद नहीं आती और काम पर भी जाना होता है तो स्कूटर भी चलती है . ये सुनकर मैं तो दंग ही रह गयी कि ऐसा इन्सान कैसे अपने आप को संभालता होगा और फिर बातों में जो पता चला उससे तो मेरा दिल ही दहल गया.


उसका नाम नमिता था . एक बेटा और एक बेटी दो उसके बच्चे थे . उसका बेटा कोटा में इंजीनियरिंग के एंट्रेंस की तैयारी कर रहा था और बेटी भी अभी 11वीं में थी . पति का अपना काम था तथा वो खुद किसी विश्वविध्यालय में अध्यापिका थी .पूरा परिवार भी सही पढ़ा -लिखा था फिर मुश्किल क्या थी अभी मैं ये सोच ही रही थी कि नमिता ने कहा ,"रोज़ी (मेरा नाम ) , तुम सोच रही होंगी कि मेरे साथ ऐसा क्या हुआ जो आज मेरी ये हालत है, तो सुनो --------मुश्किल तब शुरू हुई जब मेरे बेटे का ऐडमिशन कोटा में हो गया और मुझे उसके पास जाकर २-३ महीने रहना पड़ता था . उसके खाने पीने का ध्यान रखना पड़ता था . घर पर मेरे पति और बिटिया होते थे और मुझे बेटे के भविष्य के लिए जाना पड़ता था .


एक औरत को  घर- परिवार, बच्चों और नौकरी सब देखना होता है . पति तो सिर्फ अपने काम पर ही लगे रहना जानते हैं मगर मुझ अकेली को सब देखना पड़ता । हर छोटी बडी चिन्तायें सब मेरी जिम्मेदारी होती थीं। कैसे घर और नौकरी के बीच तालमेल स्थापित कर रही थी ये सिर्फ़ मै ही जानती थी मगर फिर भी एक सुकून था कि बच्चों का भविष्य बन जायेगा और इसी बीच मेरे पति के अपनी सेक्रेटरी से सम्बन्ध बन गए . शुरू में तो मुझे पता ही नहीं चला  मगर ऐसी बातें कब तक छुपी रहती हैं किसी तरह ये बात मेरे कान में भी पड़ी तो मैंने अपनी तरफ से हर भरसक प्रयत्न किया . उन्हें समझाने की कोशिश की मगर जब बात खुल गयी तो वो खुले आम बेशर्मी पर उतर आये और उसे घर लाने लगे जिसका मेरी जवान होती बेटी पर भी असर पड़ने लगा . हमारे झगडे बढ़ने लगे. उन्हें कभी प्यार और कभी लड़कर कितना समझाया , बच्चों का हवाला दिया मगर उन पर तो इश्क का भूत सवार हो गया था इसलिए मारपीट तक की नौबत आने लगी . घर में हर वक्त क्लेश रहने लगा तो एक दिन उसके साथ जाकर रहने लगे और इस सदमे ने तो जैसे मेरे को भीतर तक झंझोड़ दिया  और मैं पागलपन की हद तक पहुँच गयी . सबको मारने , पीटने और काटने लगी . घर के हालात अब किसी से छुपे नहीं थे . बदनामी ने घर से बाहर निकलना दूभर कर दिया था बच्चे हर वक्त डरे- सहमे रहने लगे यहाँ तक कि बेटे को कोटा में पता चला तो उसकी पढाई पर भी असर पड़ने लगा .घर, घर ना रह नरक बन गया . जब हालात इतने बिगड़ गए तब मेरे घरवालों ने उन्हें बच्चों का वास्ता दिया , यहाँ तक की जात बिरादरी से भी बाहर करने की धमकी दी तब भी नहीं माने तो उन्हें कोर्ट ले जाने की धमकी दी तब जाकर वो वापस आये और जब मेरी ये हालत देखी तो अपने पर पश्चाताप भी हुआ क्यूँकि मेरी इस हालत के लिए वो ही तो जिम्मेदार थे . सिर्फ क्षणिक जूनून के लिए आज उन्होंने मेरा ये हाल कर दिया था कि मैं किसी को पहचान भी नहीं पाती थी इस ग्लानि ने उन्हें उस लड़की से सारे सम्बन्ध तोड़ने पर मजबूर कर दिया और उन्होंने मुझसे वादा किया कि वो अब उससे कोई सम्बन्ध नहीं रखेंगे .........ऐसा वो कहते हैं मगर मुझे नहीं लगता , मुझे उन पर अब विश्वास नहीं रहा .उनके आने के बाद मेरी माँ और उन्होंने मिलकर मेरी देखभाल की अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखाया और मेरा इलाज कराया तब जाकर आज मैं कुछ सही हुई हूँ या कहो जैसी अब हूँ वो तुम्हारे सामने हूँ .  अब तुम बताओ रोज़ी क्या ऐसे इन्सान पर विश्वास किया जा सकता है ?क्या वो दोबारा मुझे छोड़कर नहीं जायेगा ?क्या फिर उसके कदम नहीं बहकेंगे, इस बात की क्या गारंटी है ?क्या अगर उसकी जगह मैं होती तो भी क्या वो मुझे अपनाता? अब तो मैं उसके साथ एक कमरे में रहना भी पसंद नहीं करती तो सम्बन्ध पहले जैसे कायम होना तो दूर की बात है . मेरा विश्वास चकनाचूर हो चुका है . इसमें बताओ मेरी क्या गलती है? क्या मैं एक अच्छी पत्नी नहीं रही या अच्छी माँ नहीं बन सकी? कौन सा कर्त्तव्य ऐसा है जो मैंने ढंग से नहीं निभाया?क्या बच्चों के प्रति , अपने परिवार के प्रति कर्त्तव्य निभाने की एक औरत को कभी किसी ने इतनी बड़ी सजा दी होगी?कहीं देखा है तुमने? एक कर्तव्यनिष्ठ,सत्चरित्र, सुगढ़ औरत की ऐसी दुर्दशा सिर्फ अपने कर्तव्यपालन के लिए?


उसकी बातें सुनकर मैं सुन्न हो गयी समझ नहीं आया कि उसे क्या कहूं और क्या समझाऊँ ? ऐसे हालात किसी को भी मानसिक रूप से तोड़ने के लिए काफी होते हैं . क्यूँकि मैं कभी मनोविज्ञान की छात्रा रही थी इसलिए अपनी तरफ से उसे काफी कुछ समझाया तो वो थोडा रीलेक्स लगने लगी मगर मैं जब तक घर आई एक प्रश्नचिन्ह बन गयी थी कि  एक औरत क्या सिर्फ औरत के आगे कुछ नहीं है ? पुरुष के लिए औरत क्या जिस्म से आगे कुछ नहीं है वो क्या इतना संवेदनहीन हो सकता है कि हवस के आगे उसे घर- परिवार कुछ दिखाई नहीं देता? क्या हो अगर औरत भी अपनी वासनापूर्ति के लिए ऐसे ही कदम उठाने लगे , वो भी अपनी मर्यादा भंग करने लगे? क्या एक औरत को उतनी जरूरत नहीं होती जितनी कि एक पुरुष को ? फिर कैसे एक पुरुष इतनी जल्दी अपनी सीमाएं तोड़ बैठता है ?मैं इन प्रश्नों के जाल में उलझ कर रह गयी और यही सोचती रही कि रोज़ी ने ये सब कैसे सहन किया होगा जब मैं इतनी व्यथित हो गयी हूँ .


मैं आज भी इन प्रश्नों के हल खोज रही हूँ मगर जवाब नहीं मिल रहा अगर किसी को मिले तो जरूर बताइयेगा.



शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

नैसर्गिक संगीत कभी सुना है

हवा के बहने से
पत्ते के हिलने से
पैदा होता नैसर्गिक
संगीत कभी सुना है
सुनना ज़रा
कल- कल करती
नदी के बहने का
मधुर संगीत
फूल की पंखुड़ी
पर गिरती ओस की
बूँद का अनुपम संगीत
तितली की पंखुड़ी
के हिलने से पैदा होता
मनमोहक संगीत
सुना है कभी
सुनना कभी
कण -कण में व्याप्त
दिव्य संगीत की धुन
बिना आवाज़ का 
बहता प्रकृति का
अनुपम संगीत
 रोम- रोम 
को महका देगा
ह्रदय को 
प्रफुल्लित 
उल्लसित कर देगा
ब्रह्मनाद का आभास
करा जायेगा
तुझे तुझमे व्याप्त
ब्रह्म से मिला जायेगा
अनहद नाद बजा जायेगा

रविवार, 19 दिसंबर 2010

मैं प्रेम दीवानी मीरा बन जाऊँ………………

मैं प्रेम दीवानी मीरा बन जाऊँ
और तुम राधा के दास
एक दूजे की पीर समझ लें
फिर दोनों के प्राण
ओ श्याम तब जानोगे तुम
दिल की लगी की प्यास
मेरे हिय की जलन है ऐसी
जिसमे जल जाएँ दोनों जहान
इक बार तुम भी जलकर देखो
इस जलन में मोहन प्राण आधार
तब जानोगे कैसी होती है
पिया मिलन की प्यास
जल बिन जैसे  मीन प्यासी
तडफत हूँ दिन राति
तुम भी तड़प के देखो प्यारे
फिर जानोगे प्रेम की धार
तुम निर्मोही निःसंग बने हो
कैसे तुमको समझाऊँ
इक बार राधे चरण में आओ
प्रीत की रीत उनसे निभाओ
तुम भी आग पर चलकर देखो
प्रिय मिलन को तरस के देखो
फिर जानोगे कैसी होती
ये ह्रदय की संत्रास
तुम भी प्रेम दीवाने बनकर देखो
राधे के चरण पकड़कर देखो
तब जानोगे मेरे दिल की
कैसे टूटे आस
प्रेम दीवानी वन वन भटकूँ
फिर भी ना पाऊँ ठौर तुम्हारा
एक बार आजाओ गले लगा जाओ
पूरी हो जाए हर आस
मैं प्रेम दीवानी मीरा बन जाऊं
तुम राधा के दास
हिलमिल दिल व्यथा सुनाएं
एक दूजे को हम समझाएं
पूरण हो जाए हर आस
राधे दीवाने तुम बन जाओ
मोहन दीवानी मैं बन जाऊँ
गलबहियां देकर हिलमिल नाचें
इक दूजे में खुद को समा लें
मैं तेरी तुम मेरे बन जाओ
पूरण हो जाये हर आस
श्याम चरण में चित को लगा के
प्रेम रंग में खुद को रंग के
श्याम पिया की छवि बन जाऊँ
श्याम श्याम की रटना लगाऊं
और ना रहे कोई आस जिया में
श्याम की सजनी मैं बन जाऊं
पूरण कर लूं हर आस
प्यारे जू के चरण शरण में
कर दूं तन मन अर्पण
प्रेम प्रेम की रटना लगाऊं
हो जाऊँ प्रेम रस अंग संग
रसो वयी सः मैं बन जाऊँ
पूरण हो जाए हर आस 
मैं प्रेम दीवानी मीरा बन जाऊँ
और तुम राधा के दास

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

शायद अभी भटकन बाकी है ...................

ये दिल के गली कूचे
भर चुके हैं तेरे
प्रेम के गुलाबों से
अब उमड़ते भावों
की गागर 
छलक छलक
जाती है
वेदना की अधिकता
अश्रु सिन्धु में बही
जाती है
कौन हो तुम ?
कहाँ हो तुम?
कैसे हो  तुम?
नहीं जानती
मगर फिर भी
ह्रदय कुञ्ज में
तुम्हारे प्रेम का
बीज रोपित हो चुका है
मेरे अश्रुओं में
बहने वाले
एक अक्स तो
अपना दिखा जाओ
तुम हो कहीं
जानती हूँ
मगर पाने की चाह
अपनी प्रबलता में
सारे बांध तोड़ देती है
मुझमे समाहित तुम
मगर फिर भी
विलगता का अहसास
वेदनाओं के ज्वार में
उफन जाता है
शायद अभी
तड़प अपने
चरम पर नहीं

पहुंची  है
शायद अभी
भटकन बाकी है...................

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

बस गुजर रही है .......... उसके साथ ............. उसके बिन

ना वो मिला 
ना उसे मिलने की 
हसरत हमसे
बस गुजर रही है
उसके साथ
उसके बिन 


वो अपना बनाता भी नहीं 
पास बुलाता भी नहीं
छः अंगुल की दूरी 
मिटाता भी नहीं
बस गुजर रही है
उसके साथ
उसके बिन


वो सपने में आता भी नहीं
ख्वाब दिखाता भी नहीं
बाँसुरिया सुनाता भी नहीं
रास रचाता भी नहीं
मोहिनी मूरत दिखाता भी नहीं
बस गुजर रही है 
उसके साथ
उसके बिन
  
कोई चाहत परवान
चढ़ाता भी नहीं
विरह वेदना 
मिटाता भी नहीं
एक बार दरस 
दिखाता भी नहीं
ह्रदय फटाता भी नहीं
मरना सिखाता भी नहीं
बस गुजर रही है
उसके साथ 
उसके बिन

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

आहों मे असर हो तो……………

आहों मे असर हो तो
खुद दौडे चले आते हैं
फिर बाँह पकड कर के
सीने से लगाते हैं


याद मे जब उनकी
हम नीर बहाते हैं
खुद वो भी तडपते हैं
और हमे भी तडपाते हैं

कभी अपना बनाते हैं
कभी मेरे बन जाते हैं
ये आँख मिचौलियाँ 

श्याम मुझसे निभाते हैं
आहों में असर हो तो
खुद दौड़े आते हैं 

कभी छुप छुप जाते हैं
कभी दरस दिखाते हैं
श्याम झलक को
जब नैना तरसते हैं
वो बन के पपीहा मेरे
मन मे बस जाते हैं

आहों में असर हो तो
खुद दौड़े चले आते हैं 

कभी गोपी बन जाते हैं
कभी रास रचाते हैं
खुद भी नाचते हैं
संग मुझे भी नचाते हैं
ये प्रेम के रसरंग 
श्याम प्रेम से निभाते हैं
आहों मे असर हो तो
खुद दौडे आते हैं

कभी करुणा बरसाते हैं 
और प्रीत बढ़ाते हैं 
ये प्रेम की पींगें श्याम
रुक रुक कर बढ़ाते हैं 
आत्मदीप जलाकर के 
हृदयतम भी मिटाते हैं
आहों में असर हो तो
खुद दौड़े चले आते हैं

रविवार, 21 नवंबर 2010

खामोशी की डगर और उम्मीद की किरण …………………………आखिरी किस्त

प्रेम ने कब प्रेम के बदले प्रेम चाहा है वो तो प्रेमी की ख़ुशी में ही खुश रहता है ..........उसके अधरों की एक मुस्कान के लिए अपना सब कुछ कुर्बान करने के लिए तैयार रहता है .........जब उसका प्रेम इस ऊँचाई पर पहुँच गया तो वो नहीं चाहता था कि उसके प्रेम पर कोई ऊंगली उठाये इसलिए ...................

अब आगे ..............




धीरे -धीरे रोहित ने पूजा से थोड़ी दूरी बनानी  शुरू कर दी बेशक आज भी पूजा ही उसकी प्रेरणा थी मगर फिर भी वो इस तरह रहने लगा जिसमे किसी को आभास ना हो यहाँ तक कि पूजा भी ये ना सोचे बल्कि यही समझे घर गृहस्थी में व्यस्त है वो . शायद समय की यही मांग थी . कुछ प्रेम आधार नहीं चाहते सिर्फ अपने होने में ही संतुष्टि पाते हैं ..........ऐसा ही हाल रोहित के प्रेम का था . अब रोहित ने चाहे अपनी तरफ से दूरियां बढ़ा ली थीं मगर जिस चेहरे को दिन में एक बार देखे बिना उसकी सुबह नहीं होती थी अब कई - कई दिन बीत जाते थे तो ये दंश रोहित को अन्दर ही अन्दर काटने लगा. अपने बनाये मकडजाल में ही रोहित फंसने लगा . अपनी बनाई सीमा को ना तो लांघना चाहता था और ना ही इस पार रह पा रहा था ...........अब वो अन्दर ही अन्दर घुटता था , तड़पता था मगर कभी नहीं चाहता था कि उसकी प्रेरणा पर, उसके पवित्र प्रेम पर कभी कोई लांछन   लगे इसलिए इस पीड़ा को सहन करते - करते कब रोहित अन्दर से खोखला होता गया ,पता ही ना चला ...........उसके जीने की वजह बन चुकी थी पूजा और उसने खुद को ही इस अग्निपरीक्षा में होम किया था ............और जब जंग अपने आप से हो तो इंसान के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल होती है ..........संसार से लड़ा जा सकता है मगर अपने आप से लड़ना और जीतना शायद इंसान के लिए बहुत मुश्किल होता है और यही हाल रोहित का था ..........सिर्फ अन्दर से ही नहीं खोखला हो रहा था रोहित बल्कि अब उसका असर शरीर पर भी दिखने लगा था . धीरे - धीरे रोहित का शरीर थकने लगा . एक उदासी ने उसके मन में डेरा लगा लिया था बेशक आज भी पूजा रुपी प्रेरणा से वो उसी उत्साह और उमंग से लिखता था मगर फिर भी शरीर ने साथ देना छोड़ दिया था ............मन की निराशा का असर शरीर पर गहराने लगा और धीरे- धीरे उसने बिस्तर पकड़ लिया मगर किसी से कुछ नहीं कहा और ना ही महसूस होने दिया . 

सभी डाक्टरों को दिखा लिया , अच्छे से अच्छा इलाज करा  लिया मगर किसी भी इलाज का कोई असर ना होता रोहित पर . और फिर एक दिन पूजा जब उसे देखने आई तो उसका हाल देखकर घबरा गयी. काफी जानने की कोशिश की मगर कुछ ना जान पाई बस सिर्फ रोहित की आँखें ही कुछ बोल रही थीं जिन्हें पूजा समझ तो गयी थी मगर उसके आगे जानकर भी अनजान बनी हुई थी . वो किसी भी प्रकार का कोई बढ़ावा नहीं देना चाहती थी जिससे कोई उम्मीद रोहित के दिल में जगे ...........आखिर समझदार औरत थी .

रोहित ने पूजा से कहा , " मेरे जाने के बाद मेरी एक अमानत मैं आपको देना चाहता हूँ क्योंकि उसकी क़द्र सिर्फ आप ही कर सकती हैं "इतना सुनते ही पूजा तमककर बोली ,"रोहित क्या है ये सब, कैसी बातें कर रहे हो ? कहाँ जा रहे हो और कौन तुम्हें जाने देगा ?अरे मैं तो सोच रही थी तुम अपनी गृहस्थी में बिजी हो मगर वो तो मिसेश शर्मा  से पता चला कि तुम इतने बीमार हो . मुझे तो लगता है बीमारी तो बहाना  है आराम करने का . है ना !" इतना सुनते ही रोहित फीकी सी हँसी हँस दिया . 

तब पूजा बोली ," क्या बात है रोहित , क्या कोई परेशानी है? तुम तो हमेशा से हंसमुख इन्सान रहे हो मगर अब ऐसा क्या हो गया जो तुम्हारी ये हालत हो गयी है . निशा बता रही थी कि तुम्हें कोई रोग भी नहीं है इसका मतलब कोई दिल का रोग है तभी ऐसा होता है ..........क्यूँ सही कह रही हूँ ना . "
ये सुनकर रोहित बोला ," पूजा जी , ऐसी कोई बात नहीं है , आपको वहम हो रहा है . सिर्फ काम का बोझ है बाकी इतना तो ज़िदगी में लगा ही रहता है आप बेकार में चिंता कर रही हैं ."

मगर पूजा कौन सी कम थी आज तो ठान कर आई थी कि रोहित को ठीक करके ही आएगी . एक दम बोली , " तुम मुझे क्या समझते हो ? तुम जो कह दोगे मान लूंगी . पहले तो छोटी- छोटी बात के लिए भी मेरे से पूछने आते थे . माना कि अब तुम सयाने हो गए हो मगर इसका मतलब ये नहीं कि मुझसे ज्यादा अक्ल आ गयी है . अब बताओ , कौन सी ऐसी बात है जिसने तुम्हारा ये हाल बना रखा है . " 

मगर रोहित भी कम ना था , वो बार -बार बात को टालता रहा तब पूजा बोली ,"रोहित देखो मुझे लगता है कि तुम अपने और अपने परिवार के साथ ज्यादती कर रहे हो . आखिर तुम्हारे परिवार का क्या दोष ? उन्हें किस बात की सजा दे रहे हो ? क्या उनकी देखभाल करना तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं ? उनके प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना क्या तुम्हारा दायित्व नहीं और ऐसे अन्दर ही अन्दर घुटकर तो तुम उनके साथ भी अन्याय कर रहे हो . देखो तो ज़रा निशा और बच्चों की तरफ-------क्या हाल हो गया है उनका . देखो तुम बेशक कुछ ना बताना चाहो , मैं तुम पर दबाव नहीं डालूंगी मगर फिर भी तुमसे ये उम्मीद जरूर करुँगी कि आज के बाद तुम्हारा ज़िन्दगी के प्रति दृष्टिकोण बदलेगा. ज़िन्दगी सिर्फ ओसारे  की छाँव ही नहीं है . ना जाने किन- किन मोड़ों से इन्सान को गुजरना पड़ता है. सिर्फ अपने लिए जीना ही जीना नहीं होता , कभी- कभी दूसरों के लिए भी जीना पड़ता है . तुम्हारी जो भी समस्या है उसे अगर तुम नहीं बताना चाहते तो मत बताओ मगर उसे स्वयं पर , अपने व्यक्तित्व पर हावी मत होने दो . मनचाहा हर किसी को नहीं मिलता . बच्चा भी चाँद पकड़ने की ख्वाहिश करता है मगर क्या कभी छू सकता है उसे ? अपनी इच्छाओं को , आकांक्षाओं को इतनी उड़ान मत भरने दो कि जीवन ही बेमानी होने लगे . अगर तुम खुद को बदल सको और मेरे कहे पर ध्यान दे सकोगे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा. ऐसा लगेगा कि तुमने मेरा मान रखा . इतने सालों  के साथ को इज्ज़त दी है . आज तक तुमसे कुछ नहीं चाहा मगर आज चाहती हूँ कि तुम मुझसे ये वादा करो कि तुम अपनी ज़िन्दगी घुट- घुट कर बर्बाद नहीं करोगे बल्कि भरपूर और खुशहाल  ज़िन्दगी जियोगे अगर तुम्हारी नज़र में मेरा ज़रा भी सम्मान है तो . " 

इतना कह कर पूजा तो चुप हो गयी क्योकि वो समझ तो गयी थी कि मानव मन बेहद भावुक होता है और ज़रा सी भी आशा की किरण कहीं दिखाई  देने लगती है तो वहीँ आसरा बनाने लगता है , ख्वाब संजोने लगता है इसलिए सब कुछ समझते हुए भी जान कर भी अनजान बनते हुए पूजा ने बातें इस तरह कीं  कि जिसके बाद रोहित के लिए कुछ कहने को ना बचे और वो यही समझे कि पूजा एक हितैषी की तरह उसे समझा रही है ना कि वो उसके बारे में , उसके दिल के बारे में सब जान गयी है , ये पता चले इसलिए पूजा ने रोहित से ऐसा वादा लिया ताकि इसे पूजा की ख्वाहिश समझे रोहित और यही ख्वाहिश उसके जीवन का संबल बन जाए आखिर उसके लिए तो पूजा की ख्वाहिश ज़िन्दगी की सबसे बड़ी ख्वाहिश थी ना . उसकी प्रेरणा ने आज उससे कुछ माँगा था और वो मना कैसे कर सकता था ---------शायद ये बात पूजा अच्छी तरह से जानती थी क्योंकि यही उम्मीद की एक किरण उसे नज़र आई थी रोहित को जीवन से जोड़ने के लिए ....................
आज बिना इज़हार के भी प्रेम अपनी बुलंदियों पर पहुँच  गया था .

समाप्त

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

खामोशी की डगर और उम्मीद की किरण …………………………भाग 3

इधर रोहित जब से पूजा से मिला उसमे परिवर्तन आना चालू हो गया. अब उसमे पहले से ज्यादा गंभीरता आने लगी .उसके मन में भावों का सागर अँगडाइयाँ लेने लगता मगर कहे किससे ? कौन समझेगा? इसी उहापोह में धीरे धीरे रोहित ने अपने मन की बातें अपनी डायरी  में लिखनी शुरू कर दीं कविताओं के रूप में. ना जाने क्या- क्या लिखता रहता और कई बार पूजा को भी सुनाता तो वो बहुत खुश होती और रोहित को लिखने को प्रेरित करती रहती उसे क्या पता था कि रोहित के मन में क्या चल  रहा है या वो ये सब उसके लिए लिख रहा है . तो वो जैसे सबको वैसे ही रोहित से भी व्यवहार करती ..................

अब आगे --------------



समय अपनी रफ़्तार से गुजरता रहा और इस बीच रोहित की भी गृहस्थी बस गयी और वो दो प्यारे- प्यारे बच्चों की सौगात से लबरेज़ हो चुका था मगर रोहित ने कभी भी अपने ह्रदय के बंद दरवाज़े किसी के आगे नहीं खोले थे . ये तो उसका निजी प्रेम था , अपनी पीड़ा थी , अपनी चाहत थी जो उसे प्रेरित करती थी और उसने पूजा की प्रतिमा को अपने ह्रदय के मंदिर में विराजमान कर लिया था . उससे प्रेरित होकर ही अपने भावों को संगृहीत करता रहता था. 

अपनी गृहस्थी  से, अपनी जिम्मेदारियों से कभी मूँह नहीं मोड़ा . हमेशा हर जगह तत्पर रहता मगर अपने दिल के अन्दर किसी को भी झाँकने की इजाज़त नहीं देता यहाँ तक कि अपनी पत्नी निशा को भी नहीं मगर उसे उसके अधिकार और प्यार दोनों से कभी वंचित भी नहीं किया ........उसे जो प्यार , सम्मान देना चाहिए और जो हर स्त्री की चाह होती है उसमे कभी कोई कमी नहीं आने दी .

रोहित ने प्रेम को , अपनी प्रेरणा को हमेशा जीवंत रखा अपने अहसासों में , अपनी कविताओं में , जहाँ वो अपने प्रेम के साथ एक ज़िन्दगी जी लेता था . एक दिन किसी काम से पूजा उनके घर आई और रोहित के कमरे में ही बैठी थी और जब निशा घर के कामों में लग गयी  तो पूजा मेज पर रखी चीजें देखने लगी और तभी उसके हाथ रोहित की डायरी हाथ लगी और वो उसे पढने लगी. पढ़ते - पढ़ते पूजा ये तक भूल गयी कि कितना वक्त हो गया और वो कब से बैठी है . उस डायरी में यूँ तो कवितायेँ ही थीं . उनसे से कुछ उसने सुनी भी थीं मगर तब कभी ध्यान नहीं दिया क्यूँकि सुनने और पढने में फर्क होता है मगर उस दिन जब वो पढ़ रही थी तो एक बात ने उसका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया कि जितनी भी कवितायें थी उसमे एक चीज़  खास थी ...........वो था एक नाम ---------पूजा . और इस बात ने उसे अन्दर तक हिलाकर रख दिया. जब उसने देखा हर कविता में पूजा शब्द किसी ना किसी बहाने प्रयोग किया गया है तो वो सन्न रह गयी . अब पूजा इतनी नादान तो थी नहीं जो समझ ना पाती  इसका अर्थ. आखिर शादीशुदा औरत थी भरपूर गृहस्थी  की  मलिका और वैसे भी औरत की छठी इन्द्रिय बहुत तेज़ होती है जो उसे पहले ही आगाह कर देती है . ऐसा ही अब हुआ.


पूजा को समझ आने लगा था कि माज़रा कुछ और भी है मगर वो इसे किसी पर ज़ाहिर नहीं होने देना चाहती थी , पहले अपनी तरफ से इत्मिनान करना चाहती थी . अभी वो इन सब ख्यालों में डूबी हुई ही थी कि उसे पता भी ना चला कि कब से रोहित आकर  उसके पीछे खड़ा है . वो तो रोहित ने जब कहा , "पूजा जी , आज आपके कदम इस गरीब की दहलीज  तक कैसे आ गए ? और ये हमारी अमानत पर दिन -दहाड़े डाका कैसे डाल  रही हैं ?" तब पूजा चौंकी और खुद को संयत करते हुए बोली ,"रोहित , तुम क्या समझते हो , तुम्हारी चोरी कोई पकड़ नहीं सकता. पूजा नाम है मेरा , बड़े बड़ों को पानी पिला देती हूँ ."

इतना सुनते ही रोहित का चेहरा सफ़ेद पड़ गया उसने सोचा ना जाने पूजा को क्या पता चल गया , और जब मन में कुछ छुपा हो तब तो ऐसा होना स्वाभाविक है . क्या वाकई पूजा उसके दिल का हाल जान गयी? अभी रोहित ये सोच ही रहा था कि पूजा बोल पड़ी , " अरे रोहित क्या हुआ? चोरी पकडे जाने से डर गए , देखो तो कैसे पसीने छूट रहे हैं ?" मगर जब पूजा को लगा कि कहीं रोहित को शक ना हो जाए एकदम बात पलटकर बोली , "क्यूँ बच्चू , इतनी सारी कवितायेँ लिख लीं और मुझे सुनाई भी नहीं , पहले तो बड़ी जल्दी- जल्दी सुनाते थे मगर अब तो इतने दिन हो गए क्या हुआ?" तब रोहित की सांस में सांस आई . थोड़ी देर हँसी - मजाक करके पूजा तो चली गयी मगर रोहित सोचने लगा कि आज तो बात आई- गयी हो गयी मगर पूजा जितनी होशियार है ये वो जानता था .कहीं वो उसके भीतर के प्रेम के दर्शन ना कर ले इसलिए थोडा संभलकर रहना होगा. उसका प्रेम उसके लिए पूजा थी और अपनी आराधना में वो पूजा का भी खलल नहीं चाहता था ..........उसे प्रेम का प्रतिकार नहीं चाहिए था सिर्फ पूजा का अधिकार ही चाहिए था और वो उसके पास था ही मगर अपने प्रेम को सार्वजानिक नहीं करना चाहता था ............प्रेम ने कब प्रेम के बदले प्रेम चाहा है वो तो प्रेमी की ख़ुशी में ही खुश रहता है ..........उसके अधरों की एक मुस्कान के लिए अपना सब कुछ कुर्बान करने के लिए तैयार रहता है .........जब उसका प्रेम इस ऊँचाई पर पहुँच गया तो वो नहीं चाहता था कि उसके प्रेम पर कोई ऊंगली उठाये इसलिए ...................


क्रमशः ...................

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

खामोशी की डगर और उम्मीद की किरण …………………………भाग 2

बार- बार उसे खींच कर उसी ओर ले जाता था और आँखें खुद को रोक ही नहीं पाती थीं उसे निहारने से ..........ना जाने कैसे वो पूजा के मोहपाश में बंधता जा रहा था............
अब आगे ................



यूँ तो पूजा एक विवाहित महिला थी जिसकी अपनी गृहस्थी थी . पति  , बच्चे , घर परिवार सब था. मगर उसकी हंसमुख और मिलनसार प्रवृत्ति उसे सबके आकर्षण का केंद्र बना देती थी. जो भी मिलता उसका कायल हुये  बिना नहीं रहता. फिर चाहे हमउम्र हो या बड़ा या बच्चा . वो तो सबसे ऐसे बात करती कि किसी को लगता ही नहीं कि उसकी उम्र क्या है या वो उनकी हमउम्र नहीं. सिर्फ थोड़े से समय में ही उसने सारे मोहल्ले के लोगो को अपने स्वभाव से अपना बना लिया था और कोई भी किसी भी समय उसके पास बेझिझक पहुँच जाता था .ऐसे ही एक बार रोहित अपनी माँ के कहने पर किसी काम से पूजा के पास गया . पूजा ने तो उससे उसके बारे में सारी जानकारी ले ली और फिर रोहित से अपने स्वभावानुसार ऐसे बात करने लगी जैसे वो उसकी कितनी पुरानी फ्रेंड हो . शुरू में तो रोहित संकोचवश थोड़ी बहुत बात करके आ गया. मगर बाद में कभी रास्ते में , कभी किसी काम से पूजा से सामना होता ही रहता था और वो उससे ऐसे बात करती कि रोहित को उससे बात करनाअच्छा लगने लगा . पूजा अपने कॉलेज के दिनों की अपनी मस्तियों के किस्से सुनाती और रोहित भी ऐसे सुनता जैसे सब कुछ जानता हो पूजा के बारे में .


रोहित को पूजा की बातें इतना आकर्षित करने लगीं  कि जब तक पूजा से किसी भी बहाने से बात ना हो जाए उसे चैन ही ना पड़ता. उसका तो दिन ही तभी होता जब पूजा की मधुर आवाज़ उसकी हँसी की खनक उसके कानों तक ना  पहुँच जाती. हालांकि  रोहित जानता था की  उसका और पूजा का कोई  मेल नहीं मगर फिर भी वो पूजा के व्यक्तित्व से इतना आकर्षित हो गया कि कोई भी काम होता पूजा से सलाह किये बिना नहीं करता. यहाँ तक कि दोनों के घर वाले भी अब तो हँसी उड़ाने  लगे थे कि कैसे थोड़े दिन में ही पूजा से घुलमिल गया जैसे बरसों से जानता हो मगर सब इस रिश्ते को एक देवर - भाभी के रिश्ते की तरह ही समझते थे.


और इधर रोहित जब से पूजा से मिला उसमे परिवर्तन आना चालू हो गया. अब उसमे पहले से ज्यादा गंभीरता आने लगी .उसके मन में भावों का सागर अँगडाइयाँ लेने लगता मगर कहे किससे ? कौन समझेगा? इसी उहापोह में धीरे धीरे रोहित ने अपने मन की बातें अपनी डायरी  में लिखनी शुरू कर दीं कविताओं के रूप में. ना जाने क्या- क्या लिखता रहता और कई बार पूजा को भी सुनाता तो वो बहुत खुश होती और रोहित को लिखने को प्रेरित करती रहती उसे क्या पता था कि रोहित के मन में क्या चल  रहा है या वो ये सब उसके लिए लिख रहा है . तो वो जैसे सबको वैसे ही रोहित से भी व्यवहार करती ..................


क्रमशः ....................

शनिवार, 13 नवंबर 2010

ख़ामोशी की डगर और उम्मीद की किरण--------भाग १

क्या सबके साथ ही ऐसा होता है ? जब धडकनों के स्पंदन चुगली करने लगते हों , आँखें हर पल बेचैन सी कुछ खोजती हों, लबों पर आकर  हर बात दम तोड़ देती हो और नींद तो जैसे जन्मों की दुश्मनी निकालती हो................दिन के हर पल में सिर्फ एक ही मूरत का दीदार होता हो...........तो क्या कहते हैं इसे.............कैसे ख़त्म होगी ये बेचैनी? मेरे साथ ऐसा क्यूँ हो रहा है ? अब किसी से कहूँगा तो मुझे बीमार समझेंगे या मेरी हँसी उड़ायेंगे ? अब क्या करूँ? ऐसा सोचते -सोचते रोहित बेचैन हो गया . 

जब से वो पूजा से मिला था तब से ही उसका ये हाल था . यूँ तो पूजा को वो पिछले ४-५ महीने से मिल रहा था क्योंकि पूजा उसके घर के पास ही रहने आई थी तो दीदार तो  रोज हो ही जाता था मगर पिछले कुछ समय से उसकी पूजा से बातचीत भी शुरू हो गयी थी और जितना उसने पूजा को जाना उतना ही पूजा का व्यक्तित्व उस पर हावी होता गया. वो खुद को पूजा के आकर्षण में घिरा पा रहा था और जितनी निकलने  की कोशिश करता उतना ही उस चक्रव्यूह में फंसता जा रहा था और अब उसे भी लगने लगा था कि ये सब गलत है मगर दिल था कि मानता ही नहीं था . बार- बार उसे खींच कर उसी ओर ले जाता था और आँखें खुद को रोक ही नहीं पाती थीं उसे निहारने से ..........ना जाने कैसे वो पूजा के मोहपाश में बंधता जा रहा था............

क्रमशः  ...............




बुधवार, 10 नवंबर 2010

कभी दूर होकर भी पास होता है

कभी दूर होकर भी पास होता है
कभी पास होकर भी दूर होता है 
सांवरे ये प्रेम के कैसे भंवर पड़े हैं
जिसमे ना डूबती हूँ ना तरती हूँ
तेरे प्रेम की डोर से ही खींचती हूँ
आस की हर डोर तोड़ चुकी हूँ
तेरा ही गुणगान किया करती हूँ
तेरे दरस को ही तरसती हूँ 
सांवरे तुझ बिन हर पल तड़पती हूँ 
कभी दरस दिखाना कभी छुप जाना 
कभी अपना बनाना कभी बेगाना
तेरी आँख मिचोनी से भटकती हूँ
प्रेम की पीर ना सह पाती हूँ
दिन रात बस राधे राधे रटती हूँ
फिर भी ना तेरी कृपा बरसती है
सांवरे तेरे प्रेम में ऐसे तड़पती हूँ
जैसे सागर में मीन प्यासी 
विरह वेदना ना सह पाती हूँ
तुझसे दूर ना रह पाती हूँ

रविवार, 7 नवंबर 2010

रिश्तों का सौंदर्य

राजू भाग रहा था और गुड्डी उसके पीछे -पीछे उसे पकड़ने के लिए, साथ ही चीखती जा रही थी आज नहीं छोडूंगी तुझे देखती हूँ कब तक भागता है और जैसे ही राजू का पैर अटका तकिये में और वो पलंग पर गिर पड़ा और साथ ही गुड्डी को मौका मिल गया और वो चढ़ गयी उसके ऊपर और लगा दिए ४-५ थप्पड़ दे दनादन तो राजू कौन सा कम था किसी तरह खुद को छुड़ाया और लगा गुड्डी के बाल पकड़ कर झंझोड़ने ..........अब गुड्डी चिल्लाई मम्मी देखो राजू को इसे मना लो नहीं तो मैं इसका सिर फोड़ दूंगी ..........दोनों एक दूसरे से गुत्थम गुत्था हो रहे थे और सुधा ने आकर जैसे ही ये दृश्य देखा अपना सिर पीट लिया ............सुधा चिल्लाई मान जाओ दोनों नहीं तो मैं दोनोको मारूंगी मगर कौन सुने दोनों  में से कोई भी खुद को कम नहीं समझना चाहता था जब सुधा ने देखा कि अब तो एक दूसरे के कहीं ये कोई चोट ना मार दें तो दोनों के १-१ थप्पड़ लगाकर अलग किया साथ ही चेतावनी दे दी कि अब लड़ोगे तो दोनों को घर से ही निकाल दूंगी ..........ये कोई तरीका है घर में रहने का ...........क्या भाई- बहन ऐसे लड़ते हैं तुम तो दोनों ऐसे लड़ रहे हो जैसे टॉम और जैरी लड़ते हैं .तुम दोनों की हर वक्त की लड़ाई से मैं परेशान हो गयी हूँ दोनों में से किसी एक को तो हॉस्टल में डाल दूंगी तब देखती हूँ कैसे लड़ोगे .............ये कहकर सुधा अपने काम में लग गयी.
सुधा परेशान हो जाती थी दोनों की इस तरह की लड़ाइयों  से  .........उसे समझ नहीं आता ये बच्चे अभी से  आपस में इतना लड़ते हैं  और बड़े होकर क्या इनके सम्बन्ध ऐसे बने रहेंगे................वो इसी उलझन में अपने काम करती रही और जब थोड़ी देर बाद उनके कमरे में गयी तो क्या देखती है कि दोनों इकट्ठे खेल रहे हैं मस्ती कर रहे हैं और ये मंज़र देख कर तो कोई कह ही नहीं सकता था कि अभी थोड़ी देर पहले महाभारत मचा हुआ था ............शायद यही भाई- बहन का प्रेम होता है जो पल में तोला तो पल में माशा होता है ...........यही इन रिश्तों का सौंदर्य है जो संबंधों में प्रगाढ़ता का संचार करता है ............आज सुधा अपने बच्चों में ही इस रिश्ते को जीती थी क्योंकि उसके कोई भाई नहीं था ना तो कैसे जान सकती थी कि भाई -बहन का प्रेम कैसा होता है ..........

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

स्मृतियों के पन्नों से .........

कब मिले , कैसे मिले याद नहीं मगर आज भी ऐसा लगता है जैसे युगों से एक दूसरे को जानते हैं ............तुम , तुम्हारी बातें और तुम्हारी नज़र का जादू , सब मिलकर किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी होता था और फिर मैं तो उम्र के उस नाज़ुक दौर से गुजर रही थी जहाँ ऐसा होना स्वाभाविक था.तुम्हारा मुस्कुराना जैसे कहीं किसी उपवन में एक साथ हजारों फूल खिलखिला गए हों और बहार मुस्कुरा रही हो.............ये ज़िन्दगी के हसीन पल कोई कैसे भूल सकता है ............ये तो यादों में लहू की तरह पैबस्त हो जाते हैं .

काश ! ज़िन्दगी इन हसीन वादियों में ही गुजर जाती .कभी वक्त की धूप ना इस पर आती मगर वक्त कब माना है उसे तो आना है और हर फूल को कभी ना कभी तो कुम्हलाना है ............ये वक्त की लकीरें कब तुम्हारे चेहरे पर उतर आई और तुमसे तुम्हारी जिंदादिली और मुस्कुराहट सब चुरा ले गयी ...............और तुम भी दाल रोटी की जुगाड़ में अपने जीवन को होम करते गए ..........हर ख़ुशी की आहुति देते गए और मैं साए की तरह तुम्हारे अस्तित्व पर पड़ते इन सायों की राजदार बनती गयी .

 मैं तुम्हें तुमसे ज्यादा जानती हूँ ..........तुम्हारी आँखों में छुपे खामोश तूफ़ान को महसूसती हूँ और उसे अपने वजूद में समेटना चाहती हूँ मगर तुम उसमे किसी को आने ही नहीं देते .........ये कैसी तुम्हारी ख़ामोशी की दीवार है जिसके पार तुम ना तो खुद देखना चाहते हो और ना मुझे आने की इजाज़त देना चाहते हो ..........जो तुम लफ़्ज़ों में बयां नहीं कर पाते उन सभी अहसासों को मैं जी लेती हूँ ............बस यही चाह है कि तुम एक बार मौन के सागर से बाहर तो निकलो , अपने अहसासों को बांटो तो सही ..........अपनी चाहत को एक बार बताओ तो सही चाहे मुझे पता है सब मगर एक बार तुम्हारे मूँह से सुनना चाहती हूँ शायद इसलिए ताकि तब तुम्हारे अन्दर बैठे तुम बाहर आ सको ..........मौन को शब्द मिल सकें और सफ़र कुछ आसान हो सके .

जब ये शब्द राकेश ने पढ़े तो फूट- फूट कर रो पड़ा और डायरी  के पन्ने में छुपे दर्द को महसूस करने लगा ..............आज सुरभि की डायरी के ये पन्ने उसे अन्दर तक भिगो गए ............कितनी अच्छी तरह सुरभि उसे जानती थी .........हर पल कैसे उसकी सुख दुःख की भागी बनी रही और उसे हर पल जीवन से लड़ते देखती रही ............आज जब उम्र की आखिरी दहलीज पर वो खड़ा था और ज़िन्दगी का हर फ़र्ज़ पूरा कर चुका था तब भी उसे लग रहा था जैसे आज उसने अपना सब कुछ लुटा दिया हो  ...........आज वो फिर सुरभि के साथ उन ही पलों को जीना चाहता था ...........जो वो चाहती थी ...........उस मुस्कराहट को फिर पाना चाहता था जिसकी सुरभि दीवानी थी और कुछ पल का साथ चाहता था सिर्फ सुरभि के लिए , सुरभि के साथ मगर वक्त के क्रूर हाथों ने वो सुख भी छीन लिया था और वो अकेला उसकी यादों और डायरी के पन्नों में कभी खुद को तो कभी सुरभि को ढूँढ रहा था अपनी बूढी , बेबस ,लाचार आँखों से ..........

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

परसों आने का वादा करके ................

परसों आने का 
वादा करके 
मोहे भूल गए
साँवरिया 

बातों का भुलावा 
दे गए मोहन
करके कितनी 
चिरोरियाँ
मोहे भूल गए
साँवरिया 


छवि दिखला के 
अपना बनाकर
भुलावा दे गए
प्रीतम

दिखा के अपनी 
सुरतिया 
मोहे भूल गए
साँवरिया


प्रेम का दीप
जलाकर

विरह वेदना को
बढाकर 

 हाथ छोड़ गए
मोहनिया
मोहे भूल गए
साँवरिया


बरसों बीते
श्याम बिन रीते
ना जानी साँझ
और दुपहरिया
मोहे भूल गए
साँवरिया

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

पिया रूठ गए

सखी री 
पिया रूठ गए 
मो से सांवरिया
रूठ गए
मोहे अकेला
छोड़ गए
विरह अगन का
दावानल जला गए
अब का से करूँ
शिकायत 
का से कहूँ मैं
जिया की बात 
कोऊ ना समझे 
पीर 
सखी री
प्रेम के सुलगते 
सागर की
हर उठती -गिरती 
लहरें 
प्रेम अगन 
बढाती हैं
कैसे बंधे 
अब धीर
सखी री
वो यशोदा 
का लाला 
धोखा दे गया 
भरे जोवन में
योगन बनाय गया
सखी का से कहूं
अब जिया की पीर
चैन मेरा 
ले गया
भरे बाज़ार 
धोखा दे गया
अब कैसे धरूँ 
मैं धीर
सखी री
पिया रूठ गए
मो से सांवरिया 
रूठ गए 

सोमवार, 27 सितंबर 2010

हाँ , अपना शत्रु में आप बन गया हूँ

अपना शत्रु मैं
आप बन गया 
विषय भोगों 
में लिप्त हो
इन्द्रियों का
गुलाम मैं
खुद बन गया
तेरा बनकर भी
तेरा ना बन पाया
और अपना आप
मैं भूल गया
अब भटकता 
फिरता हूँ
मारा - मारा
मगर मिले ना
कोई किनारा
जन्म- जन्म की
मोहनिशा में सोया
अब ना जाग 
पाता हूँ
जाग- जाग कर भी
बार - बार
विषय भोगों के
आकर्षण में
डूब - डूब जाता हूँ
विषयासक्ति से 
ना मुक्त हो पाता हूँ
विषयों की दावाग्नि 
में जला जाता हूँ
मगर छूट 
नहीं पाता हूँ
हाँ , अपना शत्रु में
आप बन  गया हूँ

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

नई सुबह ---------अंतिम भाग

मेरा संपादक हमेशा चाहता था कि मैं दुनिया के सामने आऊं मगर अब कोई इच्छा बाकी नहीं थी इसलिए चाहता था कि अपने लेखन से कुछ ऐसा कर जाऊं ताकि कुछ लोगों का जीवन बदल जाए . 


बस यही मेरी ज़िन्दगी की सारी हकीकत है सर, इतना कहकर माधव चुप हो गया ................


अब आगे ........


अब हर्षमोहन बोले , " चलो , उठो , मेरे साथ चलो. माधव ने पूछा , " कहाँ "? मगर बिना कोई जवाब दिए हर्षमोहन चलते गए और उनके पीछे पीछे माधव को भी जाना पड़ा. 


वो उसे अपने साथ लेकर एक आश्रम में गए और उसे एक कमरे में बैठाकर चले गए. माधव सारे रास्ते पूछता रहा मगर हर्षमोहन खामोश बैठे रहे  सिर्फ इतना बोले ,"आज का दिन तुम कभी नहीं भूलोगे ". 


थोड़ी देर में हर्षमोहन आये और बोले , " माधव , तुम परेशान हो रहे होंगे   कि ये मैं तुम्हें कहाँ ले आया हूँ . देखो ये एक विकलांग बच्चों  का आश्रम है . यहाँ देखो , बच्चों को उनकी विकलांगता का कभी भी अहसास नहीं होने दिया जाता और उन्हें हर तरह से आगे बढ़ने के लिए हर संभव सहायता प्रदान की जाती है . मुझे यहाँ आकर बड़ा सुकून मिलता है . पता है माधव , मैं खुद को भी एक विकलांग महसूस करता हूँ . आज मेरे पास धन- दौलत ,प्रसिद्धि सब kuch है . देखने में हर इन्सान यही कहेगा कि इसे क्या कमी हो सकती है मगर देखो मेरी धन -दौलत सब एक जगह  आकर हार गयी और मैं कुछ ना कर सका . चाहे सारी दुनिया की खुशियाँ भी समेट कर अगर एक पलड़े में रख दी जायें तो भी चेहरे की सिर्फ एक मुस्कान के आगे वो सब फीके हैं. अब बताओ , मुझसे ज्यादा विकलांग कौन होगा जो सब कुछ होते हुए भी अपंगों की ज़िन्दगी जीने को बेबस हो गया हो " . 


माधव को कुछ समझ नहीं आ रहा था . वो तो सिर्फ उनकी सुने जा रहा था और इस असमंजस में था कि इतना सब कुछ होते हुए भी उनके दिल की ऐसी कौन सी फाँस है जिसने उन्हें या कहो उनकी सोच को विकलांग बना रखा है और वो खुद को असहाय  महसूस कर रहे हैं. फिर उसने  पूछा , " ऐसी कौन सी कमी है जो आप अपने को विकलांग महसूस करते हैं ".
तब उन्होंने कहा कि माधव  , आज  अपनी विकलांगता से मिलवाता हूँ और वो उसे एक कमरे में लेकर गए वहाँ माधव ने देखा कि एक लड़की छोटे- छोटे विकलांग बच्चों की बड़ी तन्मयता से सेवा करने में लगी है मगर पीठ होने की वजह से वो उसे देख नहीं पा रहा था  मगर हर्षमोहन ने जैसे ही पुकारा ," बिट्टो देखो तो आज मैं क्या लेकर आया हूँ. तुम्हारी सारी ज़िन्दगी की तपस्या का फल आज मैं अपने साथ लाया हूँ. जो तुम स्वप्न में भी नही सोच सकती थीं आज वो हो गया .बस एक बार ज़रा नज़र तो घुमा कर देखो और फिर माधव से बोले ,"ये लो मिलो मेरी विकलांगता से जिसके प्यार ने मुझे पंगु बना दिया . जिसके चेहरे की एक मुस्कान के लिए मैं पिछले कितने सालों से एक पल में कितनी मौत मर- मर  कर जीता रहा हूँ ".

और जैसे ही लड़की मुड़ी और माधव की तरफ देखा तो  माधव की आँखें फटी की फटी रह गयीं . उसके सामने शैफाली खडी थी और शैफाली  , वो तो जैसे पत्थर की मूरत सी खडी रह गयी. कुछ बोल ही नहीं पाई. ऐसी अप्रत्याशित घटना थी जिसके बारे में उन तीनो में से किसी ने नहीं सोचा  था. तीनो को ही आज संसार की सबसे बड़ी दौलत मिल गयी थी. तीनो को ही उनकी चाहत मिल गयी थी क्योंकि शैफाली ने ज़िन्दगी भर शादी किये बिना विकलांग बच्चों की सेवा करने की ठान ली थी और पिता का घर छोड़कर उसी आश्रम में रहने आ गयी थी और हर्षमोहन के लिए तो ये बात मरने  से भी बदतर थी मगर शैफाली के आगे उनकी एक नहीं चली थी और मजबूरन उन्हें उसकी इच्छा के आगे अपना सिर झुकाना पड़ा था मगर वो ऐसे जी रहे थे जैस किसी ने शरीर से आत्मा निकाल ली हो और आज का दिन तो जैसे तीनो की जिंदगियों में एक नयी सुबह का पैगाम लेकर आया था जिसमे तीनो की ज़िन्दगी में एक नयी उर्जा और रौशनी का संचार कर दिया था . 


समाप्त 

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

नई सुबह -------भाग ८

उसका नाम कृष्णा था. मगर मुझे ये नहीं पता चल पाया कि पागलखाने से भाग जाने के बाद मैं कहाँ रहा ? कैसे दिन गुजरे? किसने देखभाल की? इस बारे में मुझे कुछ पता नहीं चल पाया. 

अब कृष्णा ने कहा ,"अब तुम क्या करोगे भैया "?................

अब आगे ..............


मैंने कहा , "  मुझे तो समझ नहीं आ रहा क्या करूँ , कहाँ जाऊं? मैं आखिर जिंदा ही क्यों हूँ ? अब किसके लिए जियूँ ? कौन है मेरा? मेरा तो सारा संसार ही लुट चुका ". तब कृष्णा ने कहा ," अगर आप बुरा ना मानो तो या तो आप ज़िन्दगी को नए सिरे से शुरू करो या मेरे साथ मेरी झोंपड़ी में रहने चलो". मैंने कहा , " अब किसके लिए नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू करूँ ? अब तो जीने की चाह ही नहीं रही  ". तब कृष्णा मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपनी झोंपड़ी में ले गया .


झोंपड़ी क्या थी सिर्फ इतनी कि दो लोग मुश्किल से पैर फैला सकते थे . एक नया ही अनुभव था मेरे लिए. जैसा जीवन जीने के बारे में कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था आज वो नारकीय जीवन मेरे सामने था मगर मुझे इस सब की कोई परवाह ना थी . जब इन्सान की जीने की चाह ख़त्म हो जाए तो फिर वो किसी भी हाल में रह लेता है . कृष्णा भीख माँग कर गुजारा करता था . जो भी मिलता उसी से अपना और मेरा पेट भरता था . यहाँ तक कि कभी -कभी वो खुद भूखा सो जाता मगर मेरा पेट जरूर भरता . हाँ ,यदि कुछ ना मिलता तो दोनों भूखे पेट ही सो जाते . 


कुछ दिन तक सब यूँ ही चलता रहा और अब मैं भी उसका अभ्यस्त हो चला था तब मुझे बहुत ही आत्मग्लानि होने लगी कि मेरी वजह से वो बेचारा इतना दुखी होता है मगर कभी उफ़ नहीं करता . मैं उसका लगता क्या हूँ........कुछ भी नहीं मगर फिर भी उसके चेहरे पर कभी शिकन नहीं आती . हमेशा हर हाल में मुस्कुराता रहता है. क्या मैं उस पर बोझ बनकर रहूँगा हमेशा ...........जब ये अहसास हुआ तो मुझे लगा कि मुझे भी कोई  काम करना चाहिए  इसलिए मैंने एक दिन उससे कहा कि मुझे भी अपने साथ काम पर लगा दो . घर में खाली बैठा रहता हूँ. उसने काफी मना किया मगर मैं उसके साथ अगले दिन ज़बरदस्ती चला गया मगर मुझसे भीख मांगी ही नहीं गयी क्योंकि ये तो मेरे संस्कारों में ही नहीं था . 


मैंने अगले दिन से दूसरी जगहों पर काम करने की कोशिश की मगर मुझे तो कोई काम आता नहीं था इसलिए लाख कोशिशों के बाद भी मुझे काम नहीं मिला.मजदूरी भी करनी चाही मगर कभी इतनी मेहनत की नहीं थी तो शरीर ने साथ नहीं दिया और बीमार पड़ गया ..........इसका बोझ भी कृष्ण पर ही पड़ा , इससे तो मैं और बेचैन हो गया . एकतो खुद पहले ही उस पर बोझ था ही अब मेरी बीमारी की वजह से वो और परेशान था .मुझे अपने आप से घृणा होने लगी...........क्या है मेरे जीवन का उद्देश्य ...........क्या यही कि दूसरों को दुःख ही देता रहूँ...............अपनी हर मुमकिन कोशिश की मगर कहीं कोई नौकरी भी नहीं मिली क्योंकि हर किसी को कोई ना कोई जमानत चाहिए थी और मेरा तो इस संसार में अपना कहलाने वाला कोई नहीं था इसलिए थक हार कर मैं एक बार फिर उसके साथ जाने लगा . मुझसे भीख तो नहीं मांगी गयी मगर एक कटोरा लेकर खड़ा रहता था . जो भी अपने आप डाल जाता तो ठीक मगर मैं कभी खुद नहीं माँगा करता था.

तभी एकदिन लाल बत्ती पर खडी एक गाडी पर लिखा शेर मैंने पढ़ा तो याद आया कि कभी मैं भी इस फन में माहिर हुआ करता था. तभी एक विचार कौंधा कि क्यों ना अपने उसी हुनर का प्रयोग करूँ और मैंने एक बार फिर से लिखना शुरू कर दिया और भीख से मिले पैसे बचाने लगा ताकि जब पैसे इकठ्ठा हो जाएँ तो अपनी एक किताब छपवाऊं और जितने भी मेरे आस पास के भिखारी दोस्त हैं इनके जीवन में खुशियों का कुछ तो उजाला कर सकूँ . मेरे इस प्रयत्न का जब कृष्णा को पता चला तो वो भी इसमें सहयोग करने लगा और पैसे बचाने लगा . यहाँ तक कि इस चाह में ना जाने कितनी ही रातें वो भूखा सोया होगा.



फिर एक दिन मैं  प्रकाशन के लिए सम्पादक के पास अपनी किताब छपवाने के आशय से गया और अपना लिखा उन्हें पढवाया . वैसे तो ये काम इतना आसान नहीं था मगर मेरा लिखा पहला पृष्ठ पढ़ते ही संपादक मेरे लेखन का कायल हो गया और उसने कम से कम पैसों में मेरी पुस्तक छापने और बिक्री का प्रबंध किया . शायद मेरी नेकनीयती की वजह से भगवान को मुझ पर पहली बार दया आ गयी थी तभी मेरा पहला ही संस्करण इतना लोकप्रिय हुआ कि हाथों हाथ बिक गया और उसके बाद मुझे कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा . बस मैंने इतना किया  कि वहाँ भी मैंने अपना परिचय किसी को नहीं दिया क्योंकि अब कोई लालसा बची ही नहीं थी . अपने लिए जीने की चाह तो कब की मिट चुकी थी बस अब तो उन किताबों की बिक्री से प्राप्त पैसे को मैं पूरा का पूरा सिर्फ अपने भिखारी दोस्तों और आस- पास के दूसरे झुग्गी- झोंपड़ी वासियों पर खर्च कर दिया करता था . यहाँ तक कि उस पैसे का एक भी रुपया अपने ऊपर खर्चा नहीं करता था और सिर्फ भीख के पैसे से ही अपना गुजर -बसर करता था क्योंकि मेरे मन में एक विश्वास घर कर गया था कि ये सब उन सबकी दुआओं और भूखे पेट सोकर बचे पैसे की बदौलत ही संभव हो पाया है और वो पैसा मेरे लिए मेरी पूजा का प्रशाद बन चुका था जिसे मैं सबमे बाँटकर बेहद शांत और खुश महसूस करता था ............जब किसी चेहरे पर ख़ुशी देखता तो मुझे आत्मिक शांति मिलती ..........बस उस पल लगता शायद ईश्वर ने मुझे इन सबकी सेवा के लिए भी बचा कर रखा था ...........जो सुख देने में है वो लेने में कहाँ ...........ये तब जान पाया था और अब इसे ही मैंने अपने जीवन का ध्येय बना लिया था. 

मेरा संपादक हमेशा चाहता था कि मैं दुनिया के सामने आऊं मगर अब कोई इच्छा बाकी नहीं थी इसलिए चाहता था कि अपने लेखन से कुछ ऐसा कर जाऊं ताकि कुछ लोगों का जीवन बदल जाए . 


बस यही मेरी ज़िन्दगी की सारी हकीकत है सर, इतना कहकर माधव चुप हो गया ................


क्रमशः.................अगली किस्त आखिरी है 

 

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

नई सुबह ............भाग ७

और मैं अपने घर की और चीखते -चिल्लाते हुए दौड़ा. मेरे पीछे -पीछे एक भिखारी दोस्त भी भागा मुझे आवाज़ देते हुए -रूक जाओ भैया, रूक जाओ लेकिन मुझे तो होश ही नहीं था. मुझे तो वो ही याद था कि मेरे माँ बाप इस दुनिया में नहीं रहे और मुझे उनका अंतिम संस्कार करना है ................अब आगे ...........


जब मैं अपने घर पहुँचा तो वहाँ तो एक  आलिशान कोठी खडी थी और उसमे कोई और रहता था . मैंने कहा ये मेरा घर है मगर वहाँ मेरी कोई सुनवाई नहीं हुई . आस- पास वालों से बात करने पर पता चला कि मेरे माता- पिता की मृत्यु का गहरा सदमा लगा था मुझे और मैं पागल हो गया था इसलिए मुझे पागलखाने में दाखिल करा दिया गया था . कुछ दिन तो जान- पहचान वाले आते रहे और दोस्त भी, मगर धीरे- धीरे सबने आना बंद कर दिया . ना ही किसी ने घर को देखा और ना ही मुझे . यहाँ तक कि मेरे मकान पर भी असामाजिक तत्वों ने कब्ज़ा कर लिया और फिर उसे ऊँचे दामों पर बेच दिया और जिसने ख़रीदा वो भी वहाँ कोठी बनाकर रहने लगा था . पडोसी तो क्या कर सकते थे .........बदमाशों से सभी डरते हैं इसलिए वो सब भी चुप रहे ..........रिश्तेदार सब सुख के ही साथी होते हैं और जिसका कुछ ना रहा हो उस तरफ कौन ध्यान देता है इसलिए सभी ने किनारा कर लिया . 


पड़ोसियों ने ही बताया कि एक लड़की आया करती थी . उसी से तुम्हारा हाल- चाल मिला करता था मगर पिछले ३-४ साल से उसका भी कोई पता नही क्योकि आखिरी बार जब वो आई थी तो उसी से पता चला था कि एक दिन तुम पागलखाने से भाग गए थे और वो तुम्हें ढूंढती हुई ही आई थी मगर उसके बाद उसका भी कुछ पता नहीं था. 


ये सब सुनकर मुझे ऐसा लगा जैसे भगवान ने सारे जहान के  दुःख मेरे ही हिस्से में लिख दिए है . मैंने अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश की कि किसी तरह शैफाली  का पता चल जाये मगर मुझे उसका पता नहीं मिला . यहाँ तक कि कॉलेज से भी पूछने की कोशिश की तो वहाँ भी किसी ने कोई जानकारी नहीं दी क्यूँकि किसी लड़की के बारे में जानकारी तो वैसे भी मुहैया नहीं कराते जल्दी से .आज अपनी बेवकूफी पर अफ़सोस हो रहा था कि कभी शैफाली के घर क्यूँ नहीं गया , उसका पता क्यूँ नहीं पूछा . फिर भी अपनी तरफ से हर कोशिश के बाद भी मैं हारता ही गया . हर जगह निराशा ही हाथ लगी. 


यहाँ तक कि मुझे अफ़सोस होने लगा कि भगवान तू मुझे होश में ही क्यों लाया ? कम से कम बेहोशी में दुनिया के हर गम से दूर  तो था मगर इस भरी दुनिया में अपना कहने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं था . यार- दोस्तों का भी नहीं पता कौन कहाँ चला गया था और वैसे भी उनसे क्या उम्मीद जिन्होंने मुझे किस्मत के भरोसे छोड़ दिया हो. अब तो मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं जिंदा ही क्यूँ हूँ? 

मगर इतना सब कुछ होते हुए  भी मेरे साथ जो मेरा भिखारी दोस्त था वो मेरे साथ साये की तरह था और हर बार मेरा होंसला बढ़ा रहा था .अब मैंने उससे पूछा ,"मैं तुम्हें कैसे मिला "? तब उसने बताया कि जब उन लोगों के झगडे में तुम्हें चोट लगी थी तो सब तुम्हें तड़पता हुआ छोड़ कर चले गए थे और तुम बेतहाशा कराह रहे थे तब मैंने ही तुम्हारी देखभाल की थी और उसी पल से मैं तुम्हारे साथ हूँ. उसका नाम कृष्णा था. मगर मुझे ये नहीं पता चल पाया कि पागलखाने से भाग जाने के बाद मैं कहाँ रहा ? कैसे दिन गुजरे? किसने देखभाल की? इस बारे में मुझे कुछ पता नहीं चल पाया. 


अब कृष्णा ने कहा ,"अब तुम क्या करोगे भैया "?................


क्रमशः ..................