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शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

ओह प्यारे! यूँ मन को मोहना कोई तुमसे सीखे





ओह प्यारे! यूँ मन को मोहना कोई तुमसे सीखे

ये मनमोहक छवि तुम्हारी
देख - देख मैं तो दिल हारी

सांवरिया ! ये मधुर मुस्कान तुम्हारी
जैसे हो कोई तीखी कटारी

कितने सहज, सरल ,
सलोने रूप हैं तिहारे 
इस मधुर रूप रस का पान
करते नैन हमारे 

निश्छल , निर्मल रूप धारे 
कैसे बैठे हो मधुबन में प्यारे 

इस लजीली , रसीली 
बाँकी छवि पर तिहारी
मैं तो खुद को वारूँ प्यारे 

ओ नटखट चितचोर हमारे
कैसे सुन्दर रूप तुम्हारे  
हम तो अपना सब कुछ हारे ………

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

भ्रम और सत्य के बीच स्थित तुम



भ्रम और सत्य के बीच स्थित तुम
कभी भ्रम बन टिमटिमाते हो
कभी सत्य बन अटल बन जाते हो
मोहन! अठखेलियों के लिये 
इन पहेलियों को सुलझाने के लिये
और अपनी दिव्यता बताने के लिये
शायद ………तुमने
मुझे माध्यम बनाया है
वरना हूँ तो जीव ही ना
उलझ सकती हूँ 
कभी भी, कहीं भी
तुम्हारी गूढ पहेलियों में……
तुम्हारा घडी- घडी में 
अपनी छटायें बदलना
कभी प्रेम का जीवन्त रूप धर
अश्रु रूप में निरन्तर बहना
और दूसरे ही पल 
अपने होने के प्रति 
भ्रम पैदा करना 
ओह ! मोहन! 
ये कैसी पहेलियाँ हैं तुम्हारी
जितनी सुलझाओ उतनी उलझाते हो
और कभी एक पल में
सारी हकीकत दृश्यमान कर देते हो
मोहन ! अजब तुम्हारी माया है
अजब तुम्हारा रूप है
जिसमें जीव डूबता- उतराता रहता है
पर पार नहीं पाता
जब ॠषि, मुनि, योगी , ध्यानी
तुम्हारा पार नहीं पाते
समाधि में भी ना तुम नज़र आते
 क्योंकि
कहीं तो नेक सी छाछ के लिये
गोपियों के आगे नृत्य करते हो
तो कहीं शिव को भी मोहिनी बन
अपने रूप के जाल में उलझाते हो
कहीं समस्त ब्रह्मांड के रचयिता बन
भृकुटि को टेढा करने पर ही 
उथल - पु्थल मचाते हो
कहीं मैया से डरकर तुम 
काल के भी जो महाकाल हो
यूँ दौडे जाते हो जैसे 
तुम से ज्यादा भयभीत 
सारे संसार में कोई नहीं
अजब खेल रचते हो मोहन
और यही खेल हमारे साथ करते हो
पल - पल मे चित्त की वृत्तियों में
तुम्हारे होने और ना होने के 
अस्तित्व का भास होना और क्या है
तुम्हारी ही तो लीला है
वरना जीव की क्या सामर्थ्य जो
भ्रम मे डूब जाये तो बाहर आ जाये
या सत्य को पा ले और उसके बाद भ्रमित हो जाये
ये तुम्हारे होने और ना होने के बीच की स्थिति में झूलता जीव
उसका चित्त, उसकी बुद्धि और उसके अहंकार के 
तुम ही संरक्षक हो , 
तुम ही पोषित करने वाले हो
और तुम ही निवारण करने वाले हो
फिर मध्यावस्था में क्यों अलोप होने का 
विचलित करने का 
व्यथित करने का
और जीव को भ्रमित करने का नाटक करते हो ………
हे नटवर !
माना तुम सबसे बडे जादूगर हो
फिर भी देखो मोहन 
कहीं ऐसा ना करना 
किसी भ्रमजाल में उलझा दो
और जीव को फिर चौरासी का फ़ेरा लगवा दो
बहुत मुश्किल से , तुम्हारी कृपा से
इस जीव को सही रास्ता मिला है
और इसने अपना सब कुछ तुम्हें मान लिया है
इसलिये अपना हर कर्म 
चाहे मन से हो, बुद्धि से या वचन से हो
वो चाहे किया जा चुका कर्म हो
या आगे होने वाला कर्म हो
सब तुम्हें ही समर्पित कर दिया है
अब इसके आगे तुम्हारा काम है 
क्योंकि
जीव ने तो अबोध बालक का रूप धर लिया है अब
जिसे ना अपने अच्छे का पता ना बुरे का
सो मोहना ……… सुना है 
तुम ही कहते हो
जो मुझे इस तरह समर्पित होता है
उसका योगक्षेम मैं खुद वहन करता हूँ
इस पर विश्वास तो होता है
मगर जब तुम्हारे कुछ भक्तों का
हश्र बुरा देखती  हूँ तो डर लगता है
जब तुम अपने परम भक्तों को नहीं बख्शते
नारद हों या शिव या गोपियाँ या मैया
उनकी परीक्षा ले लेते हो 
तो फिर मेरी क्या बिसात 
इसलिये गिरधारी कभी कभी
एक डर रूप में भी तुम अवतरित होते हो 
कहीं हाथ ना छुडा लो
गर तुमने ठुकरा दिया 
फिर कहीं की ना रहेगी ये जोगन तुम्हारी 
माधव ! अब राखो लाज हमारी
कभी - कभी लगता है 
किसी को ज्यादा जानना भी दुष्कर होता है

शनिवार, 26 जनवरी 2013

योगक्षेम वहाम्यहम तुमने ही तो कहा ना ………



जब आत्मज्ञान मिल जाये
उसमे और खुद में ना
कोई भेद नज़र आये 
बस तब साक्षी भाव से 
दृष्टा बन जाओ 
और देखो उसकी लीला 
हाथ पकडता है या छोडता 
पार उतारता है या डुबोता 
कर दिया अब सर्वस्व समर्पण 
फिर कैसा डर ……… 
योगक्षेम वहाम्यहम तुमने ही तो कहा ना ………
तो अब तुम जानो और तुम्हारा काम 
ना मेरी जीत इसमे ना हार
जो है प्रभु तुम्हारा ही तो है
जीव हूँ तो क्या 
घाटे का सौदा कैसे कर सकता हूँ 
आखिर तुम्हारा ही तो अंश हूँ 


अब देखें क्या होता है 

वो कौन सी नयी लीला रचता है

घट - घट वासी 

कब घट को समाहित करता है 

जहाँ ना घट हो ना तट हो
 
बस एक आनन्द का स्वर हो



बस उसी का इंतज़ार है 


जहाँ दूरियाँ मिट जायें 

इक दूजे मे समा जायें 

भेद दृष्टि समता मे बदल जाये 

वो वो ना रहे 

मै मै ना रहूँ 

कोई आकार ना हो 

बस एक ब्रह्माकार हो 

आनन्दनाद हो

सब अन्तस का विलास हो

जब शब्द निशब्द जो जाये 


अखंड समाधि लग जाये 

आनन्द ही आनन्द समा जाये 

ज्योति ज्योतिपुंज मे समा जाये 

बस वो तेजोमय रूप बन जाये 

ये धारा ऐसी मुड जाये 

जो खुद राधा बन जाये 

तो कैसे न कृष्ण मिल जाये 

वो भी उतना खोजता है 

जितना जीव भटकता है 

वो भी उतना तरसता है 

ब्रह्म भी जीव मिलन को तडपता है

जब आह चरम को छू जाये 

वो भी मिलन को व्याकुल हो जाये 

तो कैसे धीरज धर पाये 

खुद दौडा दौडा चला आये

यूँ  मिलन को पूर्णत्व मिल जाये ………




देखें क्या होता है ? कब वो भी मिलन को तरसता है कब हमारे भाव उसे

 विचलित करते हैं………बस उस क्षण का इंतज़ार है।



रविवार, 20 जनवरी 2013

ये तो था परदे के सामने का सच ……………


दिशाहीन सडकें , दिशाहीन राहें और चलना उम्रभर का । एक सी दिनचर्या ………वो ही खाना , पीना और सोना …………कुछ नही हो करने को ………ऐसे मे माध्यम बना सोशल मीडिया । चल पडी वो उस डगर पर खुद को अभिव्यक्त करने ………शुरुआत लडखडाते कदमों से , संभल - संभल कर जैसे कोई बच्चा पहली बार खडे होकर आगे कदम रखने की कोशिश करता हो …………बार- बार गिरना, ठोकर खाना और संभलना बिल्कुल ज़िन्दगी की तरह …………और एक दिन दौडने लगी ………छपास के रोग से पीडित हो गयी ………आये दिन छपने लगी, सराही जाने लगी क्योंकि सोच तो समय से परे थी , क्योंकि ठाठें मार रहा था एक सागर उसके सीने में अभिव्यक्त होने को, क्योंकि सच कहती थी चाहे कडवा होता था, क्योंकि खुद उस पीडा से गुजरती थी , खौलती थी , खदकती थी तब कहीं दे पाती थी शक्ल किताब को , तब कहीं जाकर फ़ूँक पाती थी प्राण निर्जीव शब्दों में और यही उसके लेखन की सबसे बडी उपलब्धि थी जिसके कारण एक छोटी पहचान बना पायी थी  मगर फिर भी कुछ कमी सी थी जो अन्दर ही अन्दर खा रही थी वजूद को घुन की तरह …………शायद सोशल मीडिया माध्यम हो सकता है मगर मंज़िल नही ये समझ आ गया था और यहाँ भी तो जीवन एकतरफ़ा सा ही हो गया था उस मछली की तरह जिसे ज़ार मे डालो तो लगता है यही समुन्द्र है और बडे होने पर तालाब में डालो तो उसे लगता है यही सागर है मगर कुछ और बडा होने पर नदी मे डालो तो फिर उसी को सागर समझ बैठती है तब तक जब तक सागर मे नही उतरती है ………मगर वहाँ तक पहुँचने से पहले जरूरत है उसे उसके काबिल बनने की और यही वो घुन है जो उसकी छोटी- छोटी उपलब्धियों मे घुन बनकर बैठ गया है…………संतुष्ट नहीं है ………नहीं चाहियें उसे सिर्फ़ अपने सिर के ऊपर वाला आकाश, नही चाहिये उसे सिर्फ़ अपने घर के ऊपर वाला आकाश जो सीमित है उसकी निगाह की दूरी तक ………उसे तो चाहिए सारा आकाश जो असीमित है, अपरिमित है ………पह्चान की सीमा तक, उपलब्धि के आकाश तक ……


तब तक विद्रोह जारी है मेरे आकाश में …………मुझसे मेरा विद्रोह …………क्या पायेगा मुकाम………प्रश्नचिन्ह बन खडा है सम्मुख …………और मैं निरुत्तर हूँ …………भाग रही हूँ खुद से………और उपलब्धियों के आकाश का जगमगाता सितारा मैं नहीं ……मैं नहीं ………मैं नहीं ……

सोचते सोचते शुभ्रा हताशा के गहन अन्धकार मे डूब गयी………विलीन हो गयी सागर मे बूँद सी ………हमेशा हमेशा के लिये।

ये तो था परदे के सामने का सच ……………

मगर परदे के पीछे के सच को जानने के लिये खुद को बेपर्दा करना पडता है इसलिये वो नहीं कर पायी समझौता खुद से, आज की होड भरी दुनिया से, आज के दोगले चेहरों से, साहित्य के घटा जोड से, विवादों के दामन से, साहित्य के नाम पर फ़ैली दु्श्चरित्रता से, पैसे और पहुँच के दम पर सम्मान पाने के गुणा भाग से , खुद को प्रसिद्धि तक पहुँचाने के लिये अपनाये जाने वाले हथकंडों से फिर चाहे उसके लिये खुद की ही छीछालेदार क्योँ ना करवानी पडे या दूसरों एक चरित्र के बखिये ही क्यों ना उधेडने पडें या कुछ विवादास्पद ही क्यों ना लिखना पडे उन सी ग्रेड हीरोइनों की तरह जो जिस्म के बल पर पहचान बनाती हैं कुछ उसी तरह का लिखना नहीं लिख पायी , नही कर पायी समझौते उस आदिम सोच से जहाँ स्त्री होकर इतना कडवा सच उसने कैसे लिख दिया इसे उसे साबित करना पडे वो भी इस पुरुष सत्तात्मक साहित्यिक समाज में जिस पर सिर्फ़ उसका एकाधिकार है , कैसे उसकी कलम चल गयी बोल्ड विषयों पर और खोल दिये उसने सारे भेद जो बेशक पहले भी कहे गये हैं मगर हमेशा एक पुरुष द्वारा ही फिर चाहे कामसूत्र हो या उर्वशी या मेघदूत आखिर उसकी हिम्मत कैसे हुयी बोल्ड विषय पर लिखने की ……नहीं उतर पायी वस्त्रहीनता की आखिरी हद तक , नहीं अपना पायी ऐसे हथकंडे प्रसिद्धि के जंगल के ………क्योंकि
नही चुरा सकती थी वो सत्य से आँख
यदि चुरा लेती तो उम्र भर
नहीं मिला सकती थी खुद से आँख़

और इस तरह परदे के पीछे के भयावह सच के कारण एक उभरता सितारा हमेशा के लिये लुप्त हो गया और दे गया सूरज अपना ये आखिरी पैगाम अस्त होने से पहले ……

क्या किया ज़िन्दगी में
कुछ भी तो नहीं
क्या पाया ज़िन्दगी में
कुछ भी तो नहीं
क्या रही ज़िन्दगी की उपलब्धि
कुछ भी तो नहीं

ज़िन्दगी को जिया
बिना लक्ष्य
जो भी मिला
सब अनचाहा
खुद की चाहत क्या
पता नहीं या मिलती नहीं

अजीब उहापोह में भटकती है ज़िन्दगी
सिर्फ खाना , पीना और सोना
उससे इतर भी कुछ है
जिसकी हसरत में भटकती है ज़िन्दगी
मगर क्या ............यही नहीं जान पाते

अपनी पहचान क्या
कुछ भी तो नहीं
एक अदद पहचान के लिए
जूझती है ज़िन्दगी
मगर हर किसी को न मिलती है ज़िन्दगी

तलाश में हूँ ...............
भटकाव जारी है ..............
जाने किस पैमाने में जाकर छलकेगी ज़िन्दगी
तब तक
हाशिये पर खड़ी है ज़िन्दगी

पहचाने पाने को आतुर उपलब्धिहीन वजूद चिने हैं वक्त की सीमेंटिड दीवारों में …………

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम



मैं राख का अंतिम श्वास बन जाती .......जो तुम होते
मैं मुखाग्नि का अंतिम कर्म बन जाती .......जो तुम होते
मैं कच्चे घड़े संग चेनाब पार कर जाती .......जो तुम होते
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


जो तुम होते ........एक श्वास धरोहर बन जाती
जो तुम होते ........एक कर्म की मुक्ति हो जाती
जो तुम होते ........एक मोहब्बत परवान चढ़ जाती
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम


हो सकता ऐसा मुमकिन .........गर हम होते
ऋतु बसंत  भी मदमाती .........गर हम होते
एक दीपशिखा जल जाती ........गर हम होते
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


अश्रुबिंदु ना कभी ढलकाते ...........जो प्रियतम होते
विरह अगन ना कभी सताती ........जो प्रियतम होते
इश्क की ना दास्ताँ बन पाती ........जो प्रियतम होते
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


ना तुम होते ना हम होते ........ये सृष्टि किस पर मदमाती
ना तुम होते ना हम होते .......ये प्यास अधूरी रह जाती
ना तुम होते ना हम होते .......तो प्रेम में अपूर्णता रह जाती
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


अच्छा हुआ जो ना मिले कभी .........खोजत्व पूर्ण हो जाता
अच्छा हुआ जो ना मिले कभी .........निजत्व पूर्ण हो जाता
अच्छा हुआ जो ना मिले कभी .........शिवत्व पूर्ण हो जाता
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम


अधूरी प्यास, अधूरा तर्पण , अधूरा जीवन .........जरूरी था
जीवन की इकाइयों दहाइयों में अधूरापन ..........जरूरी था
प्रेम का अपूर्ण ज्ञान , अपूर्ण आधार .............जरूरी था
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


अपूर्णता में सम्पूर्णता का आधार ही तो 

व्याकुलता को पोषित करता है .......सत्य था , है , रहेगा
जन्म जन्म की प्यास का अधूरापन ही तो 

घूँट भरने को लालायित करता है .......सत्य था , है , रहेगा
मिलन पर विरह का स्वाद ही तो 

ह्रदय रुपी जिह्वा को आनंदित करता है...........सत्य था , है , रहेगा
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

हाय! कैसी है ये प्रेम के बाजूबंद की अठखेलियाँ…………


धडकनों के मौन आकाश पर
गुंजित तुम्हारा प्रेमराग
स्पन्दित कर नव चेतना भर गया
और शब्द झंकृत हो गये
भाव निर्झर बह गये
हाय! कैसी है ये प्रेम के बाजूबंद की अठखेलियाँ……………मोहन !

प्रीत की पौढी पर
अंकित तुम्हारे पाद पद्म
ह्रदयांगन अवलोकित कर गये
और तरंगें प्रवाहित हो गयीं
प्रीत अमरबेल सी सिरे चढ गयी
हाय! कैसी हैं ये मन मधुप की चिरौरियाँ ……………मोहन !


तुम्हारे प्रेम मे
नील वसना धरा बन
श्यामल चादर ओढ गयी
और देखो तो ज़रा अब
मैं भी श्यामल हो गयी
श्याम मन
श्याम तन
श्याम रंग
श्याम नयन
श्याम वसन
सुबह शाम सब श्याममय हो गये
हाय! कैसी हैं ये श्याम की श्यामल छवियाँ …………मोहन !

सोमवार, 7 जनवरी 2013

मेरी अँखियाँ हैं नीर भरी



मेरी अँखियाँ हैं नीर भरी
बिहारी जी अब क्या और अर्पण करूँ
मेरी अँखियाँ ......................

सुना है तुम हो दया के सागर
फिर क्यों रीती मेरी गागर
मेरी तो आस है तुम्ही से बंधी
बिहारी जी अब क्या और अर्पण करूँ
मेरी अँखियाँ .......................

दरस को अँखियाँ तरस गयी हैं
बिन बदरा के बरस रही हैं
और कैसे मैं तुम्हें प्रसन्न करूँ
बिहारी जी अब क्या और अर्पण करूँ
मेरी अँखियाँ.....................

सुना है तुम हो श्याम सलोना
मेरे मन में क्यूँ ना बनाया घरौंदा
अब कैसे मैं धीर धरूँ
बिहारी जी अब क्या और अर्पण करूँ
मेरी अँखियाँ ....................

जन्म जन्म की मैं हूँ प्यासी
तेरे चरनन की मैं हूँ दासी
मेरी बारी ही क्यों देर करी
बिहारी जी अब क्या और अर्पण करूँ
मेरी अँखियाँ हैं नीर भरी.............

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

है ना अचरज ...........



मेरे पास
कुरान की आयतें नहीं
जो बांच सकूँ
गीता का ज्ञान नहीं
जो बाँट सकूँ
शबरी के बेर नहीं
जो खिला सकूँ
मीरा का प्रेम नहीं
जो रिझा सकूँ
राधा सा समर्पण नहीं
जो अपना बना सकूँ
फिर भी तुम अपना बना लेते हो
है ना अचरज ...........मोहन !

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

सिर्फ़ एक झलक दिखा जाओ


सुना है कान्हा
निधि वन मे रास रचाते हैं
गोपियों को नाच नचाते हैं
मै गोपी बन कर आ गयी
मुझे मिले ना श्याम मुरारी
मेरी चुनर रह गयी कोरी
श्याम ने खेली ना प्रीत की होरी
ललिता से प्रीत बढाते हैं
राधा संग पींग बढाते हैं
हर गोपी के मन को भाते हैं
पर मुझसे मूँह चुराते हैं
और मुझे ही इतना तडपाते हैं
ये कैसा रास रचाते हैं
जिसमे मुझे ना गोपी बनाते हैं
मेरी प्रीत परीक्षा लेते है
पर अपनी नही बनाते हैं
और मधुर मधुर मुस्काते हैं
अधरों पर बांसुरी लगाते हैं
मुझे ना बांसुरी बनाते हैं
सखि री
वो कैसा रास रचाते हैं
मुझे मुझसे छीने जाते हैं
पर दूरी भी बनाते हैं
पल पल मुझे तडपाते हैं
उर की पीडा को बढाते हैं
पर पीर समझ ना पाते हैं
हाय्………श्याम क्यों मुझसे ही रार मचाते हैं
बृज गोपिन की धूल भी
न मुझे बनाते हैं
लता पता ही बना देते
कुछ यूं ही अपना मुझे बना लेते
मेरी चूनर मे अपनी
प्रीत का दाग लगा देते
मै भी मतवारी हो जाती
चरण कमल मे खो जाती
उनकी दीवानी हो जाती
इक मीरा और  बना देते
मुझे श्याम रंग मे समा लेते
तो उनका क्या घट जाना था
मान ही तो बढ जाना था
और मुझे किनारा मिल जाना था
अब कश्ती भंवर मे डोल रही है
मनमोहन को खोज रही है
आ जाओ हाथ पकड लो सांवरिया
मै तो हो गयी तेरी बावरिया
मुझे अपनी जोगन बना जाओ
प्रीत मे अपनी भिगा जाओ
एक झलक दिखा जाओ
सिर्फ़ एक झलक दिखा जाओ
हर आस को पूरण कर जाओ
प्रेम परिपूरण कर जाओ
प्रीत को परवान चढा जाओ
श्याम बस इक बार झलक दिखा जाओ……………।

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

" नदी हूँ फिर भी प्यासी "

 
ए .....ले चलो 
मुझे मधुशाला  
देखो
कितनी प्यासी है मेरी रूह
युग युगांतर से
पपडाए चेहरे की दरारें
अपनी कहानी आप कर रही हैं
कहीं तुमने अपनी आँखों पर
भौतिकता का चश्मा
तो नहीं लगा लिया
जो आज तक तुम्हें
मेरी रूह की सिसकती
लाश का करुण  क्रंदन
न सुनाई दिया 
और मैं
युगों युगों से
जन्म जन्म से
अपनी रेत के
तपते रेगिस्तान में 
मीन सी तड़प रही हूँ
प्यास पानी की होती
तो शायद
रेगिस्तान में भी
कोई चश्मा ढूंढ ही लेती
मगर तुम जानते हो
मेरी प्यास
उसका रूप उसका रंग
निराकार होते हुए भी
साकार हो जाती है
और सिर्फ यही इल्तिजा करती है
ए .........एक बार सिर्फ एक बार
प्रीत की मुरली बजाते
मेरी हसरतों को परवान चढाते 
इस राधा की प्यास बुझा जाओ
हाँ ..........प्रियतम
एक बार तो दरस दिखा जाओ
बस .............और कुछ नहीं
कुछ नहीं चाहिए उसके बाद 
तुम जानते हो अपनी इस नदी की प्यास को
फिर चाहे कायनात का आखिरी लम्हा ही क्यों न हो
बस तुम सामने हो ..........और सांस थम जाए 
इससे ज्यादा जीने की चाह नहीं ...........
ए ...........एक बार जवाब दो ना
क्या होगी मेरी ये हसरत पूरी ........... रेगिस्तान की इस रेतीली नदी की

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

इकतरफ़ा प्रेम के स्वामी


इकतरफ़ा प्रेम के स्वामी
करते हो अपनी मनमानी
राधे को आधार बनाया
यूँ अपना पिंड छुडाया
सभी गोपियन को भरमाया
कैसा तुमने जाल बिछाया

सही कहा ………इकतरफ़ा प्रेम के स्वामी

क्या नही हो मोहन?
तुमने तो प्रेम करना जाना ही नहीं
बस सब तुम्हें चाहें
और तुम ना किसी को चाहो
उस पर तुर्रा ये कि
सिर्फ़ मुझे चाहो
बाकी सारी दुनिया छोड दो
वाह रे गुरुघंटाल
खूब धमाचौकडी तुमने मचायी है
पहले खुद संसार रचाया
उसमें इंसान बनाया
उसे कर्म का पाठ पढाया
भाईचारे की शिक्षा दी
और जब उसने वो मार्ग अपनाया
तब तुमने अपना रंग दिखलाया
मुझे चाहना है तो सबको छोड दो
वाह ……क्या कहने तुम्हारे
और तब भी तुम मिलो ना मिलो
ये भी तुम्हारी मर्ज़ी
तुम दरस दो ना दो
ये भी तुम्हारी मर्ज़ी
जब सब तुम्हारी ही मर्ज़ी से होना है
तो क्यों इंसान पर दोष लगाते हो
वो तो तुम्हारी तरफ़ आता है
फिर उसे पुआ हाथ मे ले
बार - बार दिखाते हो
जो जब तुम्हारी तरफ़ आता है
तो संसार मे फ़ंसाते हो
उसके प्रलोभन दिखाते हो
और जब तुमसे दूर जाता है
तो अपनी तरफ़ बुलाते हो
अजब ढंग तुमने अपनाये हैं
मोहन ये कैसे खेल रचाये हैं
बस तुम्हें तो खेल खेलना है
खिलौना हमें बनाये हो
तभी तो इकतरफ़ा प्रेम में फ़ंसाये हो
मगर खुद नहीं फ़ँसते हो …………जादूगर !
बस यही तुम्हारा तिलिस्म है
यही तुम्हारा जादू है
सब भ्रमित रहते हैं
तुम्हारे मोहजाल मे फ़ंसते हैं
और तुम्…………नटवर !
नट की तरह करतब दिखाते हो
और प्रेमी को
इकतरफ़ा प्रेम की सूली पर चढाते हो
यहाँ तक कि
राधा को भी भरमाते हो
तुम्हें सर्वस्व बनाया राधे
जो तुम्हें पूजेगा वो ही मुझे पायेगा
आहा! क्या भ्रमजाल फ़ैलाया
सबको एक ही जाल मे उलझाया
और खुद सारी डोरियाँ हाथ में पकडे
सारथि बने प्रेम के घोडों को
ऐंड लगाते कैसे मुस्काते हो
मोहन ! ये चित्ताकर्षक मुस्कान बिखेरे
तुम खेल तो खूब रचाते हो
मगर देखो ……
पकडे भी जाते हो ……पकडे भी जाते हो ……है ना :)

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

मैं शून्यकाल का अगीत …………



मैं शून्यकाल का अगीत
तुम हो मोहन मेरे मीत


नृत्य करूँ या झांझर बजाऊँ
कहो तो मोहन कैसे रिझाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


बन मीरा गली गली अलख जगाऊँ
या राधा सी बावरिया बन जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


देहपुंज को कैसे बिसराऊँ
तुम पर कैसे वारी जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कौन सी कहो महावर रचाऊँ

जो तुम्हारे साधिकार दर्शन पाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………

कैसे आँख का अंजन बन जाऊं

जो तेरे नैनों की शोभा बढ़ाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …

कौन सा वो हार बन जाऊँ

जो तेरे गले से मैं लिपट जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …

कौन सा वो बांस बन जाऊँ

जो मुरली बन अधरों से लिपट जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …

कहो तो चरणों की रज बन जाऊँ

पायलिया बन उनसे लिपट जाऊँ
अब तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


अंधेरी राह का दीप बन जाऊँ
निराकार को साकार बनाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


ह्रदय वेदना कैसे बुझाऊँ
कहो मोहन कौन सी गंगा नहाऊँ
जो तेरे दर्शन मैं पाऊँ
अब तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


मोहिनी मूरत पर वारी जाऊँ

श्याम तुम पर बलिहारी जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कैसे माया का पर्दा गिराऊँ
जो तुझे साकार मैं पाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कैसे अपना आप मिटाऊँ
जो तुझमे खुद को समाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कह निर्झर बहता दरिया बन जाऊँ
बस ह्रदय कुंज मे तुम्हें बसाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


सुधि ना तेरी कभी बिसराऊँ
बस श्याम नाम के ही गुण मैं गाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


रसना को नाम का चस्का लगाऊँ
बस सांसों की सरगम पर रटना लगाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


जब भी तेरी गली का फ़ेरा लगाऊँ
बस सलोने मुखडे के दर्शन पाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


एक शून्य मे तुम मिल जाओ
तुम्हें पाकर एक शून्य मै बन जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


दृष्टि सृष्टि विलीन हो जाये
एक तेरा ही अक्स रह जाये
जिसमे मै एकाकार हो जाऊँ
अब तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


आकुलता व्याकुलता का चरम हो
वो क्षण जीव का परम हो
जब तेरे दिव्य दर्शन पाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कालगति भी वहीं ठहर जाये
जब परमसत्य मे मैं मिल जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कैसे घट को घट में समाऊँ

घटाकाश को व्यापक बनाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

मीरा होना आसान नही



मीरा होना आसान नही
मीरा बन जाओ तो बताना
देखो तुम्हे एक दिन है दिखाना
मीरा यूँ ही नही बना करतीं
श्याम को पति यूँ ही वरण नही किया करतीं
प्रेम दीवानी , मतवाली बन
गली गली यूँ ही अलख नही जगाया करती
मीरा बनने से पहले
खुद को मिटाना होगा
मीरा बनने से पहले
श्याम को रिझाना होगा
मीरा बनने से पहले
विष पी जाना होगा
ना केवल पीने वाला
बल्कि सांसारिक कटु
आलोचनाओं का विष
संबंधियों द्वारा ठुकराये जाने का विष
अपनों के विश्वास के
उठ जाने का विष
क्या तैयार हो तुम
ए कर्मभूमि के वासियों
मीरा बनने के लिए........
जहाँ पति को पत्नी में
सिर्फ औरत ही दिखती है
जहाँ औरत में समाज को
एक अबला ही दिखती है
जहाँ सिर से पल्लू उतरने पर
बवाल मच जाया करता है
जहाँ कन्याओं को गर्भ में ही
मार दिया जाता है
तो कभी चरित्रहीन करार
दिया जाता है
तो कभी प्रेम करने के जुर्म में
ऑनर किलिंग की सजा का
हकदार बना दिया जाता है
तो कभी अकेली स्त्री से
व्यभिचार किया जाता है
फिर चाहे वो किसी भी उम्र की क्यों ना हो
बच्ची हो या बूढी या जवाँ
सिर्फ लिंग दोहन की शिकार होती है
और उफ़ करने की भी
ना हक़दार होती है
क्या ऐसे समाज में
है किसी में हिम्मत मीरा बनने की
गली गली विचरने की
है मीरा जैसा वो पौरुष
वो ललकार , वो आत्मसमर्पण
जिसने अपना सर्वस्व श्याम को अर्पित कर दिया
और निकल पड़ी हाथ में वीणा संभाले
जिसे ना संसार में श्याम के अलावा
दूजा पुरुष दिखा
ऐसा नहीं कि उस वक्त राहें सरल थीं
शायद इससे भी गयी गुजरी थीं
नारी के लिए तो हमेशा समाज की दृष्टि
वक्र ही रही है
तो क्या मीरा ने ये सब ना झेला होगा
जरूर झेला होगा
किया होगा प्रतिकार हर रस्म-ओ-रिवाज़ का
और दिया होगा साथ अपने श्याम का
फिर कैसे वो विमुख रह सकते थे
कैसे ना वो मीरा का योगक्षेम वहन करते
लेकिन सर्वस्व समर्पण सा वो भाव
आज तिरोहित होता है
बस हमारा ये काम हो जाये
हमारा वो काम हो जाए
इसी में हम जीवनयापन करते हैं
तो कैसे मीरा बन सकते हैं
कैसे श्याम को रिझा सकते हैं
मीरा बनने के लिए मीरा भाव जागृत करना होगा
और मीरा भाव जागृत करने के लिए
मीरा को आत्मसात करना होगा
और मीरा को आत्मसात करने के लिए
खुद को राख बनाना होगा
और उस राख का फिर तर्पण करना होगा
तब कहीं जाकर मीरा का एक अंश प्रस्फुटित होगा
तब कहीं जाकर मीरा भाव से तुम्हारा ह्रदय द्रवीभूत होगा
यूँ ही मीरा नहीं बना जाता
यूँ ही नहीं श्याम को रिझाया जाता