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शनिवार, 6 सितंबर 2014

एक शून्यता और मैं

कोई उन्माद नहीं

कोई जेहाद नहीं


मन मौन के प्रस्तरों को


छिद्रित करने को आतुर नहीं


फिर विचार श्रृंखला


ध्वस्त हो या बिद्ध


मौसम ऊष्ण हो या शीत


जीवन की क्षणभंगुरता में


मोह के कवच और लोभ के कुण्डल


कितने ही आकर्षित करें



एक शून्यता और मैं निर्बाध विचरण कर रहे हैं

फिर किस्म किस्म के कुसुम अब कौन चुने और क्यों ?

6 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

मोह और लोभ न हो मगर कुसुम मन के खिलें तो जीवन सुगन्धित होगा। जीवन को खूबसूरती से जीना भी है !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत बढ़िया।
जेहाद के नाम पर तो लव जेहाद ही बहुत है।

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

मोह रहित जीवन ही श्रेष्ठ है।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत बढ़िया।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत बढ़िया।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात वाह!